211. आध्यात्मिक विकास

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

ऋषि-मुनियों ने कहा है कि— मनुष्य जीवन के तीन पहलू हैं—

  1. बौद्धिक
  2. शारीरिक और
  3. आध्यात्मिक
    हमें इन तीनों पहलुओं को ध्यान में रखते हुए स्वयं को आगे बढ़ाना चाहिए। लेकिन आज हम भौतिक और शारीरिक विकास में तो बहुत प्रगति कर चुके हैं परंतु आध्यात्मिक पहलू को भूल गए हैं। हमारी जीवनशैली इतनी व्यस्त है कि हम स्वयं के लिए समय निकाल ही नहीं पाते। एक दिन ऐसा आएगा कि हम स्वयं से यह सवाल करेंगे कि क्या हमारे जीवन का उद्देश्य केवल जन्म लेना, बड़ा होना, अपनी जिम्मेदारियों को निभाना और मृत्यु को प्राप्त करना ही है या इसके अलावा कुछ और भी है।

भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में आज इतना विकास हो चुका है कि हमने बहुत से सुविधाजनक साधनों की खोज कर ली है, जिनसे हमारा समय बचता है। उनके उपयोग से हमें अधिक समय मिलना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। हम उन सुविधाओं के इतने आदी हो चुके हैं कि हमारे पास समय ही नहीं होता। हमें स्वयं को जानने, पहचानने, अपने अंदर झांकने और अपने जीवन के उद्देश्य को परखने का समय ही नहीं मिलता। इस कारण हम अपने तीसरे पहलू आध्यात्मिक से दूर होते जा रहे हैं।

यह जगत् पांच भौतिक तत्वों के मिश्रण से बना है। इनमें आकाश तत्व सबसे सूक्ष्म है। वह इतना सूक्ष्म है कि— वह अपने अस्तित्व को सिर्फ ध्वनि के द्वारा ही सिद्ध करता है। उसकी ध्वनि तरंगों को समझने के लिए एक विशेष प्रकार के वैज्ञानिक यंत्र की आवश्यकता होती है। आकाश तत्व को छोड़ दिया जाए तो बाकी के चारों तत्वों को हम अपनी इंद्रियों की सहायता से आसानी से समझ सकते हैं।

ईश्वर इन पांचों तत्वों से भी सूक्ष्म है। ऐसे में हमारी इंद्रियां कैसे ईश्वर की मौजूदगी को समझ सकती हैं, जब वे आकाश तत्वों को भी आसानी से नहीं पकड़ पाती। दरअसल ईश्वर हमारे मानसिक दायरे से भी परे है। इसलिए अपने मन की सहायता से हम उन तक पहुंचने में असमर्थ हैं। अगर हम कोशिश करेंगे भी तो बार-बार निराश होकर लौटना पड़ेगा। हमारे ऋषि-मुनियों ने यही समझाया है कि— उस ईश्वर को अपने मन के द्वारा या शब्द के द्वारा नहीं प्राप्त कर सकते। जिस तरह अणुओं को देखने के लिए बौद्धिक और वैज्ञानिक दृष्टि की आवश्यकता होती है, उसी तरह ईश्वर को देखने के लिए आध्यात्मिक दृष्टि की आवश्यकता होती है। अगर यह कहा जाए कि ईश्वर को केवल आध्यात्मिक ज्ञान के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

हम खुशनसीब हैं कि हमने मनुष्य जन्म पाया है। अपने इस जन्म में यदि हम अपने आध्यात्मिक विकास के लिए समय नहीं निकाल पाएंगे तो अपने ध्येय को कैसे पूरा करेंगे? अध्यात्मिक विकास के लिए हमें आध्यात्मिक ज्ञान होना जरूरी है, जब हमें अध्यात्म का ज्ञान ही नहीं होगा तो हम उसमें विकास कैसे करेंगे। इसके लिए यह आवश्यक है कि हम अध्यात्म की शिक्षा छोटी उम्र से ही बच्चों को देना शुरू करें ताकि वे बड़े होकर अच्छे इंसान बन सकें।

आध्यात्मिकता एक- दूसरे के लिए प्रेम और दया का भाव जगाती है। दूसरों की मदद करना सिखाती है। अध्यात्म जीवन के उच्च आदर्शो को विकसित करना और हमें बेहतर इंसान बनना सिखाता है। ध्यान का अभ्यास एक ऐसा तरीका है, जिसके द्वारा अपने अंदर सद्गुणों को विकसित कर सकते हैं। यही आध्यात्मिकता है। ध्यान अभ्यास के द्वारा हम न केवल जीवन के उच्च आदर्शो को जान पाते हैं बल्कि अपने अंतर्मन में विद्यमान आत्मा को भी साक्षात्कार करने में सफल हो जाते हैं।

जब हमारा आत्मा से संपर्क हो जाता है तो ईश्वर को पहचानना कठिन नहीं होता। जब कोई आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर लेता है तो उसके सभी दुख, चिंताएं दूर हो जाती हैं क्योंकि वह स्वयं को ईश्वर के सानिध्य में पाता है। ऐसे में उसे असीम आनंद और शांति की अनुभूति होती है। ईश्वरीय आनंद में डूबने पर मनुष्य के मन के सारे विकार लुप्त हो जाते हैं। उनके समीप पहुंचने पर मन अस्तित्वहीन हो जाता है और हमारा आध्यात्मिक विकास हो जाता है।

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

ऋषि-मुनियों ने कहा है कि— मनुष्य जीवन के तीन पहलू हैं—

  1. बौद्धिक
  2. शारीरिक और
  3. आध्यात्मिक
    हमें इन तीनों पहलुओं को ध्यान में रखते हुए स्वयं को आगे बढ़ाना चाहिए। लेकिन आज हम भौतिक और शारीरिक विकास में तो बहुत प्रगति कर चुके हैं परंतु आध्यात्मिक पहलू को भूल गए हैं। हमारी जीवनशैली इतनी व्यस्त है कि हम स्वयं के लिए समय निकाल ही नहीं पाते। एक दिन ऐसा आएगा कि हम स्वयं से यह सवाल करेंगे कि क्या हमारे जीवन का उद्देश्य केवल जन्म लेना, बड़ा होना, अपनी जिम्मेदारियों को निभाना और मृत्यु को प्राप्त करना ही है या इसके अलावा कुछ और भी है।

भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में आज इतना विकास हो चुका है कि हमने बहुत से सुविधाजनक साधनों की खोज कर ली है, जिनसे हमारा समय बचता है। उनके उपयोग से हमें अधिक समय मिलना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। हम उन सुविधाओं के इतने आदी हो चुके हैं कि हमारे पास समय ही नहीं होता। हमें स्वयं को जानने, पहचानने, अपने अंदर झांकने और अपने जीवन के उद्देश्य को परखने का समय ही नहीं मिलता। इस कारण हम अपने तीसरे पहलू आध्यात्मिक से दूर होते जा रहे हैं।

यह जगत् पांच भौतिक तत्वों के मिश्रण से बना है। इनमें आकाश तत्व सबसे सूक्ष्म है। वह इतना सूक्ष्म है कि— वह अपने अस्तित्व को सिर्फ ध्वनि के द्वारा ही सिद्ध करता है। उसकी ध्वनि तरंगों को समझने के लिए एक विशेष प्रकार के वैज्ञानिक यंत्र की आवश्यकता होती है। आकाश तत्व को छोड़ दिया जाए तो बाकी के चारों तत्वों को हम अपनी इंद्रियों की सहायता से आसानी से समझ सकते हैं।

ईश्वर इन पांचों तत्वों से भी सूक्ष्म है। ऐसे में हमारी इंद्रियां कैसे ईश्वर की मौजूदगी को समझ सकती हैं, जब वे आकाश तत्वों को भी आसानी से नहीं पकड़ पाती। दरअसल ईश्वर हमारे मानसिक दायरे से भी परे है। इसलिए अपने मन की सहायता से हम उन तक पहुंचने में असमर्थ हैं। अगर हम कोशिश करेंगे भी तो बार-बार निराश होकर लौटना पड़ेगा। हमारे ऋषि-मुनियों ने यही समझाया है कि— उस ईश्वर को अपने मन के द्वारा या शब्द के द्वारा नहीं प्राप्त कर सकते। जिस तरह अणुओं को देखने के लिए बौद्धिक और वैज्ञानिक दृष्टि की आवश्यकता होती है, उसी तरह ईश्वर को देखने के लिए आध्यात्मिक दृष्टि की आवश्यकता होती है। अगर यह कहा जाए कि ईश्वर को केवल आध्यात्मिक ज्ञान के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

हम खुशनसीब हैं कि हमने मनुष्य जन्म पाया है। अपने इस जन्म में यदि हम अपने आध्यात्मिक विकास के लिए समय नहीं निकाल पाएंगे तो अपने ध्येय को कैसे पूरा करेंगे? अध्यात्मिक विकास के लिए हमें आध्यात्मिक ज्ञान होना जरूरी है, जब हमें अध्यात्म का ज्ञान ही नहीं होगा तो हम उसमें विकास कैसे करेंगे। इसके लिए यह आवश्यक है कि हम अध्यात्म की शिक्षा छोटी उम्र से ही बच्चों को देना शुरू करें ताकि वे बड़े होकर अच्छे इंसान बन सकें।

आध्यात्मिकता एक- दूसरे के लिए प्रेम और दया का भाव जगाती है। दूसरों की मदद करना सिखाती है। अध्यात्म जीवन के उच्च आदर्शो को विकसित करना और हमें बेहतर इंसान बनना सिखाता है। ध्यान का अभ्यास एक ऐसा तरीका है, जिसके द्वारा अपने अंदर सद्गुणों को विकसित कर सकते हैं। यही आध्यात्मिकता है। ध्यान अभ्यास के द्वारा हम न केवल जीवन के उच्च आदर्शो को जान पाते हैं बल्कि अपने अंतर्मन में विद्यमान आत्मा को भी साक्षात्कार करने में सफल हो जाते हैं।

जब हमारा आत्मा से संपर्क हो जाता है तो ईश्वर को पहचानना कठिन नहीं होता। जब कोई आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर लेता है तो उसके सभी दुख, चिंताएं दूर हो जाती हैं क्योंकि वह स्वयं को ईश्वर के सानिध्य में पाता है। ऐसे में उसे असीम आनंद और शांति की अनुभूति होती है। ईश्वरीय आनंद में डूबने पर मनुष्य के मन के सारे विकार लुप्त हो जाते हैं। उनके समीप पहुंचने पर मन अस्तित्वहीन हो जाता है और हमारा आध्यात्मिक विकास हो जाता है।

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