25. स्वयं की तलाश

ऊँ
श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

मैं कौन हूं? मेरा वजूद क्या है? मैं कहां से आया हूं? वैसे तो प्रत्येक व्यक्ति को खुद के बारे में कोई भी ज्ञान नहीं होता। इस भौतिक संसार में वह किस प्रयोजन के लिए आया है। ऐसे बहुत सारे प्रश्न मानव के मस्तिष्क में उत्पात मचाते रहते हैं। किंतु इन प्रश्नों का उत्तर इतना आसान और साधारण नहीं है। दुर्भाग्यवश हम खुद को पहचान ही नहीं पाते और अपना सारा जीवन इसी अज्ञानता में गुजार देते हैं। पुराणों में भी कहा गया है- “अहम् ब्रह्मास्मि” अर्थात में ही ब्रह्म हूं। आशय यह है कि इस संसार का हर व्यक्ति ब्रह्म का अवतार होता है। लेकिन मानव में ब्रह्म की खोज का मार्ग आसान नहीं है।

ब्रह्म निर्माण के लिए उसे स्वयं की शिद्दत से तलाश करनी होगी। इस मायावी संसार में मानव केवल ईश्वर की सबसे सुंदर रचना है। मानवीय कमजोरियों के रूप में लोभ, तृष्णा, मोह-माया और विविध प्रकार के लौकिक बंधनों से खुद को मुक्त करने की दरकार है। स्वयं को तराशने के लिए खुद में छुपे हुए बाह्य अवगुणों के रूप में बेकार मलबे को तप-त्याग और तपस्या की छेनी से हटाने की जरूरत है। जिस दिन हम ऐसा करने में सफल हो जाएंगे, वह दिन मानव के सर्जन और विकास का दिन होगा। लेकिन व्यक्ति को व्यथित एवं बेचैन करने वाली मनोवृति अभाव रूप में नहीं बल्कि भाव रूप में विद्यमान है। भाव की उत्तेजित अवस्था प्राय: इसलिए होती है कि अन्य लोग क्यों इन वस्तुओं का उपयोग करते हैं? जबकि वह वस्तु उसके पास नहीं है।

प्राय: मनुष्य इसलिए दुखी नहीं रहता कि उसके पास भवन, वस्त्र एवं सुविधायुक्त वस्तुएं क्यों नहीं है? परन्तु दूसरों के पास ऐसी वस्तुएं क्यों उपलब्ध हैं इसलिए ज्यादा परेशान रहते हैं। कुछ लोगों में यह प्रवृत्ति अधिक विकसित होती है। किसी को नया वस्त्र, आभूषण चाहिए। ऐसी अनेकानेक बातें निरंतर उसके मन में अशांति उत्पन्न करती रहती हैं और वह ईर्ष्या के प्रभाव से ग्रस्त हो जाता है। अपनी मनपसंद वस्तु पाने के लिए तरह-तरह के तरीके अपनाता है। लेकिन फिर भी वह ईर्ष्या की तपन में जलता रहता है।

एक बार एक गुरु ने अपने शिष्यों से कहा कि वे घर जाकर आलू पर उन व्यक्तियों का नाम लिखें, जिनसे वे ईर्ष्या करते हैं। आप जितने भी व्यक्तियों से् ईर्ष्या करते हैं, उतने ही आलू लेकर प्रत्येक पर उनका नाम लिख दें और उन आलुओं को थैली में रखकर  मेरे पास लेकर आएं। अगले दिन सभी शिष्य आलू की थैली लेकर आए। किसी के पास 4 आलू थे, तो  किसी के पास 2 या 8, प्रत्येक आलू पर उनका नाम लिखा था, जिनसे वे ईष्र्या करते थे। इसके बाद गुरु जी ने कहा कि अगले 7 दिन तक वे सोते-जागते, खाते-पीते हमेशा जहां भी जाएं आलू की थैली को अपने साथ लेते जाएं। 7 दिन के बाद सभी गुरुजी के पास पहुंचे। गुरू जी ने सभी को अपनी थैलियां उनके पास रखने को कहा, इतना सुनते ही सभी ने चैन की सांस ली। दो-तीन दिन के बाद जब आलू सड़ने लगे तो सभी उसकी सड़न और बदबू से परेशान होने लगे थे। गुरु जी के पूछते ही सभी आलू की दुर्गंध से होनेवाले कष्टों का ब्यौरा देने लगे। गुरु जी ने  हंसते हुए कहा कि जब मात्र 7 दिनों में ही आपको ये आलू  बोझ लगने लगे, तब सोचिए कि आप जिन व्यक्तियों से ऐसा करते हैं। उनका कितना बोझ आपके मन पर होता होगा। आप लोगों को ईष्र्या की सड़न जरूर परेशान करती होगी। मगर उस बोझ को आप पूरी जिंदगी ढोते रहते हैं। इस अनावश्यक बोझ से आपके मन और दिमाग को कितनी परेशानी होती होगी, फिर भी आप ईष्र्या के भाव को नहीं छोड़ते। दूसरों से अच्छे रहें यही भाव मनुष्य की अशांति, आंतरिक दुख और शिक्षा का अहम कारण होता है। मन बेचैन रहता है। सब कुछ होते हुए भी मनुष्य अतृप्त रहता है। यह एक छूत से फैलने वाले रोग के सदृश्य शीघ्र ही विकसित होने वाला मनोभाव है। अभी आप शांत, गंभीर और प्रसन्न है। परंतु जैसे ही दूसरों की कोई भी उत्तम वस्तु देखी, आप चिंता में जलने लगते हैं। उसको पाने के लिए मन मचल उठता है। याद रखिए, आप चाहें सब कुछ पा लें, परंतु फिर भी किसी न किसी वस्तु का अभाव सदा बना ही रहता है। अभाव मानव मस्तिष्क की प्रबलतम कमजोरी है। हमें इस बात का बोध होना चाहिए कि जीवन में किसी भी चीज की अति न हो। जैसे-बीज में अत्यधिक पानी डालने से बीज अंकुरित नहीं होता और वह पेड़ नहीं बन पाता है। उसी तरह हमें अति नहीं करनी चाहिए। हमें ईष्र्या को अपने भावों में  स्थान नहीं देना चाहिए। ईष्र्या से बड़ी कोई बीमारी नहीं है। मनुष्य वही है, जो कल्पना के माया जाल एवम ईष्र्या जैसे मनोविकार के वश में न होकर अपनी प्राप्त वस्तुओं का ही सबसे उत्तम उपयोग करता है। हर समय सपनों के मायाजाल में उलझे रहना अनहितकारी है। सच पूछिए तो इस सृष्टि में मानव का अवतरण एक अद्भुत घटना है। मनुष्य के व्यक्तित्व में छिपे हुए संदेश प्रेरणा से ओतप्रोत हैं। संजीदगी से विचार करें, तो यह समझते देर नहीं लगती कि इस सृष्टि में हर व्यक्ति की प्रारब्ध की कहानी उसके अवतरण से शुरू होती है और तराशने के बाद उसके व्यक्तित्व का सर्जन होता है।

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