291. मंत्रों की महत्ता

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

हमारे सनातन धर्म में मंत्रों की महत्ता सार्वभौमिक है। जन्म से मृत्यु तक प्रत्येक महत्वपूर्ण कार्य, उत्सव, पूजा-पाठ और हवन आदि मंत्रोच्चारण के बिना पूर्ण नहीं होते। यह भी सच है कि आज के भाग दौड़ भरे युग में देश, काल व परिस्थितियों के कारण विशुद्ध मंत्रोच्चारण के कारण संपूर्ण विधि- विधान में विकृति उत्पन्न होती चली गई। मंत्रों का उच्चारण मात्र औपचारिकता पूर्ति के रूप में किया जाने लगा है।

धार्मिक संगठन, दीपक, धूप, धूनी, अगरबत्ती आदि के रूप में इस परंपरा को बनाए हुए हैं। क्रिया कांडों का क्या प्रयोजन है? ऐसे प्रश्नों के उत्तर उनके पास नहीं है? ऐसे प्रश्न किए जाने पर सभी के उत्तर में यही भाव निकलते हैं कि वे यह कार्य सुख, शांति, स्वास्थ्य, शक्ति, धन, वैभव को प्राप्त करने तथा प्राकृतिक प्रकोपों, रोगों, भयों व अनिच्छित घटनाओं को रोकने के लिए करते हैं।

यद्यपि हमारे सनातन धर्म में हर समस्या से निपटने के लिए मंत्रोच्चारण का विधान है। किंतु मंत्रों पर विश्वास न रखने वाली आज की नई पीढ़ी जो केवल विज्ञान, तर्क, युक्ति तथा प्रत्यक्ष प्रमाणों पर ही विश्वास रखती है, उनके लिए मंत्रों की कोई महत्ता नहीं है। ऐसे में वर्तमान मान्यताओं के बीच अपनी व्यस्त दिनचर्या में से थोड़ा-सा समय निकालकर सच्चे हृदय से पूजा-अर्चना, मंत्रोच्चारण आदि के महत्व के बारे में जानने का प्रयास भी आवश्यक है।

वास्तव में मंत्रों की कोई महत्ता नहीं है, यह मात्र कल्पना है, ऐसा कहने वालों की भी कमी नहीं है।मंत्रोच्चार करना, उपासना, ध्यान, पूजा, स्तुति के लिए समय लगाना, धन लगाना, शक्ति लगाना व्यर्थ है। इन काल्पनिक निराधार मान्यताओं में कुछ भी नहीं रखा है, जीवन बहुत छोटा है, समय बहुत कम है और काम बहुत अधिक है। अतः कुछ करने कराने की बात करनी चाहिए। इन व्यर्थ की बातों में समय नष्ट नहीं करना चाहिए। इस प्रकार की सोच रखने के कारण वर्तमान की नई पीढ़ी में मंत्रों की महिमा केवल आडंबर बनकर रह गई है।

इसी कारण सबसे दूखद बात तो यही है कि मान्यताएं केवल धार्मिक गतिविधियों को संपन्न कराने तक ही सीमित हो चुकी हैं और तो और पूजा- अर्चना, मंत्र, हवन का भी व्यापार- सा ही होने लगा है। लोग धर्म के ठेकेदारों के चंगुल में फंसने लगे हैं।

मंत्रों का गूढ़ रहस्य—

वास्तव में हमें मंत्रों के गूढ रहस्य को समझना होगा। मंत्रों में ऐसी शक्तियां होती हैं, जिनके सही उच्चारण एवम् श्रवण से सकारात्मक तरंगों का उद्दीपन होने लगता है। हमारे ऋषियों ने ग्रंथों, उपनिषदों के माध्यम से अनेक श्लोकों का निर्माण किया है। जिसमें उन्होंने छोटे- छोटे श्लोकों के माध्यम से मंत्रों का बीज रोपित किया है। उन मंत्रों के अंदर ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव का वर्णन निहित है।
ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना, उपासना के लिए जिन मंत्रों का चयन ऋषियों ने किया है, उन मंत्रों में ईश्वर की उपासना कैसे करनी चाहिए? क्या-क्या मांगना चाहिए? हमें क्या- क्या अपेक्षा है? वो सारी बातें उन मंत्रों में निहित हैं। शरीर के विषय में, मन के विषय में, आत्मा के विषय में जो- जो हमारी अपेक्षाएं हैं, हमें क्या चाहिए? ईश्वर हमें क्या दे सकता है? ये सारी बातें इन मंत्रों में सूत्र रूप में बतायी गयी हैं। ईश्वर कैसा है? उसका गुण, कर्म, स्वभाव कैसा है? हम कैसे ईश्वर को प्राप्त कर सकते हैं? ईश्वर की उपासना करने से क्या लाभ होता है? क्या महत्व है? उपयोगिता क्या है? ईश्वर की उपासना से क्या हमारी प्रयोजन सिद्धि होती है? ये सारी बातें जितनी सूक्ष्मता से, सरलता से, संक्षेप में इन मंत्रों में बताई गई हैं, उतनी और अन्य मंत्रों से नहीं मिलती।

हम किसी भी सामान्य शब्द से ईश्वर की प्रार्थना- उपासना कर सकते हैं। मंत्र ईश्वर भक्ति का एक माध्यम हैं। परंतु एक शर्त है मंत्रों में, श्लोकों में, वाक्यों में, शब्दों में, ईश्वर के गुण- कर्म- स्वभाव का वर्णन होना चाहिए। कोई भी मंत्र, कोई भी वाक्य, कोई भी सूत्र, कोई भी श्लोक, ईश्वर कैसा है? किस प्रकार के गुण वाला है? किस प्रकार के कर्मों को करता है? किस प्रकार के स्वभाव वाला है? आदि विषयों को यदि बताता है, तो उस मंत्र, सूत्र, श्लोक, वाक्य, शब्द से हम ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना, उपासना करके अपना कार्य सिद्ध कर सकते हैं। इसलिए प्रत्येक मनुष्य को मंत्रों के माध्यम से ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना, उपासना करनी चाहिए। क्योंकि ऋषियों ने युगों- युगों तक तप, साधना और ध्यान क्रिया करके अपने लक्ष्य को सिद्ध करने के लिए इन मंत्रों का सर्जन किया। उन्होंने मंत्रों में अपनी आत्मिक शक्ति को रोपित करके उसे जीवंत रूप प्रदान किया।

जैसे हम ‘ओउ्म्’ शब्द का उच्चारण करते हैं तो हमें यह बोध होता है कि— समस्त प्राकृतिक पदार्थों का आदि मूल ईश्वर है अर्थात् हमारे पास जो भी धन, बल, विद्या, सामर्थ्य आदि पदार्थ हैं, उन सब का उत्पादक, रक्षक, धारक, स्वामी, ईश्वर है, हम नहीं। वेद पुराणों का ज्ञान यह अवश्य बताता है कि मंत्र साधना सभी अन्य साधनाओं से उत्तम है। मंत्र विद्या रहस्यपूर्ण तो अवश्य है, फिर भी आंतरिक इच्छा से श्रद्धा एवम् विधिपूर्वक की गई पूजा, अर्चना समय आने पर सुखद परिणाम अवश्य देती है। श्रद्धारहित मंत्र जाप करने का कोई अर्थ नहीं है।

मनुष्य को जाप के लिए कोई नियम का बंधन नहीं है। ईश्वर की उपासना के लिए स्थान कोई विशेष महत्व नहीं रखता। मन की एकाग्रता, ईश्वर के प्रति समर्पण, प्रेम, श्रद्धा, विश्वास, निष्ठा, रूचि आदि का विशेष महत्व है। हां इतना अवश्य होना चाहिए कि स्थान शांत हो, एकांत हो, रमणीय हो, स्वच्छ हो और कोलाहल से रहित हो, तो वहां पर अपेक्षाकृत बाधा कम होने के कारण हमारा ध्यान अच्छा लगेगा और हम मंत्रों का शुद्ध उच्चारण कर पाएंगे।

लेकिन यदि मन के ऊपर नियंत्रण हो, ईश्वर के प्रति रुचि हो, प्रेम हो और प्राणायाम के माध्यम से विधिवत् मन को रोककर मंत्रों के माध्यम से उसका ध्यान किया जाए तो ध्यान कहीं पर भी लग सकता है। घर से बाहर जाने की आवश्यकता नहीं है। ध्यान आंख बंद करके होता है और आंख बंद करने के उपरांत हम कहां बैठे हैं, किस दिशा में बैठे हैं, इसकी विस्मृति हो जाती है। इसलिए दिशा, स्थान, समय आदि का भी मंत्रों की शक्ति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। हम जाने-अनजाने इच्छापूर्ति हेतु या कष्ट में कितने ही मंत्रों का जाप मन ही मन करते रहते हैं। इसी भावना के साथ कि हमें एक न एक दिन दुखों से मुक्ति अवश्य प्राप्त होगी। हृदय में आस्था हो तो हम मंत्रों की तरंगों का अवश्य ही अनुभव कर पाएंगे, जिससे आंतरिक शांति का संचार होगा एवम् उर्जा में उत्तरोत्तर वृद्धि होना निश्चित है।

मंत्रों के सार को जानना एक गूढ़ रहस्य है, जो जीवन को लौकिक से पारलौकिक तत्व की ओर ले जाने में सक्षम है। जिस प्रकार तृण को बांटकर बनाई गई रस्सी से हाथी भी बांध लिया जाता है, उसी प्रकार मंत्रों की शक्ति से उस ईश्वर को भी मोह पाश में बांधा जा सकता है। मंत्रों की सही महत्ता को समझे बिना उनकी मान्यता को निर्धारित करना मूर्खतापूर्ण व हानिकारक है। सच तो यही है कि हम मंत्रों का सही उच्चारण करके उनकी शक्ति से कोई भी कार्य कर सकने में सक्षम हो सकते हैं।

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