79. जीवन और रिश्ते।

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

आज के इस वैश्विकरण युग में हमारी संस्कृति और संस्कार लुप्त होते आ रहे हैं। अब हम रिश्तों की अहमियत और उनकी उपयोगिता को धाराशाही करके आगे बढ़ने को ही सफलता का आधार मानते हैं। आज की युवा पीढ़ी को लगता है कि रिश्ते उनकी सफलता व आजादी में अवरोध उत्पन्न करते हैं। आज का यह दौर परिवारों में तेजी से हो रहे विघटन का साक्षी बना हुआ है। पश्चिमी सभ्यता हमारे भरे-पूरे परिवारों के अस्तित्व को समाप्त कर चुकी है। एकल परिवार की अवधारणा में विश्वास के चलते संयुक्त परिवारों में विघटन हो चुका है। एकल परिवार के इस विचार ने मनुष्य को इतना एकाकी बना दिया है कि वह अपने जीवन में सीमित होकर रह गया है।

अपनी सुख-सुविधाओं और जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए किसी किस्म का समझौता न करने के कारण हमारे परिवारों में निरंतर परिवर्तन देखने को मिल रहा है। एक दौर था जब परिवार के दुख के लिए, अपने सुख से समझौता कर लिया जाता था और एक यह दौर है, जिसमें परिवार में दुख आए तो सदस्य अपने सुख की तलाश में अलग रहने लगते हैं। रिश्तो का रूप इतना बदल चुका है कि जन्म देने वाले माता-पिता भी बच्चों को बोझ लगने लगते हैं। वही माता-पिता जो बच्चों को पाल पोस कर बड़ा करते हैं। उन्हें पढ़ा- लिखा कर बड़े से बड़े ओहदे पर पहुंचाते हैं, फिर वही बच्चे अपनी सुख-सुविधा के लिए सर्वप्रथम अपने ही माता-पिता को वृद्धाश्रम में छोड़ देते हैं। ऐसे उदाहरणों से यह समाज भरा पड़ा है, रिश्तो का एक ऐसा पतन पढ़े-लिखे और सभ्य परिवारों में ज्यादा देखने को मिलता है, जबकि कम पढ़े-लिखे परिवारों में फिर भी रिश्तो की कुछ अहमियत अभी शेष है।

जीवन में रिश्ते हों, उससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उन रिश्तो में जीवन हो। रिश्तो में यदि जीवन नहीं है, तब फिर जीवन में रिश्ते होने का कोई औचित्य शेष नहीं रहता। रिश्तो की अहमियत को समझाने के लिए मैं एक कहानी सुनाती हूं—
एक वृद्ध था, उसके चार बेटे थे। उसने अपनी पूरी जिंदगी में उनको बहुत समझाया कि मेरे निधन के बाद चारों मिल- जुल कर रहना। लेकिन उनको यह बात समझ नहीं आती थी और अक्सर आपस में झगड़ते रहते थे। एक दिन वह बीमार पड़ गया और मरणासन्न की अवस्था में पहुंच गया, तो उसके दिमाग में एक युक्ति सूझी। उसने चारों को अपने पास बुलाया और लकड़ियों का एक बड़ा गट्ठा मंगवाया और चारों को उसे तोड़ने को कहा। लेकिन भरपूर कोशिश करने के बावजूद भी उस लकड़ियों के गठ्ठे को नहीं तोड़ सके। फिर उसने एक- एक लकड़ी तोड़ने को कहा। इस बार चारों लकड़ियां तोड़ने में सफल हो गए। फिर वृद्ध ने उन्हें समझाया कि मिल-जुल कर रहने से ही रिश्तो की अहमियत है। अगर तुम जीवन में ऐसे ही लड़ते- झगड़ते और अकेले रहे, तो समाज में तुम्हारा अकेली-अकेली लकड़ियों जैसा हाल होगा, अगर तुम लकड़ियों के गठ्ठे की तरह मिलजुल कर रहोगे तो तुम्हारी शक्ति चार गुना हो जाएगी और कोई भी तुम्हारा अहित नहीं कर पाएगा। क्योंकि रिश्ते उन्नति में बाधक नहीं, बल्कि उन्नति के शिखर तक पहुंचाने में मददगार हैं।

लेकिन इस दौर में हम रिश्तों में जीवन को समाप्त करने पर तुले हुए हैं। पहले तो जीवन के वास्तविक रिश्तों से दूर होकर एकाकी होने के मार्ग पर प्रशस्त होते हैं और फिर जब रिश्तों की आवश्यकता महसूस होती है, तब इस जरूरत को पूरा करने के लिए आभासी मंचों का आश्रय लेते हैं। आभासी दुनिया कभी वास्तविकता की पूर्ति कर ही नहीं सकती। जीवन में इंसान की पूर्ति पैसा नहीं कर सकता। रिश्ते, रिश्ते होते हैं और भौतिकता सिर्फ भौतिकता। जीवन में भौतिक वस्तुएं कभी वास्तविक रिश्तों की पूर्ति नहीं कर सकती। यह ज्ञात रहे कि भोग विलास के नाम में समस्त संसाधनों की उपलब्धता सुख का पैमाना नहीं हो सकती। जीवन को सुखी, संपन्न और एकाकी बनाने की लालसा धन, वैभव, यश, कीर्ति इत्यादि अर्जित कर लेने के पश्चात भी, संयुक्त परिवार के आनंद और सुख जैसी संतुष्टि प्रदान नहीं करती।

एकल परिवारों के बच्चों की परवरिश में भी संस्कारों की कमी नजर आती है। क्योंकि परिवार में ज्यादा सदस्य होने के कारण वे अपनी मन की बात किसी न किसी तक पहुंचा देते थे, जिससे उनको समझाकर उनके मन में संस्कारों की नींव डाली जाती थी। लेकिन आभासी रिश्तों के चक्कर में, जीवन में भावनाओं की पूर्ति वास्तविक रूप में नहीं हो पाती। यह आभासी दुनिया उसे भ्रम में बांध देती हैं कि वह सब का है और सब उसके हैं। किंतु जरूरत के समय वास्तविकता का बोध हो जाता है, जब वह स्वयं को अकेला पाता है। इसलिए रिश्तों में जीवन हो, इस बात पर महत्व दिया जाना चाहिए। रिश्तो में जीवन का एक ज्वलंत उदाहरण स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम है, जिस को उसके परिवार के हर रिश्ते ने उसे मर्यादा पुरुषोत्तम बना दिया।

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