78. मित्रता

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

मित्रता यानि दोस्ती एक ऐसा अनमोल रिश्ता है, जो अन्य रिश्तों की भांति थोपा नहीं जाता बल्कि इसे हम अपनी सुविधा एवं रूचि के अनुसार ही बनाते हैं। इस संसार में मित्रता शुद्धतम प्रेम है। इसमें कुछ भी मांगा नहीं जाता, कोई शर्त नहीं होती, बस केवल दिया जाता है। यह एक ऐसा रिश्ता है जिससे संसार का कोई भी प्राणी अछूता नहीं रहा है। वास्तव में मित्रता मानव जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखती है।

नवधा भक्ति में सख्य भाव को बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। सूरदास के आराध्य देव श्री कृष्ण हैं, जो उनके मित्र हैं, जिसको वह उलहाना भी दे देते हैं। देखा जाए तो स्वयं भगवान भी सभी रिश्तो से परे, मित्रता को जीवन में महत्वपूर्ण स्थान देते हैं। तभी तो श्री कृष्ण अपने दोस्त सुदामा के लिए नंगे पांव ही दौड़ पड़े थे। श्री राम ने भी सुग्रीव से अपना मित्र धर्म निभाने के लिए बाली पर छुपकर तीर का संधान किया था। दानवीर कर्ण जानते थे कि —दुर्योधन अधर्मी हैं, पापी हैं, फिर भी उसने अपने मित्रवत् धर्म का पालन करते हुए, अपने जीवन के आखिरी समय तक दुर्योधन का ही साथ दिया। ऐसे अनेकों उदाहरणों से इतिहास भरा पड़ा है। जिसमें अनेक मनुष्य अपने मित्र धर्म का पालन करते हुए, अपने प्राणों की आहुति देने में भी पीछे नहीं हटे।

आज के भागदौड़ भरे जीवन में एक सच्चे मित्र का होना परम आवश्यक है। यह बात भी सर्वथा सत्य है कि अच्छे और सच्चे मित्र के बिना एक अच्छे जीवन की कल्पना करना भी व्यर्थ है। विद्वानों ने जिस प्रकार शारीरिक स्वास्थ्य, स्नेहिल पत्नी और आज्ञाकारी पुत्र को जन्म-जन्म के पुण्यों का फल बताया है, उसी प्रकार सच्ची मित्रता को भी जन्म-जन्म के पुण्यों का फल बताया है। एक सच्चा मित्र ही सही सलाह देता है और निसंकोच मदद करता है। अंग्रेजी में एक कहावत है—
A friend in need is a friend indeed.
यानी जो जरूरत के समय साथ दे, वही सच्चा मित्र है।

एक सच्चे मित्र का दायित्व होता है कि— वह अपने मित्र को गलत और अनैतिक कार्य करने से रोके और उसे सही रास्ते पर जाने के लिए प्रेरित करे, इसके साथ ही वह उसके अवगुणों को दूर करने तथा गुणों को निखार कर सामने लाने में सहायता करे। अगर देखा जाए तो एक तरह से, मित्र हमारे व्यक्तित्व को सुधारने में भी मदद करते हैं। यह सत्य है कि जो लोग मित्रों से गिरे रहते हैं, वे भावनात्मक रूप से मजबूत होते हैं, क्योंकि अपने उत्साह और प्रोत्साहन से मित्र, आपको अवसाद और निराशा की गिरफ्त में आ जाने से बचाता है। इसलिए कहा जाता है कि जिस मनुष्य का सच्चा मित्र नहीं होता, उसके लिए अपने जीवन में आने वाली पहाड़-सी चुनौतियों से पार पाना बहुत मुश्किल होता है।

आधुनिक युग में मित्रता जैसे निश्चल रिश्ते को भी स्वार्थ के बंधन ने जकड़ लिया है। स्वार्थ के कारण ही आज के इस दिखावटी एवं बनावटी युग में सच्चे मित्रों का अभाव- सा हो गया है। आज मनुष्य मित्रता जैसे अमूल्य रिश्ते का भी मोल लगाने लगे हैं। आज गरीब व्यक्ति से मित्रता करना तो दूर उसे अपना मित्र भी बताना नहीं चाहते‌। सच्चे मित्र की एक पहचान यह होती है कि मुसीबत के समय या जब भी आपके दिल का बोझ असहनीय हो जाए, तब उसके कंधे आपको सहारा देने के लिए उपस्थित होते हैं। सच्चा मित्र जरूरत पड़ने पर अपनी जान की भी परवाह नहीं करता।

अगर मित्र जीवन को अच्छा बना सकता है तो उसे बिगाड़ भी सकता है। मित्र जो हमारे लिए शक्तिवर्धक औषधि का कार्य करता है, वहीं अगर बुरे आचरण वाला हो तो हमारे जीवन को बर्बाद भी कर सकता है। इसलिए एक अच्छे मित्र का होना आवश्यक है, पर एक बुरे मित्र से मित्र का न होना ही बेहतर है। मित्रता में मतभेद हो सकते हैं। कभी-कभी गलतफहमी की वजह से कटुता भी आ जाती है। किंतु एक सच्चे मित्र का कर्तव्य है कि जब मित्र संकट में हो तब वह उसका साथ दें। विपत्ति के समय और अधिक स्नेह करने वाला ही सच्चा मित्र होता है। यह बात कहने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि जिसे सच्चे एवं निष्कपट मित्र मिल जाएं, वह व्यक्ति बहुत ही सौभाग्यशाली माना जाता है।

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