260. जीवन सर्वभूत है।

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

जीवन सर्वभूत है अर्थात् जीव-जंतु, पेड़-पौधे और आकाश- पृथ्वी सभी में सांस है, चेतना है। सभी में एक प्रकार की गति है, जिसकी वजह से यह प्रमाणित होता है कि— सभी में जीवन है। हम जीवन को बांट कर नहीं देख सकते। सभी तत्वों में एक चैतन्य ऊर्जा का वास है। एक ही प्राण अलग-अलग वस्तुओं में पृथक- पृथक कार्य कर रहा है।

प्रकृति मनुष्य को जीवन की सभी मूलभूत सुविधाएं प्रदान करती है और सारे संसार पर प्रेम लुटाती है। वह कभी भी मनुष्य से शिकायत नहीं करती। आप का जमीन में डाला हुआ एक छोटा- सा बीज समय आने पर एक बहुत बड़ा वृक्ष बन जाता है और आपको अनगिनत फल प्राप्त होते हैं। एक पुष्प कई लोगों के मन को हर्षित कर देता है और वातावरण को सुगंधित करता है।

मनुष्य में देने की बजाय हमेशा लेने की प्रवृत्ति अधिक होती है। वह हमेशा शिकायत करता रहता है। मुझे ईश्वर ने यह नहीं दिया, वह नहीं दिया। लेकिन उसने शिकायत करने से पहले स्वयं के अंदर भी झांकना चाहिए कि वह लेने के योग्य भी है या नहीं। आपने देखा होगा धार्मिक कार्यक्रमों में पूजा शुरू करने से पहले कलश की स्थापना की जाती है। कलश मिट्टी का होता है या फिर धातु का भी हो सकता है। कलश स्थापित करते समय सबसे पहले यही देखा जाता है कि कलश अंदर से टूटा या गंदा तो नहीं है। कलश यदि चटका हुआ या छिद्रयुक्त होगा तो उसमें रखा हुआ जल स्थिर न रहकर बह जाएगा। यदि अंदर का हिस्सा गंदा होगा तो कलश में जो जल भरा जाएगा, वह भी गंदा हो जाएगा।

मनुष्य को भी पंच भौतिक तत्वों से निर्मित शरीर रूपी कलश को पवित्र और स्वच्छ रखना चाहिए। जिस प्रकार टूटे-फूटे कलश में जल स्थिर नहीं रह सकता वैसे ही मनुष्य का शरीर यदि मानसिक विकारों के चलते स्वच्छ नहीं है तो ईश्वर से निरंतर प्रवाहित होती कृपा से वह पूरी तरह वंचित रह जाएगा। ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए उसे सुयोग्य होना होगा। स्वर्ण या रजत किसी भी धातु का कलश क्यों ना हो यदि वह वर्षा ऋतु में पलट कर रख दिया जाए तो घनघोर वर्षा के बावजूद भर नहीं सकता। प्रकृति जब ब्रह्म मुहूर्त में कृपा का खजाना लेकर आती है और जो व्यक्ति उस समय निद्रा में होता है, वह उससे वंचित रह जाता है।

ईश्वर की कृपा प्राप्त करने के लिए अध्यात्म के रास्ते पर चलना पड़ता है। ज्ञान प्राप्ति के लिए तपना पड़ता है, ठोकरें खानी पड़ती हैं। दूसरों के अनुभव से तुम अध्यात्म को प्राप्त नहीं कर सकते। दूसरों ने जो कुछ कहा है या शास्त्रों में लिखा है, वह सिर्फ अपने अनुभव के आधार पर ही लिखा है। शास्त्रों में पढ़कर तुम यह तो जान लोगे अध्यात्म क्या है? लेकिन जब तक अनुभव प्राप्त नहीं होगा तब तक ईश्वर को नहीं जान पाओगे। उस अनुभव को प्राप्त करने के लिए तुम्हें अध्यात्म में गहरे उतरना पड़ेगा। जीवन के सब रंग परखने पड़ेंगे।

जीवन एक सागर मंथन है। जब तक अमृत का घट न निकल जाए, तब तक खोदते ही रहना। कोई मनुष्य जब कुआं खोदता है तो सबसे पहले कंकर पत्थर ही हाथ लगते हैं। धीरे- धीरे चिकनी मिट्टी आने लगती है और अंत में स्वच्छ जल प्राप्त होता है। ऐसा ही जीवन है, इसमें गहरे उतरते जाओ। जब तक तुम्हें जीवन में आनंद नहीं होगा, तब तक आप दुखी ही दुखी होते रहोगे। जैसे- जैसे ऊपर की परते हटती जाएंगी, सारा कूड़ा कर्कट साफ हो जाएगा। जब ध्यान में और गहरे जाओगे तो तुम्हें समझ आएगा कि वास्तव में जीवन क्या है? तुमने जीवन को एक अंधे की तरह देखा है। मगर फिर तुम इसे आंख खोलकर देखना शुरू करोगे। मोह माया से दूर इसे ध्यान और समाधि से देखोगे। विकृति का चश्मा उतर जाएगा और तुम्हें वास्तविक जीवन के दर्शन होंगे।

यह तो सच है कि कोई एक कीमती खजाना हमारे अंतर्जगत में छुपा हुआ है। बस हमें तो उस खजाने का पता लगाना है और खजाने के बंद ताले को खोलने की विधि जाननी है।

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