74. प्रन्नसता का महत्व

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

कहा जाता है कि— जिंदगी जिंदादिली का नाम है, लेकिन जिंदादिली के लिए प्रसन्नता अत्यंत आवश्यक होती है। क्योंकि प्रसन्न मनुष्य ही वास्तविक रूप में जिंदादिल होता है। इसके लिए यह परम आवश्यक है कि प्रत्येक परिस्थिति में वह आनंदित रहे, खुश रहे, परिस्थिति चाहे अच्छी हो या बुरी हो। जीवन में चाहे कितनी भी विकट परिस्थिति हो यदि किसी का मन आनंदित है, खुश है, तो वह सबसे बड़ा संपन्न मनुष्य है। आपको यह आभास होना अति आवश्यक है कि—प्रसन्नता कहीं नहीं मिलती, बल्कि यह एक ऐसा भाव है, जो हमारे स्वयं के अंदर से उत्पन्न होता है। परंतु हम यह भूल जाते हैं कि प्रसन्नता वस्तुओं या उपलब्धियों से नहीं, बल्कि अपने मन का स्वामी बनने और आत्मा से जुड़ने से मिलती है। कोई भी सफलता खुशी की गारंटी नहीं है और खुशी के लिए सफलता जरूरी नहीं है। ये एक- दूसरे को पोषण दे सकती हैं और वे हमें एक साथ मिल सकती हैं।

भौतिक संतुष्टि बाहरी है, जबकि खुशी आंतरिक है। जब संत खुशी के बारे में बात करते हैं, तो वे एक कस्तूरी हिरण की कहानी बताते हैं। कस्तूरी हिरण को जंगल में एक अत्यंत सम्मोहक गंध आती है और वह उसके पीछे दौड़ता रहता है और उसके स्रोत की निरर्थक तलाश करता है और उसे कभी यह एहसास ही नहीं होता कि गंध उसके खुद के शरीर से आ रही है। वह निरर्थक भटकने में अपना पूरा जीवन बिता देता है। इसी तरह हम खुशी की खोज करते हैं, जबकि हम इसे अपने खुद के भीतर पा सकते हैं। आज के तनाव भरे एवं प्रतिस्पर्धी दौर में प्रसन्नता हमसे दूर होती जा रही है। इसको एक अच्छी स्थिति नहीं कहा जा सकता। आज हर कोई अपनी जिम्मेदारियों में मशगूल है। सब अपनी चिंताओं में जी रहे हैं। सबकी अपनी- अपनी समस्याएं हैं। छोटे बच्चे भी कहते हैं कि— मेरी कोई नहीं सुनता, बोर हो रहा हूं। इसलिए अक्सर घर के लोग एक- दूसरे पर कुंठाएं निकालते हैं। इससे घर का माहौल तनावपूर्ण हो जाता है।

याद कीजिए कि आपकी अपने घर के सदस्यों से सकारात्मक बातें कब हुई थी। जो आपको सिर्फ दिन भर के लिए ही नहीं, बल्कि कई दिनों तक तरोताजा कर देती हैं। क्योंकि अपनों के साथ अच्छा यानी गुणवत्तापूर्ण संवाद हो जाए, तो यह सकारात्मक ऊर्जा से लैस कर देता है। इसके बाद घर के सभी सदस्य अपना- अपना काम बेहतर तरीके से कर पाते हैं। लेकिन आज के तनाव भरे माहौल में परस्पर संवाद स्थापित हो ही नहीं पाता, तो जरा सोचिए ऐसे में जब आप खुद परेशान या कुंठित महसूस कर रहे हैं, तो दूसरों को किस तरह से राहत दे पाएंगे, पर यह याद रखना है कि किसी एक को तो उदाहरण बनना ही पड़ेगा। कोई एक भी पहल करे तो सब प्रेरित होंगे। जरूरी नहीं तुरंत हो, लेकिन इससे जल्दी ही अच्छे संवाद का माहौल बन सकेगा। यदि आप स्वयं प्रसन्नचित होंगे तो दूसरों को भी प्रसन्न रखने में सहायक सिद्ध होंगे। क्योंकि प्रसन्नचित व्यक्ति में क्रोध जैसी नकारात्मक भावना नहीं होती। चिकित्सा विज्ञान भी यही कहता है कि— स्वस्थ रहना है तो दिल खोल कर हंसे। यह कई बीमारियों की अचूक दवा है। हंसने से मांसपेशियों की कसरत होती है, जिससे ब्लड सरकुलेशन ठीक रहता है। हम स्वस्थ और निरोगी शरीर को प्राप्त करते हैं। जब हंसने से हमें स्वास्थ्य लाभ होता है तो फिर हंसने से परहेज क्यों? क्यों न हम सभी ठहाका लगाकर हंसने की आदत को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना लें।

योग में मन को स्थिर करने के उपायों में प्रसन्नता का प्रमुख स्थान है। अगर हम समाज की नजरों से देखें तो हर हाल में प्रसन्न रहने और हंसने- हंसाने वाले मनुष्य सभी को ज्यादा पसंद आते हैं और ज्यादातर मनुष्य उनके संपर्क में रहना पसंद करते हैं। चेहरे की मुस्कुराहट दो अनजान लोगों को भी करीब ला देती है और दो अजनबीयों के बीच की दूरियों को मिटा देती है। भले ही लोगों की भाषा और समाज अलग-अलग हों लेकिन हंसी और मुस्कुराहट की भाषा सबके लिए एक ही होती है। दरअसल प्रसन्न मुद्रा और उल्लास प्राकृतिक सौंदर्य का अथाह समुद्र है। मनुष्य को चाहिए कि वह हंसी के इस समुद्र में डूबकर स्नान करें। इसलिए हम कह सकते हैं कि प्रसन्नता ही सुखमय स्वस्थ जीवन का आधार है। यदि आप स्वस्थ एवं दीर्घायु होना चाहते हैं, तो हमें अप्रसन्नता का भाव त्याग कर प्रसन्नता की ओर उन्मुख होना चाहिए।

2 thoughts on “74. प्रन्नसता का महत्व”

Leave a Reply