49. शंकाग्रसित मन

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

मानव मन हमेशा शंकाग्रसित रहता है। यदि मन में तनिक भी शंका आ जाए और हम अपने मन और बुद्धि की धार बनाए नहीं रख सकते, तो सफल नहीं हो सकते। इस स्पर्धात्मक संसार में, जो थोड़ा भी शंकाग्रसित रहता है, पिछे धकेल दिया जाता है। ज्यादातर लोग जो भी हैं, जैसे भी हैं, पॉजिटिव में जीने की कोशिश करते हैं, लेकिन पूर्णतः नहीं। उनके मन में थोड़ी बहुत शंका अवश्य होती है, जिसके कारण वे अपने कार्य में पूर्ण रूप से सफलता प्राप्त नहीं कर पाते। कोई भी कार्य या विचार करते समय वे उस क्षण को समर्पित अवश्य होते हैं, नहीं तो कार्य ही नहीं कर पाएंगे।

यदि आप अपने को पूर्ण रूप से शंकारहित करना चाहते हैं, तो आपको अहंकार के पार जाना पड़ेगा। अहम् के पार जाने का अर्थ यही है कि आप अपनी सभी कमजोरियों पर विजय पा लेते हैं। तब आपका कायाकल्प हो जाता है। आपकी आंतरिक क्षमताएं पूर्ण विकसित हो जाती हैं। तब बिना किसी भेदभाव के आप संसार की सेवा के लिए भी तत्पर हो जाते हैं। यदि पूर्ण रूप से शंकारहित होना है तो आत्मज्ञान पाना जरूरी है। आत्मज्ञान पाना है, तो समर्पण का भाव जरूरी है। चाहे साधना कितनी ही तीव्र क्यों न हो, यहां तीव्र साधना का अर्थ है, लगन और प्रेम से साधना करना। किसी भी प्रकार की आध्यात्मिक साधना का उद्देश्य होता है— छोड़ना। वास्तव में ध्यान क्रिया नहीं है, वह ईश्वर या आत्मा से एकाकार होने के लिए हृदय की तीव्र उत्कंठा है। इस प्रक्रिया के दौरान जितनी गहराई में हम उतरते हैं, उतना ही हमारा अहंकार कम होता है और उतना ही हम हल्का महसूस करते हैं। अतः यह बात ठीक से समझ लें कि आध्यात्मिक साधना का एकमात्र उद्देश्य धीरे-धीरे, मैं, मेरा की भावना को छोड़ना है।

इस प्रक्रिया को भिन्न-भिन्न तरीके से कहा गया है। उसे अलग-अलग नाम दिया गया है। जब हम इस अवस्था में पहुंच जाते हैं, तो शंकारहित हो जाते हैं। क्योंकि हमारे मन को आत्मज्ञान की प्राप्ति हो जाती है। लेकिन हमारे मन में कोई न कोई शंका अवश्य लगी रहती है। क्योंकि वर्तमान समय में चलते रहने वाला मानव समाज या तो दौड़ रहा है, या फिर जड़ता का शिकार है। अब तो जीवन शैली में शामिल तकनीक और साधन दोनों मनुष्य को तब भी दौड़ा रहे हैं, जब वह कहीं बैठा है। आप घर या बाहर बैठे लोगों पर एक नजर डालिए, ज्यादातर लोगों के हाथ में स्मार्टफोन होगा और वे बैठे होंगे, लेकिन मन से दौड़ रहे होंगे। मन में वही शंकारूपी दानव ने अपना आधिपत्य स्थापित कर रखा होगा। यदि यह कहा जाए कि मनुष्य अब नींद में भी दौड़ रहा है, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। सोते हुए भी मनुष्य दौड़ रहा है, तो उसके पीछे शायद कारण यही है कि —हमने अपने सदियों के चिंतन को बेकार मान लिया है और अपने मन रूपी मंदिर में शंका को अपने जीवन की कमान सौंप दी है। जैसे एक सारथी सारे अश्वदल की लगाम अपने पास रखकर रथ का संचालन करता है, वैसे ही मन सारे जीवन के विभिन्न आयामों को साध रहा है।

जरा सोचिए हमारा मन कितना महत्वपूर्ण है। भारत में सदियों से मनुष्य के अंतःकरण को टटोला है और पाया है—कि यह हमारा मन ही है, जो सब कुछ रचता है। विज्ञान को मन पर नहीं, बल्कि साधनों पर भरोसा है। भारत का चिंतन बिल्कुल स्पष्ट है, यह मन से संचालित प्रत्येक कर्म को संकल्प से युक्त करने का अनुशासन रचता है। हमारा चिंतन यह भी जानता है कि यह मन ही है, जो सोते में भी चलता रहता है और मन में कोई ना कोई शंका भ्रमण करती रहती है। यह तो साइंस ने भी साबित कर दिया है, कि हमारे मन में डाली गई कोई शंका मौत का कारण भी बन सकती है।

मैं एक सच्ची घटना की तरफ ध्यान आकर्षित करना चाहती हूं—अमेरिका में जब एक कैदी को फांसी की सजा सुनाई गई तो, वहां के कुछ वैज्ञानिकों ने सोचा कि- क्यों न इस कैदी पर कुछ प्रयोग किया जाए। तब कैदी को बताया गया कि हम तुम्हें फांसी देकर नहीं, परंतु जहरीला कोबरा सांप से डंक मरवाकर मारेंगे और उसके सामने बड़ा- सा जहरीला सांप ले आने के बाद, कैदी की आंखें बंद करके, कुर्सी से बांधा गया और उसको सांप नहीं बल्कि दो सेफ्टी पिन चुभाई गई। फिर कैदी की कुछ सैकेंड में ही मौत हो गई। पोस्टमार्टम के बाद पाया गया कि कैदी के शरीर में सांप के जहर के समान ही जहर है। अब ये जहर कहां से आया जिसने उस कैदी की जान ले ली। वो जहर उसके खुद शरीर ने ही सदमे में उत्पन्न किया था। हमारे हर संकल्प से पॉजिटिव और नेगेटिव एनर्जी (ऊर्जा) उत्पन्न होती है और वह हमारे शरीर से उसके अनुसार हारमोंस उत्पन्न करती है। 75% बीमारियों का मूल कारण नकारात्मक सोच से उत्पन्न ऊर्जा ही है। आज इंसान खुद ही अपनी बर्बादी का कारण है। उसके मन में जो दानव रूपी शंका ने अपना रैन- बसेरा बना रखा है, वह उसको नकारात्मक सोचने पर मजबूर करती है और हमारा मन शंका से ग्रसित रहता है।

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