41. समय का महत्व

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

हमारे जीवन रूपी चक्र में समय का अमूल्य योगदान है। जीवन की परिभाषा ही समय से है, क्योंकि जीवन समय से ही बनता है। समय का सदुपयोग जीवन को सार्थक और सफल बना देता है। दूसरी तरफ समय का दुरुपयोग जीवन को नर्क बना देता है। समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता, वह निरंतर अज्ञात दिशा में जाकर विलीन होता रहता है। इसलिए हमारा परम कर्त्तव्य होना चाहिए कि हम समय का पूरा -पूरा सदुपयोग करें। समय परमात्मा से भी महान् है। भक्ति साधना द्वारा परमात्मा का साक्षात्कार कई बार किया जा सकता है, लेकिन गुजरा हुआ समय पुनः नहीं मिलता। यह हमारे हाथ से रेत की तरह फिसल जाता है।

संत कबीर ने कहा है –जो काम कल करना है, उसे आज कर और आज करना है, उसे अभी कर। कल पर छोड़ देने से समय हाथ से निकल जाएगा, फिर उसको कब करेगा। इसलिए प्रत्येक काम का अवसर होता है। अवसर वही है, जब वह काम सामने पड़ा है। अवसर निकल जाने पर काम का महत्व समाप्त हो जाता है तथा बोझ बढ़ता जाता है। निश्चित रूप से इन बातों को कहने के पीछे एक बड़ा उद्देश्य यह है कि- मैं,आपके मन और मस्तिष्क में समय की सर्वोत्कृष्टता एवं उसके अस्तित्व को जागृत कर सकूं। यदि इसमें मुझे थोड़ी-सी भी सफलता मिल गई, तो आपको मेरे इस अनुरोध के अनुरूप अपने जीवन को जीने में सफलता मिलने की संभावना बढ़ जाएगी कि— समय पर कार्य करना ही जीवन को जीना है। व्यवहार में होता यह है कि हमारा मस्तिष्क अतीत की गोद में बैठा रहता है या फिर भविष्य में जाकर कल्पनाओं की उड़ाने भरता रहता है। वह अपना कीमती समय, जो वर्तमान में रहने से है, उसको नष्ट करता रहता है। जिसके परिणाम स्वरूप हम हमेशा तनाव, दबाव और चिंताओं में दबे रहते हैं। ।हमारा दम घुटता रहता है, हमारी चेतना सिसकती रहती है। हमारे कर्म की तेजस्विता घट जाती है। इसका सीधा और तत्काल प्रभाव हमारे भविष्य पर पड़ता है। इस प्रकार हम समय के महत्व को न समझने की नादानी कर बैठते हैं, जिससे हम समय को एक ऐसे दुष्चक्र का शिकार बना देते हैं कि—न तो भविष्य संवर पाता है और न ही हम वर्तमान समय को जी पाते हैं।

हमारा यह अमूल्य जीवन जो वर्तमान समय के असंख्य छोटे-छोटे टुकड़ों से जुड़कर बनता है, उसका सारा रस निचुड़ जाता है। उसके आनंद के सारे स्रोत सूख जाते हैं। क्या यह हमारे आज के जीवन की बड़ी विडंबना नहीं है? अपने जीवन के उन क्षणों को टटोलें, जिन क्षणों में आप वर्तमान समय पर मौजूद थे। उदाहरण के तौर पर दोस्तों के साथ मटरगश्ती करते हुए, गप्पे मारते हुए, सिनेमा देखते हुए, संगीत सुनते हुए, अपने बच्चे के जन्म की खबर या इसी तरह की कोई अच्छी सूचना सुनते हुए और कभी- कभी तो ऐसा होता है कि—आप अचानक अपने हाथ में एक लंबी खरोंच देखते हैं, लेकिन आपको पता ही नहीं होता कि यह खरोंच आपको कब और कहां लगी थी। यह सब जीवन के सच्चे एवं व्यवहारिक उदाहरण हैं कि— उन क्षणों में आप वर्तमान समय को जी रहे थे। आपकी चेतना की संपूर्ण ऊर्जा वर्तमान समय के एक बिंदु के अग्रभाग पर इतनी केंद्रित हो गई थी कि— आपको अपने आसपास का एहसास ही नहीं था, न तो आप अतीत में थे और न ही भविष्य में। आप पूरी तरह समय का लुत्फ उठा रहे थे। क्योंकि आप आनंदित थे और उन क्षणों में इतने खोए हुए थे की— खरोंच लगने वाले दर्द का एहसास ही नहीं हो पाया।

यदि हमारे पास बच्चे जैसा मन हो जाए और समय के सदुपयोग के प्रति पागलपन आ जाए तो हम हर क्षण को उत्सव के रूप में जीने लगेंगे। जब हम समय के महत्व की बात करते हैं, तो इसका स्वरूप लंबाई में नहीं होता। यह एक छोटे बिंदु से भी छोटा होता है। हां इसकी गहराई अनुमान से परे होती है। इसलिए वर्तमान समय को जीना इसकी गहराई में उतर कर ही संभव हो पाता है। लेकिन हम अपनी जवानी के समय को विश्राम के नाम पर नष्ट कर देते हैं। यह घोर मूर्खता है। क्योंकि यही वह समय है, जिसमें मनुष्य जीवन के भाग्य का निर्माण कर सकता है। जिस तरह लोहा ठंडा पड़ जाने पर घन पटकने से कोई लाभ नहीं, उसी तरह अवसर निकल जाने पर मनुष्य का प्रयत्न व्यर्थ चला जाता है। विश्राम अवश्य करें। अधिक कार्य क्षमता प्राप्त करने के लिए विश्राम आवश्यक है, लेकिन उसका समय निश्चित करें।

समय बड़ा मूल्यवान है। उसे किफायत से व्यय करें। जितना समय रूपी धन को बचाकर, उसे आवश्यक उपयोगी कार्यों में लगाएंगे, उतनी व्यक्तित्व की महत्ता एवं हैसियत बढ़ेगी।आदत पड़ जाने पर स्वंय ही बड़ा आनंद आएगा। आपको अमुक दिन,अमुक गाड़ी में, अमुक जगह जाना है और आप गाड़ी की सीटी देने के एक मिनट बाद स्टेशन पहुंचे, तो फिर वह गाड़ी, वह दिन, वह समय कभी नहीं मिलेगा। निश्चित समय निकलने के बाद किसी दफ्तर में जाएं, तो निश्चित है, वह काम नहीं होगा। अपने काम और अपने समय में तालमेल बनाकर रखें तभी आप अपने समय का सही तरह से सदुपयोग कर पाएंगे।

आलस्य समय का सबसे बड़ा शत्रु है। यह कई रूपों में मनुष्य पर अधिकार जमाता है।कई बार कुछ काम किया कि विश्राम के बहाने हम अपने समय को बर्बाद करने लगते हैं, वैसे बीमारी, तकलीफ आदि में विश्राम करना बुरा नहीं है।लेकिन जैसे ही ठीक हो गए, तुरंत अपने काम में लग जाओ। समय की महत्ता का गुणगान करते हुए हमारे मनीषियों ने कहा है –कि समय को रेत की तरह हाथ से न फिसलने दो। जैसे रेत का एक-एक कण हमारे हाथ से फिसल जाता है और हमारे हाथ खाली हो जाते हैं। उसी तरह समय है, जो एक बार हमारे हाथ से छूट गया तो, फिर कभी वापस नहीं आएगा।

इसलिए वर्तमान समय का भरपूर आनंद उठाने के लिए हमें अपने विचारों को काबू करना होगा और इसकी विधि है— ध्यान। ध्यान यानी कि विचारों का एक बिंदु विशेष पर टिक जाना। विचारों के रुकते ही हमारी चेतना में जीवन ऊर्जा का संचार होने लगता है। उर्जा की यही अधिकता और सघनता हमें समय की गहराई की यात्रा पर ले जाती है। समय का यह अनुभव विचारों के द्वारा संभव नहीं हो सकता। इसके लिए ऊंचे स्तर की संवेदनशीलता की जरूरत होती है। हम अपने मन को हृदय में विलीन करके इस संवेदनशीलता को प्राप्त कर सकते हैं। आंतरिक रचनात्मक संघर्ष के बावजूद आप भी ऐसा कर सकने में सफल हो सकते हैं। जब एक बार हम अपने विचारों पर काबू पा लेते हैं, तो समय पर कार्य करने की आदत अपने आप बन जाती है और हम समय का सदुपयोग करना सीख जाते हैं।

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