47. बुराई का आईना

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

मनुष्य अपने प्रत्येक कार्य की प्रशंसा सुनने के लिए व्यग्र रहता है। लेकिन जरूरी नहीं कि हमेशा ऐसा हो। कभी कमियां भी तो निकल सकती हैं। इसलिए व्यक्ति को अपनी बुराई सुनने के लिए भी तैयार रहना चाहिए। आलोचना को समझने में हमें सावधान रहना चाहिए और शुभचिंतकों की बातों पर ध्यान देना चाहिए। क्योंकि वे सदैव हमारा हित चाहते हैं। वे अपनी राय देकर हमारी मदद ही करना चाहते हैं। कई बार हम कुछ ऐसी आदतें पाल लेते हैं, जो न सिर्फ आर्थिक रूप से नुकसान पहुंचा सकती हैं, बल्कि वर्कप्लेस (कार्यस्थल) और सामाजिक दायरे में भी हमारी इमेज खराब कर देती हैं। हमारा अहंकार ही हमारी सोचने- समझने की क्षमता को सीमित करके रखता है। जो कि हमारी व्यक्तिगत प्रगति एवं स्वस्थ संबंधों के लिए अच्छा नहीं है।

कई लोग हर वक्त एक व्यक्ति की बात दूसरे व्यक्ति को बताते रहते हैं, जो सामने न हों उसके बारे में कुछ न कुछ बातें करते हैं और जमकर उसकी बुराई करते हैं। ये लोग भले ही खुद को कितना भी होशियार समझें, लेकिन विवेकशील और समझदार लोगों को समझते देर नहीं लगती कि— जो व्यक्ति दूसरे की बुराई उनके सामने कर रहा है, वह किसी दूसरे के सामने उनकी भी बुराई करता होगा। कुछ लोग हमेशा खुद को वक्त का मारा या दूसरों द्वारा सताया बताते रहते हैं। उनका मुख्य उद्देश्य हर किसी से सहानुभूति की उम्मीद करना है।

अपनी असफलताओं या जमाने से पिछड़ जाने के लिए ये कभी अपनी खराब सेहत का रोना रोते हैं, तो कभी खराब मूढ का। ऐसे लोग हर समय अपनी किस्मत को कोसते रहते हैं। किसी की आदत होती है, कि किसी भी काम में कोई गड़बड़ी हो जाए या सफलता हासिल न हो, तो खुद पल्ला झाड़ कर दूर खड़े हो जाएंगे और सारा दोष अपने परिजनों या टीम के दूसरे साथियों पर थोप देंगें, क्योंकि किसी भी कार्य की सफलता या असफलता में पूरी टीम का हाथ होता है, किसी अकेले व्यक्ति का नहीं। कुछ की यह खराब आदत होती है कि वे हर जगह लंबी-लंबी डींग हांकते हैं। चारों तरफ बताते फिरते हैं कि यह कार्य उनकी वजह से हुआ है।

कंपनी आज जिस ऊंचाई पर है, उसमें उनकी भूमिका सबसे ज्यादा है। किसी भी परिवार में या कंपनी में किसी भी तरह की अचीवमेंट में हमेशा टीम वर्क ही होता है, भले ही किसी की भूमिका कम या ज्यादा हो सकती है। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि हर बात पर तारीफ करने वाले लोग, हमें लाभ की बजाय हानि या नुकसान अधिक पहुंचा सकते हैं। ऐसे लोग हमें आने वाले खतरों से आगाह नहीं करते और हमारी चेतना को भी जागृत करने की बजाय सुप्त करते हैं। इसलिए आलोचनाओं को स्वीकार करके हम वास्तविकता से अधिक परिचित होते हैं, अधिक जागरूक होते हैं और जीवन में दूसरों से सही व्यवहार करना भी सीखते हैं।

हम अपने जीवन में जितना आगे बढ़ते जाते हैं, उतनी ही आलोचनाएं भी बढ़ती हैं। एक संत ने अपने शिष्य की बुराइयों को दूर करवाने के लिए आशीर्वाद के रूप में उसे एक ऐसा आईना दिया, जिसमें व्यक्ति के मन के छिपे हुए भाव दिखाई देते थे। शिष्य ने परीक्षा लेने के लिए आईने का मुंह सबसे पहले गुरु की ओर कर दिया। शिष्य ने दर्पण में देखा कि— उसके गुरु में मोह, अहंकार, क्रोध आदि जैसे मनोविकार हैं। यह देख कर शिष्य को दुख हुआ। शिष्य ने फिर आईना लेकर अपने मित्रों और परिचितों की परीक्षा ली, तो उसे सभी के मन में कोई न कोई बुराई दिखाई दी। वह तुरंत गुरुकुल पहुंचा। तब उस गुरुजी ने आईने का मुख शिष्य की ओर कर दिया। शिष्य ने आईने में देखा कि उसके मन में भी अहंकार, क्रोध जैसी बुराइयां विद्यमान हैं। उन्होंने शिष्य को समझाते हुए कहा कि—यह आईना, मैंने तुम्हें अपनी बुराइयां देखकर, खुद में सुधार लाने के लिए दिया था, दूसरों की बुराइयां देखने के लिए नहीं। तुमने जितना समय दूसरों की बुराइयां देखने में लगाया, उतना समय खुद को सुधारने में लगाया होता, तो अब तक अच्छे मनुष्य में तब्दील हो गए होते।

हमें शुभचिंतकों की राय को बड़े ध्यान से सुनना चाहिए और उस पर अमल करना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति आलोचनाओं को सहन करना सीख लेता है, तो वह अपने आप को पहले से ज्यादा संतुलित बना पाता है। अपने परिजनों या सहयोगियों के साथ यदि हम प्रतिस्पर्धा का भाव रखते हैं, तो इससे न सिर्फ हमारा मन अशांत रहता है, बल्कि समाज में भी अशांति फैलती है। कुछ बड़ा मुकाम हासिल करने के लिए यह जरूरी है कि अपना आत्मविश्वास बनाए रखते हुए हम अपनी बुरी आदतों को सहज भाव से स्वीकार करें। क्योंकि समय के साथ हमें इस बात का अभ्यास भी हो जाता है, कि कौन- सी आलोचनाएं उचित हैं और कौन- सी अनुचित। किन्हें स्वीकारना चाहिए और किन्हें अस्वीकार कर देना चाहिए।

हमारे कार्यों में स्वाभाविक रूप से गलतियां हो जाती हैं और यदि कोई व्यक्ति उन गलतियों को उजागर करता है, तो उस पर नाराज होने की बजाय उन्हें स्वीकार कर लेना चाहिए। अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखते हुए अपनी आलोचनाओं को सुनना, उस पर विचार करना, कमियों को सुधारना, हमें आगे बढ़ने में सक्षम एवं समर्थ बनाता है। हमें अपने जीवन की सच्चाई को स्वीकार करना चाहिए। क्योंकि सत्य हमेशा कड़वा होता है। लेकिन फिर भी सत्य, सत्य ही होता है। स्वामी शंकराचार्य ने कहा— सत्य की परिभाषा मात्र इतनी है कि—जो सदा था, जो सदा है और जो सदा रहेगा।

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