40. जीवन मंथन

श्री गणेशाय नम्ः

श्री श्याम देवाय नम्ः

प्रत्येक मनुष्य कर्मों के अनुसार ही अपनी मनोवृत्ति एवं फल को प्राप्त करता है। कर्मों के अनुसार ही उसके भाग्य का निर्माण होता है। सृष्टिकर्त्ता ने सभी प्राणियों को उनके कर्मों के अनुसार शरीर दिए हैं। उसकी रचना को बिगाड़ने या मिटा देने का हमें कोई अधिकार नहीं है। सभी मनुष्य अपने कर्मों को करने के लिए स्वतंत्र हैं। पाप कर्मों में लिप्त मनुष्य अपने कर्मों के अपराध बोध के कारण अशांत रहता है। इसलिए उसमें नकारात्मक भाव जागृत होकर उसे तरह-तरह की व्याधियां घेर लेती हैं। नकारात्मकता उसके मानस-पटल पर अपना औचित्य स्थापित कर लेती है। वह लोभ के वशीभूत होकर, शास्त्रों की मर्यादा को तोड़कर,अन्याय द्वारा दूसरों की वस्तुओं पर जबरन कब्जा करने लगता है।वह पाप कर्मों में इतना लिप्त हो जाता है कि— उसे यह स्मरण ही नहीं रहता कि अनेक योनियों में,न जाने कितने भोगों को भोगा है। कितने पुण्य- कर्म किए हैं, तब जाकर हमें यह दुर्लभ मानव शरीर मिला है। इसे प्राप्त करने के बाद भी यदि हम पाप कर्मों में लिप्त रहे, हम धर्म विरोधी कार्य करते रहे, तो ये हमारे लिए ऐसी ही सिद्ध होंगे जैसे— किसी ने समुद्र में गोता लगाने के बाद भी मोतियों के स्थान पर कोड़ियां ही एकत्रित की हों, हम इस संसार में अपने कर्मों का पिटारा लेकर ही अवतरित हुए थे। यह धन- ऐश्वर्य हमारे साथ जाने वाला नहीं है। फिर क्यों व्यर्थ में इन अनावश्यक ईंट,पत्थरों और चंद्र धातु के टुकड़ों के लिए अपना अमूल्य जीवन नष्ट करें। दूसरी तरफ धर्म मार्ग पर चलने वाला मनुष्य कर्मों के अनुरूप सकारात्मक स्थिति प्राप्त करता है। जिससे उसे परमानंद की अनुभूति होती है। परमानंद वास है— दिव्यता का, सभी देवों का। केवल मानव शरीर में ही इसे पाया जा सकता है।अपराध बोध से ग्रस्त मनुष्य संसार को नकारात्मक भाव एवं अशांति में ही छोड़ता है। जबकि धर्म मार्ग पर चलकर मनुष्य परम शांति की स्थिति में परमानंद में बिना मानसिक कष्ट के विलीन हो जाता है और यह अटल सत्य है कि— नए जन्म में जीव अपने पुराने कर्मों के अनुसार अपनी मनोवृत्ति प्राप्त करता है। धर्म मार्ग पर चलने वाला मनुष्य सर्दी- गर्मी, भूख- प्यास, मान-अपमान, सुख-दुख, हर्ष- शोक इत्यादि द्वन्द्वों को सहन करते हुए, अपने पथ पर निरंतर आगे बढ़ता जाता है। जैसे कुशल सारथी, चंचल घोड़ों को उबड़-खाबड़, ऊंची- नीची भूमि पर चलाता हुआ रथ को अपने गंतव्य स्थल तक पहुंचाने में सफल होता है, उसी प्रकार धर्म परायण व्यक्ति भी अपने जीवन में आने वाले सभी अवरोधों को पार करते हुए निरंतर अपने कर्त्तव्य पथ पर अडिग रहकर आगे ही बढ़ता जाता है।धर्म के मार्ग पर चलते हुए,जिसने तप के द्वारा अपने शरीर को तपाकर कष्टों को सहन करने योग्य नहीं बनाया वह कच्चा है। जैसे कच्चे घड़े में पानी नहीं ठहरता, उसी भांति बिना कष्टों के धर्म के मार्ग पर नहीं चला जा सकता। सनातन धर्म में वर्णित सागर मंथन की कथा हर युग में प्रासंगिक है। इसमें देवताओं ने अमृत और राक्षसों ने मदिरा पान किया था। वह अमृत और मदिरा अपनी प्रवृत्ति से पाता है। इस प्रसंग में स्वयं भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर राक्षसों को मदिरा का पान कराया था। यहां मदिरा से मेरा तात्पर्य नकारात्मक प्रवृत्ति से है। यह नकारात्मक प्रवृत्ति ही राक्षस रूप है। जो मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार प्राप्त करता है, तथा अपने कर्मों की मदिरा पीकर अपना विनाश करता है। सागर मंथन की कथा के अनुसार देवताओं ने अमृत का पान किया था। यह सकारात्मकता की ओर संकेत करता है। धर्म मार्ग पर चलने वाला मनुष्य अमृत पीने का अधिकार रखता है। अपने आचरण को धर्म के अनुसार रखने वाला मनुष्य सम योग की स्थिति में रहकर सदैव परमपिता से जुड़कर अमृत रूपी शांति तथा परम आनंद का अनुभव करता है।मानव जीवन रूपी सागर मंथन की यह सबसे बड़ी मणियां, मोती उसे प्राप्त हो जाती हैं। अंतिम क्षणों में अक्सर प्रत्येक मनुष्य इस तत्व को महसूस करता है —कि मैंने जीवन रूपी समुद्र मंथन में नकारात्मक कर्म रूपी मदिरा क्यों चुनी? लेकिन शिशु हाथी की तरह हम सभी भी अपने जीवन में कई मानसिक विकारों से ग्रसित होते हैं, जो हमारी सफलता के रास्ते में बहुत बड़े अवरोध उत्पन्न करते हैं। जैसे हाथी के बच्चे को शुरू में मोटी जंजीरों से बांधा जाता है। वह उस जंजीर को तोड़कर स्वतंत्र होने के लिए जी जान से प्रयास करता है। लेकिन असफल रहता है। शिशु हाथी के जीवन की यही हार भविष्य में उसकी नियति बन जाती है। बड़ा होने पर चाहे उसे किसी धागे से भी क्यों नहीं बांधा जाए, वह उसे तोड़कर आजाद होने के लिए प्रयास ही नहीं करता। इसी प्रकार हम भी इस भौतिक संसार की मोह माया रूपी जकड़न से अपने आप को स्वतंत्र नहीं करा पाते और स्वयं को अत्यंत असहाय महसूस करते हैं। जबकि सत्कर्म के मार्ग पर चलने वाले मनुष्य को परम शांति की अनुभूति होती है। मनुष्य को इस अटल सत्य को समझकर जीवन रूपी सागर मंथन में अमृत की ही खोज करनी चाहिए। उसे अपने कर्तव्य पथ से विचलित ने होकर आगे ही बढ़ता रहना चाहिए और अपने अमूल्य जीवन को सफल बनाना चाहिए।

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