31. कर्म बड़ा या भाग्य

ऊँ
श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

कर्म बड़ा या भाग्य, यह एक ऐसा प्रसन्न है, जिसके अंतिम निष्कर्ष पर एक मत से नहीं पहुंचा जा सकता। भाग्य के संदर्भ में बहुत पुराने दौर से दो परस्पर विरोधी विचार धाराएं रही  है। एक के अनुसार मनुष्य उस से बंधा हुआ है, जो उसके भाग्य में पहले से ही लिख दिया गया है। वह उससे बाहर नहीं निकल सकता और वही करेगा जो उसके भाग्य में लिखा है। दूसरे मत के अनुसार मनुष्य स्वतंत्र है। वह जो चाहे वह करे, लेकिन जो भी कर्म करेगा उसका परिणाम उसे हर हाल में भुगतना पड़ेगा। इन दोनों विचारधाराओं में से कौन-सी सही है, यह कहना उतना ही कठिन है, जितना यह बताना कि पहले मुर्गी आई या अंडा। इस बारे में धर्म ग्रंथों और वैज्ञानिकों की धारणाओं में भी काफी भेद मिलता है।

जिसका सूक्ष्म रूप से वर्णन इस प्रकार है- धर्म ग्रंथों में परस्पर विरोधी विचार मिलते हैं। ऋग्वेद में तो एक पूरा प्रश्न भाग्य के पूर्व लिखित होने बनाम मनुष्य द्वारा खुद भाग्य को लिखे जाने को लेकर है। रामचरितमानस में तुलसीदास का एक जगह तो यह विचार है कि सब कुछ पहले से ही निर्धारित और लिखा हुआ है। जब ज्ञानी होने के बावजूद रावण सीता का हरण कर लेता है तो तुलसीदास लिखते हैं- “जाको प्रभु दारुण दुख देही, ताकी मति पहिले हर लेही”। यानी प्रभु को जिसे दुख देना होता है, उसकी बुद्धि वह पहले ही छीन लेते हैं। लेकिन रामचरितमानस में ही तुलसीदास एक दूसरी जगह पर लिखते हैं- “कर्म प्रधान विश्व रचि राखा,जो जस करहिं सो तस फल चाखा”। यानी जो जैसा कर्म करेगा, उसको वैसा ही परिणाम भुगतना पड़ेगा, जिससे यह स्पष्ट है कि भाग्य में पहले से कुछ नहीं लिखा हुआ। सब कुछ कर्म पर निर्भर होता है। महाभारत में कर्मफल का सिद्धांत समझाते हुए कृष्ण ने धृतराष्ट्र से कहा- “जैसे बछड़ा सैकड़ों गायों की टांगों में से होता हुआ अपनी मां को तलाश ही लेता है, वैसे ही हमारे कर्म हम पर हावी हो जाते हैं”। बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा के अनुसार- “हमें अपने कर्मों पर कोई नियंत्रण नहीं होता। हमारे सारे अनुभव हमारे पिछले कर्मों का नतीजा हैं। मृत्यु तीन प्रकार की होती है- हमारे कर्मों के परिणाम स्वरुप, जब हमारी उपयोगिता समाप्त हो जाती है और दुर्घटना के कारण। लेकिन इन तीनों का आपस में गहरा संबंध है, जो पिछले कर्मों की वजह से है। इसी तरह बीमारी भी कर्मों की वजह से ही होती है”। बहरहाल इस बहस का कोई अंत नहीं है कि कर्म और भाग्य में प्रबल क्या होता है?

सभी स्वयं को सही मानते हैं। सबकी अपनी मान्यता है। वैज्ञानिकों के बारे में कहा जाता है कि वे पूर्व निर्धारित भाग्य में विश्वास नहीं रखते। काफी हद तक यह बात सही भी है। लेकिन विख्यात वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन का कहना था हर चीज पूर्व निर्धारित है, आरम्भ से लेकर अंत तक। सब पर उन बलों की हुकमरानी है, जिन पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है। एक कीड़े से लेकर तारे तक के साथ क्या होगा, यह सब पहले से ही तय है। मानव, सब्जियां या कॉस्मिक डस्ट यानी हम सभी उस रहस्यमय धुन पर नाच रहे हैं, जो फासले पर रहकर एक अदृश्य संगीतकार बजा रहा है। भगवान श्री कृष्ण ने गीता में स्वयं कहा है- “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन”- अर्थात तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। यहां पर श्री कृष्ण खुद कह रहे हैं- “कि कर्म प्रधान है”।

कर्म और भाग्य के संबंध में एक कहानी सुनाना चाहती हूं- एक चाट वाला था। जब भी उसके पास चाट खाने जाओ तो ऐसा लगता कि वह हमारा रास्ता देख रहा हो। हर विषय पर उसको बात करने में बड़ा मजा आता था। कई बार उसे कहा कि भाई देर हो जाती है, जल्दी चाट लगा दिया करो, पर उसकी बात खत्म ही नहीं होती। एक दिन अचानक उसके साथ मेरी कर्म और भाग्य पर बात शुरू हो गई। तकदीर और तदबीर की बात सुन मैंने सोचा कि चलो आज उसकी फिलासफी देख ही लेते हैं। मैंने उससे एक सवाल पूछ लिया। मेरा सवाल उस चाट वाले से था कि- आदमी मेहनत से आगे बढ़ता है या भाग्य से? उसने जो जवाब दिया, उसके जवाब को सुनकर मेरे दिमाग के सारे जाले साफ हो गए। वह चाट वाला मुझसे कहने लगा, आपका किसी बैंक में लाकर्स तो होगा? मैंने कहा हां, तो उस चाट वाले ने मेरे से कहा कि उस लाकर की चाबियां ही इस सवाल का जवाब हैं। हर लाकर की दो चाबियां होती हैं, एक आपके पास होती है और एक मैनेजर के पास। आपके पास जो चाबी है वह परिश्रम और मैनेजर के पास वाली चाबी है वह भाग्य। जब तक दोनों चाबियां नहीं लगती, लाकर का ताला नहीं खुल सकता। आप कर्म योगी पुरुष हैं और मैनेजर भगवान। आपको अपनी चाबी भी लगाते रहना चाहिए, पता नहीं ऊपर वाला कब अपनी चाबी लगा दे। कहीं ऐसा ना हो कि भगवान अपनी भाग्य वाली चाबी लगा रहा हो और हम परिश्रम वाली चाबी न लगा पायें और ताला खुलने से रह जाए। मेरे विचार में न कर्म बड़ा है और न भाग्य। कर्म और भाग्य एक दूसरे के पूरक हैं। जब हम भाग्य की रेखाएं देखते हैं जो हमारी हथेली में मौजूद हैं, तो उनसे पहले उंगलियां आती हैं, जो हमें कर्म करने की प्रेरणा देती हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश किसी के हाथ नहीं होते तो इसका अभिप्राय यह नहीं है, कि उसका भाग्य नहीं है और वह कर्म नहीं कर सकता। हमारे पिछले जन्मों के कुछ संचित कर्म होते हैं, जो भाग्य बनकर हमारे जीवन में प्रवेश करते हैं।

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