28. धर्म और आध्यात्मिकता

ऊँ
श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

धर्म और आध्यात्मिकता यह दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। क्योंकि जहां धर्म होगा, वहां अध्यात्म का होना अनिवार्य है और जहां अध्यात्म होगा, वहां धर्म अपने आप स्थापित हो जाता है। इसलिए ये दोनों शब्द एक-दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं। धर्म का अनुसरण तो सभी करते हैं। लेकिन अधिसंख्य लोग इस बात को नहीं जानते हैं कि इसी का सही अनुसरण उन्हें अध्यात्म की उन गहराईयों तक ले जाता है, जहां पहुंचकर मानव को अपने वास्तविक स्वरूप और शक्ति का अनुभव होता है। सभी धर्म ईश्वर तक पहुंचने के विभिन्न मार्गों का उल्लेख करते हैं। इसके लिए बस थोड़े से समर्पण की भावना को विकसित करना होता है। हम सब अपनी-अपनी प्राथमिकता के आधार पर अपनी प्रगति के लिए समय-समय पर संकल्प लेते रहते हैं। कुछ लोग प्रतिदिन व्यायाम का, कुछ ज्यादा मेहनत करने का, कुछ सुबह जल्दी उठने का, कुछ व्यवसायिक प्रगति का जबकि कुछ नशा आदी छोड़ने का, इन सब के साथ हमें आध्यात्मिक प्रगति का भी संकल्प लेना चाहिए। एक अच्छा, नेक, पवित्र और सदाचारी बनने का संकल्प। ऐसा एहसास उन लोगों को भी प्राप्त होता रहता है, जो पूजा स्थल पर नहीं जाते हैं, लेकिन दूसरों के प्रति सदैव अच्छी भावना बनाए रखते हैं। अच्छे कर्मों को संपादित करना भी हमें संतुष्टि का सुखद एहसास कराता है। जीवन में प्राप्त होने वाली यही संतुष्टि जब लंबे समय तक मस्तिष्क में अनुभव होती है, तब यह मस्तिष्क की गहराइयों की ओर बढ़कर यहां स्थायीत्व लाती है। इसके लिए हमें बाहरी दुनिया में नहीं बल्कि अपने अंदर काम करना होगा। अपनी सोच और समझ को धीरे-धीरे निखारना होगा। हम सभी अपना-अपना दृष्टिकोण बनाते हैं। जैसे-जैसे हमारी समझ बढ़ती है, वैसे ही हमारी सोच भी बढ़ती चली जाती हैं।

कई बार आप किसी से मिलते हैं। उनके त्वरितत व्यवहार के आधार पर आप उनके अवगुण के बारे में बताने लगते हैं। पर यहां आप भूल कर रहे हैं। यह भी संभव हो सकता है, कि उस व्यक्ति में कोई गुण भी हो। हमारे अंदर इतनी शक्ति ही न हो कि हम उसके गुणों को देख सकें। सामान्य स्थिति में हर मानव के अंत:करण में विभिन्न भाव उत्पन्न होते हैं। लेकिन ये भाव इतने शक्तिशाली नहीं होते जो ऐसी शक्तिशाली तरंगों को उत्पन्न कर सकें जो दैवीय शक्ति तक पहुंचने में सफल हो जाएं। यही कारण है कि लोगों की आवाज या लोगों के भाव ईश्वरीय शक्ति तक नहीं पहुंच पाते हैं। हमें हर समय याद रखना चाहिए कि हम सब ईश्वर की संतान हैं। पशु-पक्षी या जितने भी जीव जंतु है, सभी में उनका ही वास है। वे संसार के कण-कण में विद्यमान हैं। हम ईश्वर से प्रार्थना करें कि, हमारा दृष्टिकोण खुला हो। हम सभी को एक ही नजर से देख पाएं। हमें जब यह एहसास हो जाएगा, तो हमारी दूसरों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ जाएगी। हर धर्मग्रंथ में ऐसे भावों को उत्पन्न करने की तकनीक का वर्णन किया गया है। लेकिन ज्यादातर लोग इस तरफ ध्यान नहीं दे पाते। ऐसा नहीं है कि वे इस विशेष तकनीक को नहीं समझते हैं, लेकिन इसका अनुसरण इसलिए नहीं करते हैं, क्योंकि इसके अंतर्गत अच्छे कर्मों का किया जाना भी शामिल रहता है। जिन्हें करने से ऐसे लोग प्राय: दूरी बनाए रखते हैं। अच्छे कर्मों का तात्पर्य, समर्पित भाव से संपूर्ण ईश्वरी व्यवस्था के प्रति भावनात्मक झुकाव होता है। जिसमें अपने स्वयं के हित को नजरअंदाज कर दूसरों के हित को प्राथमिकता दी जाती है। ऐसे लोगों की सोच व समझ भी सही मायने में बढ़ जाती है। जो लोग ऐसा करते रहते हैं, उनके हृदय में निश्चित ही ऐसी भावनाओं का जन्म होने लगता है, जो उन्हें ऐसे कार्य के प्रति और भी अधिक प्रेरित करती रहती हैं। ऐसा करते रहने में व्यक्ति मे स्वयं की संतुष्टि का स्तर बढ़ता ही रहता है। जो एक दिन उसे जीवन के ऊंचाइयों पर ले जाने में पूरी तरह सक्षम होता है। इसलिए हमें अपनी संपूर्ण प्रगति के लिए आध्यात्मिक संकल्प भी करना चाहिए।

अध्यात्मिकता केवल हिमालय पर ही नहीं मिलती, बल्कि आध्यात्मिकता वहीं है, जहां पर आप हैं। लोगों के मध्य में भी अध्यात्म को साधा जा सकता है। धर्म दिव्यता का एक गुण  है। धार्मिक भावनाओं के द्वारा ही हम अपनी सोच और समझ को विकसित करके एक महान व्यक्तित्व के स्वामी बन सकते हैं। हर धर्म ग्रंथ का मूल निचोड़ एक ही है, कि संपूर्ण मानवता के प्रति आपसी प्रेम, सद्भावना, भाईचारा, शांति,  उन्नति का विस्तार हो।

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