75. आध्यात्मिक प्रेम

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

प्रेम एक ऐसी अनुभूति है, जो इस नश्वर संसार में रहते हुए भी आनंद और खुशियों की बहार ला देती है। प्रेम के समक्ष लौकिक सभी मूल्यवान वस्तुएं मूल्यहीन हो जाती हैं। जिसके पास प्रेम की संपदा है, वह सौभाग्यशाली है। प्रेम के बिना तो हीरे, जवाहरात, मणि-माणिक्य से विभूषित शरीर भी आदर योग्य नहीं होता है। जिसके हृदय में प्रेम का संचार है, उसे सभी प्रेम करते हैं और उसको सभी चाहते हैं, सभी उसका आदर करते हैं, सम्मान करते हैं। लेकिन इस प्रेम को बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि— हम स्थाई प्रेम से भरपूर रहें। हमेशा रहने वाला प्रेम केवल प्रभु का प्रेम है, जो कि दिव्य एवं आध्यात्मिक है।

जब हम दूसरों से प्रेम करते हैं, तो हम उसके बाहरी रूप पर ही केंद्रित होते हैं और हमें जोड़ने वाले आंतरिक प्रेम को भूल जाते हैं। सच्चा प्रेम तो वह है, जिसका अनुभव हम दिल से दिल तक और आत्मा से आत्मा तक करते हैं। बाहरी रूप तो एक आवरण है जो इंसान के अंतर में मौजूद सच्चे प्रेम को ढक देता है। इसे, इस प्रकार से समझा जा सकता है कि— जैसे हम खाने के लिए कुछ सामान खरीदते हैं तो वह किसी थैले में या डिब्बे में पैक होता है। तब हम उस थैले या डिब्बे को नहीं खाते बल्कि उसके अंदर मौजूद खाने को ही खाते हैं। ठीक उसी तरह जब हम घर, परिवार, समाज, भाई-बहन, साथी, पशु- पक्षी, प्राणी से प्रेम करते हैं, तो हम उन सभी के सार- रूप से प्रेम प्रकट कर रहे होते हैं। बाहरी आवरण या हमारा शारीरिक रूप वह नहीं, जिससे हम वास्तव में प्रेम करते हैं। वास्तव में तो हम उस व्यक्ति के सार से प्रेम करते हैं जो कि उसके अंतर में मौजूद है।

प्रेम से परमात्मा की प्राप्ति होती है क्योंकि ईश्वर मात्र प्रेम के भूखे होते हैं। प्रेम के अलावा उन्हें अन्य वस्तु की आवश्यकता नहीं होती। क्योंकि प्रेम में अद्भुत शक्ति होती है। प्रेम में इतना आकर्षण होता है कि सभी उसके वशीभूत हो जाते हैं। प्रेम से ही परमात्मा को भी वश में करके उनका प्रतिपल सानिध्य पाया जाना संभव है। ईश्वर को जो हम कुछ भी समर्पित करते हैं, भेंट चढ़ाते हैं, वे उसे प्रेम के कारण ही स्वीकार करते हैं। साइंस भी यह स्वीकार करता है कि— क्रिया की प्रतिक्रिया प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में निश्चित होती है। जब हम किसी से प्रेम करते हैं तो उसके परिणाम स्वरूप हमें भी प्रेम की प्राप्ति होती है। हमें आम के वृक्ष से आम ही प्राप्त होते हैं। बबूल का वृक्ष हमें कांटों की चुभन ही प्रदान करता है। हमारा जीवन खेत की तरह है। खेत में हम जैसा बीज होते हैं, वैसी ही फसल हमें प्राप्त होती है।

जीवन का उद्देश्य यही है कि हम अपने सच्चे आध्यात्मिक स्वरूप का अनुभव कर पाएं और फिर अपनी आत्मा का मिलाप उसके मूल स्रोत परमात्मा से करा दें। जब हमारी आत्मा अंतर में स्थित ईश्वर की दिव्य ज्योति एवं श्रुति के साथ जुड़ने के लायक बन जाती है, तब हम अपने सच्चे आध्यात्मिक स्वरूप का अनुभव कर पाते हैं। यह भी सच है कि मानव जीवन प्रेम के साथ आनंद पूर्वक जीने हेतु प्राप्त हुआ है। ऐसे में घर, परिवार, समाज, रिश्ते- नाते आदि के साथ प्रेम करना आवश्यक है। परंतु सांसारिक प्रेम में हम इतना आसक्त न हो जाएं कि जीवन का उद्देश्य भूलाकर जीवन ही निरर्थक कर लें। क्योंकि सांसारिक प्रेम हमें बंधन मुक्त नहीं करता है। लेकिन परमात्मा से किया गया प्रेम बंधन में बंधने नहीं देता है। ईश्वर का प्रेम हमें सत्कर्म, धर्म के लिए प्रेरित करता है। परमात्मा सत्य है। सनातन है। प्रेमी व्यक्ति की समीपता हमें सुख प्रदान करती है। परमात्मा की निकटता ही सच्चा आनन्द है।

जीवन की सार्थकता के लिए मोक्ष दाता, सुख दाता और आनंद दाता परमात्मा से प्रेम करना ही उचित व अनिवार्य है। प्रेम के समक्ष तो परमात्मा भी झुक जाते हैं, क्योंकि प्रेम परमात्मा द्वारा ही प्रदत्त अनमोल उपहार है। इस प्रेम की फुलवारी में ही रंग- बिरंगे प्रसून खिलते हैं, जो अपनी सुंदरता से सभी को सुख देते हैं। जन-जन को आकर्षित करते हैं और जन-जन को अपनी सुगंध से दीवाना भी बना देते हैं। इसलिए हमें अपने बाहरी शारीरिक रूप की तरफ से ध्यान हटाकर अपने सच्चे आत्मस्वरूप का अनुभव करना चाहिए। तभी हमारा इस मानव शरीर में आने का लक्ष्य पूर्ण होगा और हम सदा- सदा के लिए प्रभु में लीन होने के मार्ग पर अग्रसर हो जाएंगे। इसलिए हमें जीवन में प्रेम का प्रसार करते हुए आध्यात्मिक प्रेम के मार्ग पर प्रगति करनी चाहिए।

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