231. जीवन यात्रा

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

भगवद् गीता में कहा गया है कि— मानव जीवन को प्राप्त करना विजय नहीं है बल्कि जीवन में संघर्ष करते हुए विजय प्राप्त करना ही जीवन की सफलता है।

मानव रूप में जन्म लेकर मनुष्य बहुत चिंतन मनन करता रहता है। जीवन को सुचारू रूप से चलायमान रखने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाता है क्योंकि प्रत्येक मनुष्य यही चाहता है कि उसका जीवन सुख- सुविधाओं से संपन्न हो। इसके लिए वह निरंतर प्रयत्न करता रहता है लेकिन इसके पश्चात् भी वह जीवन को सफल रूप से नहीं समझ पाता। इसका प्रमुख कारण यही है कि जीवन रूपी यात्रा में जब हमारे सामने कोई भी प्रश्न आता है तो हम उससे विमुख हो जाते हैं। हम उन प्रश्नों के उत्तर तलाशने का प्रयास ही नहीं करते।

एक बार किसी संत ने एक मछुआरे से पूछ लिया था कि— जीवन क्या है? क्या तुम उसे जानते हो?

मछुआरे ने बड़ी सहजता से कहा— हां जानता हूं। मैं नदी से मछलियां पकड़ कर उन्हें बाजार में बेच कर अपने जीवन का निर्वाह करता हूं। मेरे लिए यही जीवन है।

इस पर संत ने कहा—जिसे तुम जीवन कह रहे हो, वह तो मृत्यु की तरफ जा रहा है। ऐसे जीवन से क्या लाभ? मैं तुम्हें उस जीवन की ओर ले चलता हूं जो मृत्यु के पश्चात् भी मौजूद रहता है।

मछुआरे को बड़ा आश्चर्य हुआ— मृत्यु के पश्चात् भी जीवन।

संत ने कहा— हां वत्स! मृत्यु के पश्चात् भी जीवन संभव है। जिसे तुम जीवन कह रहे हो, इसका उद्देश्य ही उस जीवन को जानना है।

स्पष्ट है की संत मछुआरे को शाश्वत सत्य बता रहे थे। वही सत्य जो भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को समझाने के लिए गीता का उपदेश दिया था। वास्तव में देखा जाए तो मनुष्य के कर्म ही उसे मृत्यु के उपरांत भी इस चराचर जगत् में जीवित रखते हैं।

ईश्वर ने प्रत्येक मनुष्य को अलग बनाया है। सबकी अपनी जीवन यात्रा है। इसलिए अपनी तुलना औरों से करना व्यर्थ है। क्योंकि इससे केवल चिंता में ही वृद्धि होगी। इसलिए चिंता में वक्त बर्बाद नहीं करना चाहिए बल्कि जो है, बस उसे लेकर अपनी यात्रा पर आगे बढ़ते जाना चाहिए। जीवन कैमरे की तरह है, हम जिस वस्तु पर भी फोकस करेंगे, उसकी तस्वीर उतनी ही अच्छी आएगी। जीवन को हम जब तक केवल दुख और संघर्ष मानते रहेंगे तो यह एहसास मन में पीड़ा ही देगा लेकिन जब इसे अनमोल मानेंगे तो हर वस्तु में बच्चों की तरह आनंद महसूस करने लगेंगे।

जीवन क्या है? हम यहां क्यों हैं? जब जीवन में समस्याएं उत्पन्न होती हैं तो ऐसे अनेकों प्रश्न स्वाभाविक रूप से हर किसी के मन में उपजते रहते हैं। लेकिन अपनी जीवन यात्रा में हमें इन प्रश्नों का सामना करने से डरना नहीं चाहिए। देखा जाए तो यह एक अच्छा तरीका है जीवन में प्रेम जगाने का। हमें अपने मन को लगातार प्रशिक्षित करना होगा कि जीवन हमारी मर्जी से नहीं चलता। इसके पश्चात् ही हम जीवन का आनंद ले सकते हैं। लेकिन यदि मन अस्थिर है, हताश है तो वह जीवन दृष्टि को भी क्षीण कर देता है। इससे जीवन की गुणवत्ता प्रभावित होने लगती है, जो अपने जीवन को लेकर सजग है, वह समस्याओं के बीच भी जीवन से प्यार करना छोड़ते।

यदि आपके पास संतोष नहीं है तो जीवन की गुणवत्ता भी प्रभावित जरूर होगी। हमेशा याद रखना चाहिए कि स्वयं की दृष्टि ही बाहर बदलाव का वाहक बनती है। इसलिए अपनी कमजोरियों को स्वीकार करते हुए अपनी खूबियों की भी सराहना करें। सुंदर जीवन यात्रा के लिए रोजमर्रा के जीवन में बहुत सारी बातों पर अमल करना होगा। कुछ दिनों के नियमित अभ्यास के बाद आप स्वयं बदलाव महसूस करने लगेंगे।

प्रत्येक मनुष्य के अंतर्मन में एक दुनिया समाहित होती है। जिसमें उसकी वास्तविक शक्ति और ज्ञान का समावेश होता है। इस अंदर की दुनिया की वाणी को ही सुनकर हमें स्वधर्म का ज्ञान होता है। इस संसार में जो भी मनुष्य उस में प्रवेश करना सीख जाता है, उन्हें अपनी वास्तविक शक्ति और ज्ञान का अहसास होना प्रारंभ हो जाता है। लेकिन इसके लिए यह परम आवश्यक है कि वह बाहरी दुनिया की चकाचौंध में डूबने से अपने आप को बचाए रखे।

स्वधर्म का वास्तविक ज्ञान अंदर की दुनिया में डुबकी लगाने से ही होता है। प्रतिपल प्रयास करते रहने से स्वधर्म के केंद्र तक पहुंचा जा सकता है। जहां पहुंचकर हमें अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनाई देने लगती है। यह आवाज बहुत ही धीमी तथा सूक्ष्म होती है। इसे सुनने के लिए गहरी शांति और मौन की आवश्यकता होती है।

लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि—सांसारिक कर्मों में लिप्त मनुष्य समय रहते हुए इस पर ध्यान ही नहीं देता। वह सांसारिक सुखों को भी जीवन यात्रा का परम उद्देश्य मानकर ईश्वर से विमुख होता जाता है। जबकि वास्तविकता यही है कि सांसारिक सुखों में लिप्त सभी मनुष्य प्रतिफल अपने जीवन को गंवा रहे हैं। वे अपनी जीवन यात्रा को और कठिन बना रहे हैं। लेकिन जो समझदार हैं, वे अपने पुरुषार्थ से सत्कर्म करते हुए इस जीवन में ईश्वर को जानने का प्रयास करते हैं और अपनी जीवन यात्रा को शांति पूर्वक पूरा करते हुए ईश्वर में विलीन हो जाते हैं।

One thought on “231. जीवन यात्रा”

Leave a Reply