50. असंभव से संभव

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

कभी आपने सोचा है कि आपके जीवन को सबसे अलग क्या बनाता है? वह है असंभव से लगने वाले कार्य को संभव बनाना और यह कार्य करता है, आपका विश्वास तंत्र (बिलीफ सिस्टम) जो विशेष रूप से आपके खुद के विचारों से नियंत्रित होता है। जीवन में आपकी कामयाबी की बुलंदियां क्या होंगी, यह भी आपके स्वयं की धारणाओं पर ही निर्भर करता है। इतना ही नहीं अपनी सफलता और असफलता के लिए भी आप खुद ही जिम्मेदार हैं। भौतिक परिस्थितियां भी मजबूत बिलीफ सिस्टम (विश्वास तंत्र) के आगे बौनी हैं।

शरीर बीमारियों का घर है और मृत्यु की बीमारी हर व्यक्ति के लिए लाइलाज है। लेकिन मन की शक्ति इन बीमारियों से लड़ने का अद्भुत सामर्थ्य रखती है। स्टीफन हॉकिंग चिकित्सकीय संभाव्यता की भविष्यवाणी के बाद भी लंबे समय तक जीवित रहे, तो यह उनकी जिजीविषा और इच्छाशक्ति का ही परिणाम था। इतिहास और वर्तमान ऐसे कई व्यक्तियों की दास्तानों से भरा पड़ा है, जिन्होंने मृत्यु को भी अपनी अदम्य साहस शक्ति से विचलित करके उसे एक नए जीवन में रूपांतरित करने का करिश्मा किया। जिंदगी की जद्दोजहद पहले भी थी, आज भी हैं और आगे भी रहेगी। ऐसे समय में हमें अपने विचारों को इतना शक्तिशाली बनाना है, कि वे शाश्वत सत्य बन जाए। आपके ये विचार ही वे धारणाएं हैं, जो आपके लिए व्यक्तिगत नियम और कानून बन सकते हैं। ये आपके अनुभवों का निर्माण करने की भी क्षमता रखते हैं।

अगर हमें ज्ञात हो जाए कि हमारा बिलीफ इतना पावरफुल है तो क्या हम किसी कार्य को असंभव कह सकते हैं। वर्ष 1954 में रोजर बैनिस्टर 4 मिनट से भी कम समय में एक मील के रिकॉर्ड को तोड़ने वाले पहले धावक बने। हर बार जब वे प्रैक्टिस रेस करते, तो अपने दिमाग को 4 मिनट के अंदर रेस खत्म करने के लिए प्रशिक्षित करते, व अपनी टाइमर घड़ी को देख कर कहते 3:59। बाद में उन्होंने इस रहस्य को उजागर किया कि कुछ भी वास्तविकता में होने के लिए, वह पहले हमारे दिमाग में होना चाहिए। उन्होंने न केवल एक रिकॉर्ड तोड़ा, बल्कि अपने समय के सभी धावकों की उन आत्म-सीमित सीमाओं की एक वाधा को तोड़ दिया, जिन्होंने 4 मिनट-मील रिकॉर्ड को निराशाजनक रूप से असंभव मान लिया था। उनके अनुभव से प्रेरणा लेकर फिर न जाने कितने ही धावकों ने उनके रिकॉर्ड को तोड़ने की हिम्मत की।

परिस्थितियां सदैव एक समान नहीं होती। वे कभी मनुष्य के साथ होती हैं, तो कभी विपरीत। मनुष्य को हर समय परिस्थितियों से लड़ने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए। अस्तित्व की लड़ाई में विवेकवान् व्यक्ति ही सफलता की मंजिल चूम पाते हैं। लेकिन अक्सर संघर्ष की स्थिति में व्यक्ति का साहस घटने लगता है। वह इतना भयभीत होने लगता है कि— संघर्ष की चुनौती को स्वीकार करना ही छोड़ देता है। आप अपने बारे में क्या सोचते हैं, यह बहुत प्रभावशाली है। लेकिन हम जीवन भर इसी में फंसे रहते हैं, कि दूसरे हमारे बारे में क्या सोचते हैं। लेकिन इस धारणा को बदलने वाले अमेरिकी लेखक वेन डब्ल्यू डायर ने कहा है—जब आप मन से कुछ मानेंगे, तब आप उसे अपने अनुभव में देखेंगे। इसलिए आपको अपनी वास्तविकता और अनुभव को बदलने के लिए, विश्वास को बदलने की जरूरत है और यह रातों-रात तो नहीं हो सकता। वैसे एक तरीका यह है कि—आप अपने से वे अपेक्षाएं रखें जो आपने कभी सोचा भी नहीं था, कि आप ऐसा कर सकते हैं। इस तरह आपके लिए सफलता की नई संभावनाएं खुलती चली जाएंगी।

इसलिए जो व्यक्ति किसी कार्य को असंभव मानकर मेहनत और उसके लिए साहस जुटाने का प्रयास ही नहीं करता, उसके समक्ष ये मिसालें किसी बड़े साक्ष्य से कमतर नहीं हैं। जो लोग भाग्य के भरोसे बैठ जाते हैं, उनके लिए भाग्य के दरवाजे भी सदैव बंद ही रहते हैं। क्योंकि भाग्य भी उन्हीं का साथ देता है, जो कर्म करते हैं। जीवन में कुछ किए बिना ही जय- जयकार संभव नहीं है। व्यक्ति के कर्म ही उसे इस चराचर जगत् में यश, कीर्ति और वैभव के अलंकारों से अलंकृत कर सकते हैं। संघर्ष से मुंह मोड़ने वालों से जिंदगी की तमाम खुशियां भी मुंह मोड़ लेती हैं। दुनिया में जितने भी कुबेरपति हैं, उन्होंने अपनी शुरुआत बहुत ही छोटे से पड़ाव से की और वे परिणाम की चिंता किए बगैर निरंतर गतिशील रहे। उनके भाग्य ने भी उनका बखूबी साथ दिया और वे दुनिया के सरताज बन गए।

स्वामी विवेकानंद ने कहा था— उठो, जागो और दौड़ो और तब तक दौड़ते रहो जब तक आपको अपना लक्ष्य छोटा न लगने लगे। लेकिन हमारे समाज में लक्ष्य का पीछा करते हुए मनुष्य इतना हताश हो जाता है, कि वह अपनी कल्पना करना ही छोड़ देता है। अक्सर यू पी एस सी और आई आई टी जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर ऐसा हौवा बना दिया जाता है, कि कई छात्र उसमें सफल होने की कल्पना ही छोड़ देते हैं। उन्हें समझना होगा कि—यदि किसी व्यक्ति ने उस असंभव कार्य को संभव कर दिया है, तो आप क्यों नहीं कर सकते। इसके लिए सबसे पहले अपने बिलीफ और मान्यताओं के प्रति जागरूक होना होगा और उनकी जांच करें कि— क्या वे आपके लिए सकारात्मक तरीके से काम कर रहे हैं या वे आपके लिए बाधा बन रहे हैं? सही मायने में आपका अवचेतन मन ही सफलता में आपका साथी है और उसके पास असीमित शक्ति है।

27 thoughts on “50. असंभव से संभव”

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