261. संत वाणी

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

देखा जाए तो हमारा समस्त जीवन प्रायः असंतुष्ट दोषारोपण में ही व्यतीत हो जाता है। आनंद की प्राप्ति के लिए मनुष्य न जाने क्या- क्या प्रयोजन करता रहता है? लेकिन फिर भी उसे आंतरिक सुख प्राप्त नहीं होता। मन की व्यथा और द्वंद्व से मुक्ति पाने के लिए संतों की वाणी काफी सहयोग करती है।
कहा भी गया है कि— संतवाणी महायज्ञ है। लेकिन आज की आपाधापी के समय सभी व्यस्त रहते हैं। उनके पास समय ही नहीं होता। वह जीवन भर इच्छाओं के पीछे भागता रहता है। जब इच्छाओं की पूर्ति हो जाती है तो वह उसका सारा श्रेय स्वयं ले लेता है और जब पूर्ति नहीं होती तो ईश्वर को दोष देने लगता है। मनुष्य की इच्छाएं अनंत होती हैं। वह एक के बाद एक आती रहती हैं। एक इच्छा की पूर्ति के बाद दूसरी इच्छा मन में हिलोरें मारने लगती हैं। जीवन पर्यंत यही क्रम चलता रहता है। मन में व्याप्त इच्छाओं के कारण, संपन्न होते हुए भी उनकी इंद्रियां शांत नहीं होती। हमेशा इसी उधेड़बुन में लगे रहते हैं कि ऐसा क्या किया जाए जिससे मेरी सारी इच्छाएं पूरी हो जाएं, जिससे समाज में मेरा रुतबा बढ़ जाए। मैं ही सबसे सर्वश्रेष्ठ कहलाऊं।

ऐसे विचारों के कारण उनके अंदर अपेक्षाओं का भंडार एकत्रित होता जाता है। यही सोच सभी कष्टों का मूल कारण है। ऐसे मनुष्य अपने अंदर झांकने की कोशिश नहीं करते। वे सिर्फ बाहरी प्रलोभनों से दिल बहलाते रहते हैं जो मात्र पानी के बुलबुले के समान अस्थिर हैं। ऐसे में सिर्फ संतो के वचन ही आत्म अनुसंधान में सहायक हो सकते हैं। जिस प्रकार जीवनदायिनी वायु, आकाश, प्रकाश, गंध बिना पुष्टि अपने होने का प्रमाण देते हैं, उसी प्रकार संत अपने ज्ञान से बिना साक्ष्य के अपने संस्कार का आभास सहज ही करा जाते हैं। आदिकाल से संतों के प्रवचन प्रमोद को चुनौती देकर ईश्वर से हमारा साक्षात्कार कराते आ रहे हैं। वास्तव में शब्द ब्रह्म है और उपासना योग्य है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार एक समय पर ब्रह्मा जी को भी अपने संशय समाधान के लिए विष्णु से, माता पार्वती को शिव जी से कथा श्रवण करने को बाध्य होना पड़ा था। भागवत कथा सर्वथा कल्याणकारी है। आज जीवन युद्ध की भांति चल रहा है। जहां निराशा से प्रतिदिन लड़ना है। मनुष्य को यह समझना चाहिए कि संपूर्ण इच्छाओं की पूर्ति कभी नहीं हो सकती। ऐसी स्थिति में संतवाणी हमें प्रेरित कर सकती है। जिससे आनंद का अमृतपान संभव हो सकता है। हमें चुन- चुन कर कुछ अर्थपूर्ण सोच को अपने जीवन में स्थान देने का प्रयास अवश्य करना चाहिए। संतवाणी ऐसा वचनामृत है जो हमारी बेसिर पैर की इच्छाओं पर अंकुश लगाने में कारगर साबित हो सकती है। इसलिए इन इच्छाओं का दामन छोड़ कर अपने नियमित कर्मों को आसक्ति रहित होकर करते हुए सारे जगत के रचयिता ईश्वर को सर्वस्व न्यौछावर कर दें और इस जगत में निर्लिप्त हो कर रहें, जिससे शाश्वत सुख और शांति प्राप्त कर सको।

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