29. धैर्य से करें देव साधना

ऊँ
श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

ईश्वर ने यह दुर्लभ मानव जीवन चालाकियों, व्यर्थ चमचागिरी एवं छद्मपूर्ण कार्यों में नष्ट करने के लिए नहीं दिया है, अपीतु अपने पौरुष से दुर्लभ गुणों एवं शक्ति साधनों का सदुपयोग कर देव-साधना के माध्यम से स्वयं एवं मानव के कल्याण के लिए दिया है। देव साधना के प्रभाव से दुराचारी भी शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है। परम धर्म परमात्मा में अंगिकार हो जाता है। लेकिन मनुष्य जीने के लिए कई-कई प्रकार के साधन ढूंढता रहता है। अपने लक्ष्य में सफल होने के लिए वह सत्य और असत्य का सहारा ही नहीं, बल्कि पता नहीं कितने टोने-टोटकों, यंत्रों, षडयंत्रों, नीतियों-कुनीतियों का सहारा लेकर अपने खास उद्देश्य को प्राप्त करना चाहता है। यह संसार मानव रूपी कल्पनाओं एवं आडम्बरों के मायाजाल में लिप्त है। मनुष्य जिसको सत्य समझता है वह नितांत असत्य एवं कष्टप्रद है। कोई चमत्कारी शिवलिंग अथवा दुर्लभ रतन किन्हीं अनुपयोगी वस्तुओं से ढके होने के कारण विशेष दृष्टि के अभाव में सामान्य आंखों को नहीं दिखाई देता। उसे केवल अनुपयोगी पदार्थ ही दिखाई देता है, लेकिन एक पारखी एवं सत्य की पहचान करने वाली दृष्टि को उन पदार्थों में केवल वही दिव्य रतन अथवा चमत्कारी शिवलिंग ही दिखाई देता है। यह दिव्य दृष्टि केवल देव-साधना करने वाले साधकों को ही प्राप्त होती है।

इस सत्य को देखकर उन्हें अत्यंत आनंद की अनुभूति होती है। जबकि दूसरी तरफ सत्य को न देख पाने वाले साधक उस संपूर्ण उपकरण में दुख, पश्चाताप एवं विपरीत विचारों के सिवा कुछ भी हासिल नहीं कर पाते। देव साधना का मार्ग पहले-पहल कष्टप्रद एवं दुखों से परिपूर्ण प्रतीत होता है, लेकिन उसका अंत स्थायी आनंद के रूप में होता है। इस मार्ग का पथिक सीमित में भी असीमित आनंद पाता है, एवं भौतिकता की चकाचौंध में डूबा व्यक्ति असीमित ऐश्र्वर्य एवं संपदा के चलते भी मुट्ठी भर आनंद बटोरने के लिए छटपटाता रह जाता है। ऐसे लोगों में धैर्य का अभाव होता है। वे देव-साधना तो करते हैं, और चाहते हैं कि उनको सब कुछ पल भर में प्राप्त हो जाना चाहिए। लेकिन देव-साधना कोई वस्तु नहीं है, जिसे हम पल भर में प्राप्त कर लें। उसके लिए कठोर तपस्या, समर्पण, त्याग और धैर्य की जरूरत होती है।

सीपियों की तरह धैर्यवान बनकर ही मोती प्राप्त किए जा सकते हैं।

स्वामी विवेकानंद

हमारे देश में एक सुंदर किवदंती प्रचलित है, वह यह है कि आकाश में स्वाति नक्षत्र के रहते यदि पानी गिरे और उसकी एक बूंद किसी सीपी में चली जाए तो वह बूंद मोती बन जाती है। सीपियों को यह मालूम है। इसलिए जब वह नक्षत्र उदित होता है, तो वे सीपीयां पानी की ऊपरी सतह पर आ जाती हैं। उस समय की एक अनमोल बूंद की प्रतीक्षा करती रहती हैं। ज्यों ही एक बूंद पानी उसके पेट में जाता है, त्यों ही उस जल कण को लेकर मुंह बंद करके समुद्र के अथाह गर्भ में चली जाती हैं। वहां बड़े धैर्य के साथ उनसे मोती प्राप्त करने के प्रयत्न में लग जाती हैं। हमें भी उन्हीं सीपीओं की तरह होना होगा। पहले सुनना होगा, फिर समझना होगा, अंत में बाहरी संसार से दृष्टि बिल्कुल हटानी होगी। सब प्रकार की विक्षेप कारी बातों से दूर रहकर हमें अंतर्निहित सत्य तत्व के विकास के लिए प्रयत्न करना होगा। एक भाव को नया कहकर ग्रहण करना उसकी नवीनता चले जाने पर फिर एक-दूसरे नए भाव का आश्रय लेना, इस प्रकार बार-बार करने से हमारी सारी शक्ति ही इधर-उधर बिखर जाएगी। इसलिए एक भाव को पकड़ो, उसी को लेकर रहो। उसका अंत देखे बिना उसे मत छोड़ो। जो एक भाव लेकर उसी में मस्त रह सकते हैं, उन्हीं के हृदय में सत्य तत्व का उन्मेष होता है। जो लोग सब विषयों को मानो थोड़ा-थोड़ा चखते रहते हैं। वे कभी कोई चीज नहीं पा सकते। बिना भगवत कृपा के संसार के सत्य एवं असत्य का सही-सही बोध संभव नहीं है।

इस नश्वर, मृत्युमय एवं दुखदाता संसार की कोई भी उपलब्धि शाश्वत, स्थाई एवं चिरकालिक नहीं है। अनाप-शनाप माध्यमों से जो धन-संपदा, भौतिक ऐश्र्वर्य, पद-प्रतिष्ठा एवं अस्थाई सुख आपने प्राप्त किया है, वह अंत में ब्याज रूप में आपको गहन कष्ट, पीड़ा, पश्चाताप एवं सबक देने वाला है। संसार के संपूर्ण आभासित सुखों का शुभारंभ सुख से होता प्रतीत होता है। लेकिन उसका अंत गहरी पीड़ा एवं दुख में होता है। लेकिन जो सचमुच देव-साधना की इच्छा रखते हैं उन्हें हर वस्तु को थोड़ा-थोड़ा पकड़ने की वृत्ति सदैव के लिए छोड़नी होगी। वे अपने अंतर्मन में एक विचार को धारण करें, फिर उसी विचार को अपना जीवन बनाएं, उसी का चिंतन करें, उसी का स्वपन देखें और उसी में जीवन बिताएं। आपका मस्तिष्क, स्नायु, शरीर के सर्वांग उसी के विचार से पूर्ण रहें। दूसरे सारे विचार छोड़ दें। यही देव-साधना का उपाय है। इसी उपाय से बड़े-बड़े योगी महात्मा, सिद्ध पुरुषों ने सिद्धियां प्राप्त की हैं। सदाचारी हों या दुराचारी सभी को  देव-साधना का अधिकार है।

2 thoughts on “29. धैर्य से करें देव साधना”

  1. मुझे आपका ब्लॉग पढ़ के बोहुत आनंदित महसूस हो ता है। धन्यवाद

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