61. अपनी भूमिका पहचानें

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

यह विश्व एक रंगमंच है और ईश्वर उसके निर्देशक हैं। इस संसार के सभी प्राणी कठपुतली हैं और उनकी डोर उस परम ब्रह्म ईश्वर के पास है, जो हमें कठपुतली की तरह नचाते रहते हैं। हम सभी मनुष्य मानो रंगमंच के पात्र हैं। हमें कब और किस समय कितनी भूमिका निभानी है और कौन- सी भूमिका निभानी है, यह सब ईश्वर के हाथ में ही है। इसे इस प्रकार भी समझ सकते हैं कि जैसे—निर्देशक जो पिक्चर बनाता है, वह अपने सभी पात्रों से ऐसे ही एक्टिंग करवाता है, जैसे वह चाहता है, यानी अपनी पिक्चर के प्रत्येक पात्र को कठपुतली की तरह नचाता रहता है। ऐसे ही हमारे जीवन की डोर ईश्वर के हाथ में है। वह हमारा निर्देशक है और हम रंगमंच के पात्र हैं जैसे— निर्देशक को पता होता है कि हमें कौन-सी भूमिका निभानी है और हमारी भूमिका कितनी लंबी चलने वाली है। वैसे ही ईश्वर को पता है। इन सब का निर्धारण करना उस विधाता के हाथ में ही है। वही परमपिता परमेश्वर ही प्रत्येक पात्र की क्षमता, योग्यता, कुशलता, पात्रता का परीक्षण कर उन्हें उनकी क्षमता के अनुरूप भूमिका वितरित करता है।

जिस प्रकार एक एक्टर अपनी एक्टिंग से निर्देशक को खुश कर देता है, तो निर्देशक उसे अपनी अगली पिक्चर में और अच्छा रोल प्रदान करता है। उसी प्रकार जो मनुष्य अपनी एक्टिंग से ईश्वर को प्रभावित करने में सक्षम रहता है, उसकी भूमिका का विस्तार भी उसी अनुपात में होता रहता है और जो ईश्वर की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरते, उनकी भूमिका भी उसी अनुपात में सीमित होती जाती है। यहां एक्टिंग से अभिप्राय कर्मों से है, इस संसार रूपी रंगमंच पर जन्म लेने के बाद, जो जैसे कर्म करता है, उसको वैसा ही फल ईश्वर प्रदान करता है। हमारे कर्मों के अनुसार ही भाग्य का निर्माण होता है।
अपने उद्भव के समय से ही मनुष्य के मन में यह जिज्ञासा सदैव उत्पन्न होती रहती हैं कि— आखिरकार इस धरती पर मनुष्य के आने का उद्देश्य क्या है? उसकी भूमिका क्या है? क्या उसका जन्म लेना संघर्ष करके कुछ अर्जित कर लेना, बच्चे पैदा करना, फिर अपना और अपने परिवार का पालन-पोषण करते हुए, समय आने पर इस संसार को छोड़कर, चले जाना ही मनुष्य के जीवन का लक्ष्य है? क्या यही उसकी भूमिका है कि— इस संसार में बार-बार जन्म लो, संसार रूपी रंगमंच पर अपना रोल प्ले करो और जैसे ही रोल खत्म हो इस संसार को छोड़कर चले जाओ।
84 लाख प्रकार के जीव इस धरती पर जन्म लेते हैं। जीवन धारण करते हैं और यथा समय सभी जीव मृत्यु के आगोश में चले जाते हैं। मनुष्य भी इन्हीं में से एक जीव है जो इन्हीं की तरह जन्म लेता है। जीवन धारण करता है और यथा समय मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। लेकिन ईश्वर ने मनुष्य को बुद्धि और विवेक जैसे विशिष्ट बल से नवाजा है। ऐसा बल अन्य किसी जीव के पास नहीं होता। इसी कारण मनुष्य को इस धरती का श्रेष्ठतम प्राणी कहा जाता है। लेकिन मनुष्य अपने इन गुणों को पहचान ही नहीं पाता और वह हमेशा दुखों का रोना रोता रहता है। वह हमेशा ईश्वर से शिकायत करता रहता है कि यदि उसके जीवन की भी अन्य जीवों की तरह ही, यही अंतिम परिणति है, तो फिर वह विशिष्ट कैसे हुआ। लेकिन वह यह भूल जाता है कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे चार पुरुषार्थ पा लेना मनुष्य के जीवन का उद्देश्य है। इस उद्देश्य की पूर्ति करने की क्षमता केवल मनुष्य को ही मिली है, दूसरे किसी भी जीव को नहीं।

यदि मनुष्य किसी भी देवस्थान में जाकर अपनी निष्ठा व्यक्त करना धर्म समझता है तो क्षमा, अस्तेय, सत्य पवित्रता, क्रोध, कामादि पर नियंत्र करते हुए परमार्थ चिंतन भी धर्म की श्रेणी में आता है। अर्थ तो मनुष्य के पूरे के पूरे जीवन- व्यवहार का आधार ही है। किंतु अर्थ वही सार्थक है जो मेहनत और इमानदारी से अर्जित किया गया हो। काम भी तब तक पूर्ण करने योग्य है जब तक मर्यादा- विरुद्ध नहीं है और मुक्ति जन्म- मरण के असहनीय दुःख से छुटकारा देने वाली है। इसलिए मनुष्य को अपनी भूमिका पहचान लेनी चाहिए और जीवन में आने वाले दुखों को भी उसी प्रकार देखा जाना चाहिए कि अगर ईश्वर ने उन्हें दुख दिए हैं, तो उनका भार वहन करने की ताकत भी दी है।

ईश्वर की सत्ता ही सबसे बड़ी है। उन्होंने जो हमें अमूल्य जीवन दिया है, उसका हमें हर संभव, हर प्रकार से सदुपयोग कर उनकी अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए। ईश्वर ने हमारे लिए सब कुछ अच्छा ही रचा है। यह तो मनुष्य का कलुषित चिंतन और अल्पज्ञता है कि —वह श्रेष्ठतम में भी कुछ न कुछ नकारात्मक ढूंढ कर उसे एकदम विपरीत ही मानता चला जाता है। इसी कारण मनुष्य उचित अवसर प्राप्त करने के बाद भी अपनी योग्यता, क्षमता, अज्ञानता के कारण विपरीत दिशा में जाकर अवसर को गंवा देता है और अपना ही अहित कर बैठता है। नियत प्रारब्ध से अधिक व समय से पहले ही बहुत कुछ हड़प लेने की चाह ही हमें सत्कर्म के राजमार्गों से भटकाकर निरर्थक राह पर उन्मुख कर देती है। जहां से लाख चाहने पर भी मनुष्य सही राह पर नहीं आ पाता और वह हमेशा संघर्ष ही करता रहता है। यह सब कुछ इसी कारण होता है कि हम उस भूमिका को पहचान नहीं पाते, जिसे अभिनित करने के लिए ईश्वर ने हमें इस पृथ्वी पर भेजा है। यदि समय रहते मनुष्य ने अपनी भूमिका को नहीं पहचाना, तो उसका जीवन निरर्थक है। इसलिए हमें समय रहते हुए उस भूमिका को पहचान लेना चाहिए जो स्वयं ईश्वर ने हमें सौंपी है।

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