34. मानव धर्म

ऊँ
श्री गणेशाय नम्ः
श्री श्याम देवाय नम्ः

मानव धर्म का आदर्श एवं इसकी पृष्ठभूमि अत्यंत ऊंची है, तथा इसके अनुसार जीवन जीने में मानव-जीवन की वास्तविकता निहित है। मानव धर्म, सभ्यता एवम संस्कृति की रीढ़ के सदृश है। इसके बिना सभ्यता एवं संस्कृति के विकास की कल्पना करना असंभव है। मानव धर्म की वास्तविकता एवं उपादेयता इसी में है कि मनुष्यत्व के विकास के साथ ही विश्व भर के लोग सुख, शांति एवं प्रेम भाव से रहें। लेकिन आज के समय में मूल्यों से रहित शिक्षा मनुष्यों को मानवता की बजाय दानवता की ओर लिए जा रही है। आज मनुष्य वासनाओं के वशीभूत होकर विषय भोग के साधनों को एकत्रित करने में लगा हुआ है। वह इतना स्वार्थी हो गया है कि उसने उचित और अनुचित का ख्याल रखना भी छोड़ दिया है। उसे इस बात का आभास भी नहीं है कि धन का संचय करना राष्ट्र की गति को रोक देता है। जैसे नदी-नालों का पानी गतिशील होने के कारण निर्मल बना रहता है, जबकि जोहड़ तालाब का पानी एक जगह पर खड़े रहने के कारण दूषित हो जाता है। उसी प्रकार मानव का धर्म है कि जब तक वह समाज, परिवार, राष्ट्र, सभ्यता, संस्कृति के बारे में सोचता है या कार्य करता है, व नदी-नालों के पानी की तरह गतिशील रहता है, तब तक वह फूलों की तरह महकता रहता है। लेकिन जिस दिन जोहड-तालाब के पानी की तरह स्थिर हो गया, उसी दिन वह मुरझाए हुए फूलों की तरह हो जाएगा।

ऐसी स्थिति में विचार कीजिए कि ‘वसुधैव कुटुंबकम‘ वाला हमारा मूल मंत्र कहां चला गया। विश्व के सभी मनुष्य जब एक ही विधाता के पुत्र हैं और इसी कारण यह संपूर्ण संसार एक विशाल परिवार के समान है, ऐसे में मनुष्य इतना स्वार्थी कैसे हो जाता है। वह कैसे भूल जाता है कि संसार के सभी धन-संपत्ति और साधन उस निरंकारी ब्रह्म  स्वरूप परमात्मा के दिए हुए हैं, जिसका हम अंश है। मानव धर्म सभी मनुष्यों के साथ स्नेह भाव का मूल मर्म समझता है क्योंकि मानवता मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म है। जाति, संप्रदाय, वर्ण, धर्म और देश आदि के भेदभाव के लिए यहां कोई स्थान नहीं है। मानव धर्म का आध्यात्मिकता और नैतिकता से गहरा संबंध है। क्योंकि प्राणी मात्र में रहने वाली आत्मा उसी परमपिता परमेश्वर का अंश है। प्रत्येक में एक ही जगत नियंता प्रभु का प्रतिबिंब झलकता है। इसलिए हमें प्रत्येक मनुष्य के प्रति आदर भाव बनाए रखना चाहिए।

यदि कोई मानव सदाचारी नहीं है अथवा चारित्रिक एवं नैतिक आदर्शों में उसकी आस्था नहीं है। वह ईश्वरीय सत्ता में भी विश्वास नहीं करता। इसके अतिरिक्त सात्विकता, सहनशीलता, सहृदयता, परोपकारिता आदि सद्गुण उसमें नहीं हैं। तब यह स्वीकार करना होगा कि अभी उसने मानव धर्म का स्वर-व्यंजन भी नहीं सीखा है। वास्तव में मानव धर्म के विनाश हेतु मानव ने चहुंओर स्वार्थ वश एक संकीर्ण घेरा बना रखा है। जिसके बाहर वह निकल नहीं पाता। वहीं उसे तोड़े बिना कोई भी मानव, मानवतावादी नहीं बन सकता। वर्तमान भौतिक युग में यदि मनुष्य ने मनुष्य के साथ सद्व्यवहार नहीं सीखा तो भविष्य में इसकी भारी क्षति उठानी पड़ेगी। इसलिए अपने हृदय को परमोदार तथा सरल बनाने की नितांत आवश्यकता है। इसके लिए परमात्मा रूपी पयोधी में स्नान की नितांत आवश्यकता है, जो अत्यंत आनंद की अनुभूति भी करवाएगा। लेकिन आज के मानव की स्थिति उस व्यक्ति के समान है जो समुद्र में गोता लगाकर मोती प्राप्त करने के स्थान पर, किनारे पड़ी सीप और कौडियों को चुनकर ही प्रसन्न हो रहा है। मानव जीवन प्राप्त होना दुर्लभ है। इस जन्म को प्राप्त करके भी यदि हम निर्जीव वस्तुओं का संग्रह करने में लगे रहे तो हमारा जीवन व्यर्थ है। क्योंकि ईश्वर भक्ति तो केवल मनुष्य जीवन में ही संभव है। हमें यह मानव शरीर नौका के समान संसार रूपी सागर से पार होने के लिए मिला है। इसलिए मानव धर्म का प्रमुख लक्ष्य संसार रूपी उधान से सुगंधित पुष्पों को संग्रहित करना होना चाहिए।

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