60. प्रकृति एवं संघर्ष

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

मनुष्य जीवन में सफलता की राह संघर्ष से ही खुलती है। लेकिन जब हम जीवन में संघर्ष से पीछा छुड़ाकर भागने लगते हैं, तो इससे कई नई समस्याओं और संघर्षों को आमंत्रित करते हैं। इस प्रकार हम समाधान निकालने की बजाय समस्या में और गहरे फंसते चले जाते हैं। लेकिन यदि हम संघर्ष करते हैं, तो राह में आने वाली बाधाएं हमें अनेक गुणों से सुसज्जित कर जीवन का प्रत्येक पहलू समझा देती हैं। देखा जाए तो संघर्ष वास्तव में मानव जीवन का वह पहलू है, जो उद्देश्य प्राप्ति के लिए आवश्यक होता है।

संघर्ष करके ही व्यक्ति विकट परिस्थितियों को अपने लक्ष्य के अनुसार पलट सकता है। संघर्ष व्यक्ति में परिपक्वता विकसित करने में अहम् भूमिका निभाता है। जब परिपक्वता आ जाती है, तो मनुष्य के भीतर धैर्य जैसा मूल्यवान गुण उत्पन्न होता है। परिस्थितियां चाहे कितनी भी विकट हों, हमारे अनुकूल न होने पर भी, हम संघर्ष का रास्ता चुन कर आगे बढ़ सकते हैं। जब कोई भी मनुष्य अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए संघर्ष कर रहा होता है, तो उसमें प्रतिकूल अवस्था में विचलित न होने, जीवन की प्रत्येक बाधाओं और कठिनाइयों से स्वत: लड़ने की मानसिक स्फूर्ति और ऊर्जा आ जाती है, जो नकारात्मक विचारों को उसके पास फटकने नहीं देती और व्यक्ति संकल्पित होकर लक्ष्य प्राप्ति के लिए प्रतिबद्ध हो जाता है।

यह बिल्कुल भी आवश्यक नहीं है कि जीवन का प्रत्येक क्षण हमारे अनुकूल ही हों, ऐसे में हमें संघर्ष का रास्ता चुन कर आगे बढ़ना होता है। इसका अर्थ यह है कि— जो जीवन में संघर्ष करता है, वह अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेता है। यही सफलता का मार्ग होता है। क्योंकि सफलता की प्रत्येक राह संघर्ष से ही खुलती है। संघर्ष के वक्त हमें स्वयं को शांत बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होती है। परंतु इस स्थिति में संयत बने रहने में ही सफलता सुनिश्चित होती है।हमारे जीवन में परेशानियां, जीवन को गर्त में ले जाने के लिए नहीं, बल्कि आत्मबल और इच्छाशक्ति को मजबूत बनाने के लिए आती हैं। जिसने भी अपने आत्मबल को मजबूत बना लिया, वह समझो जग जीत गया। इसके विपरीत यदि किसी ने अपनी इच्छाशक्ति और आत्मबल को मजबूत नहीं किया, परिस्थितियां उन्हें निराश कर देती हैं और गर्त में ले जाती हैं। परिस्थितियों का दबाव उसे झुका देता है क्योंकि हम मानवीय गुण- दोषों से युक्त हैं। स्वार्थ और मोह-माया के वशीभूत रहते हैं। लाभ-हानि के चक्कर में पड़े रहते हैं। कर्म फल जल्दी मिलने की लालसा शायद हमें इन सब बातों पर खरा उतरने में बाधक बनाती है।

ऐसे समय में हमें प्रकृति से सीखने की जरूरत है। प्रकृति हमें अपने व्यवहार से बहुत कुछ सिखाती है। इतनी ऊंचाई से गिरने के बावजूद भी बारिश की बूंदे बिखर कर रचनात्मक कार्य करती हैं। प्यासी धरती को सींचती है और उसे हरियाली की चुनरी ओड़ा देती है। धरती को खुबसूरती से नवाजती है। झर-झर बहते झरने अलौकिक आनंद प्रदान करते हैं। सचमुच टूटना- बिखरना भी कहीं इतना खूबसूरत हो सकता है। यह हमें प्रकृति से सीखना चाहिए। पता नहीं कितनों ने धान या गेहूं की बालियों से अनाज निकलते देखा होगा। इतने जोर से उन्हें पटकते हैं, फिर अनाज के मोती जैसे दाने गिरने लगते हैं। पेड़ धरती के भीतर दफन होकर दाब और ताप सहकर कोयला बनते हैं। सैकड़ों वर्ष धैर्य रखकर हीरा बन जाते हैं। सोना कुंदन बनने के लिए असहनीय ताप को सहता है। प्रकृति हमें प्रत्येक क्षण संघर्ष करने की सीख देती है। वह हमें संदेश देती है कि— जीवन में कठिनाइयों से कभी घबराना नहीं चाहिए। हर परिस्थिति में भी उचित कर्म करते रहना चाहिए।

क्रोध, ईष्र्या और घृणा जैसी नकारात्मक शक्तियों से दूरी बनाकर रखनी चाहिए। नहीं तो यह हमारे सोचने समझने की ताकत को क्षीण कर देती हैं। जीवन में धैर्य के साथ किए गए कर्म का पर्याय कुछ भी नहीं होता। प्रकृति सबसे बड़ी शिक्षक है। वास्तव में कोई भी विपरीत परिस्थिति आप को सफल बनाने की ओर पहला कदम होती है। यदि हम ऐसे ही संघर्ष करते रहे, तो जीवन और सहज तथा आसान बन जाएगा।संघर्ष उपरांत मिली सफलता व्यक्ति को आत्मीय सुख, सकारात्मक ऊर्जा और आशाओं से परिपूर्ण कर देती है। वास्तव में देखा जाए तो संघर्ष मनुष्य के व्यक्तित्व को निखारकर उसकी पूर्ण क्षमताओं से एकाकार कराने का उपकरण है। संघर्ष ही सफलता प्राप्त करने की कुंजी है।

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