111. सुख का मार्ग— त्याग

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

मानव जीवन एक युद्ध भूमि है। जहां हमें सुख और दुख दोनों से लड़ना पड़ता है। द्वंद्व युद्ध में हम कई बार हार जाते हैं तो कई बार जीत भी जाते हैं। जब हम हार जाते हैं तो हताश और निराश होकर जीवन के युद्ध क्षेत्र में अर्जुन की तरह हथियार डाल देते हैं, जो बिल्कुल भी शोभा नहीं देता। यह आवश्यक नहीं है कि हर बार भगवान श्री कृष्ण साक्षात् उपस्थित हों और हमें कर्म करने के लिए प्रेरित करें। हमें यह नहीं भूलना चाहिए की उनका ज्ञान कर्म और भक्ति का संदेश, दुखों से लड़ने में आज भी हमारा सबसे बड़ा संबल है।

मानव जीवन एक परीक्षा केंद्र भी है। जहां सुख और दुख कदम- कदम पर हमारी परीक्षाएं लेते रहते हैं। यहां सुख है तो दुख भी, लाभ है तो हानी भी, यश है तो अपयश भी और जीवन है, तो मरण भी। सुख- दुख, धूप और छांव की तरह हैं जो सदैव स्थान बदलते रहते हैं। संसार में निवास करने वाला कोई भी ऐसा नहीं है जो उनसे बच सका हो। इसलिए यदि हमें सुखी होना है, हम सुख से रहना चाहते हैं, तो इन दोनों को विधाता का उपहार मानकर सहज रूप से स्वीकार कर लेना चाहिए। गीता में तो इस चराचर जगत् को ही दुखों का बसेरा कहा गया है।

अगर दुख न हो तो मनुष्य सुख का वास्तविक आनंद प्राप्त नहीं कर सकता। सुख का अस्तित्व दुख पर ही टिका हुआ है। बस ऐसे समय धैर्य और साहस ही कवच बनकर मनुष्य की रक्षा कर सकते हैं। जीवन में हमें यह स्मरण चाहिए कि सुख का मार्ग हमेशा दुख से होकर गुजरता है। जिसने भी दुख को हंसकर जीना सीख लिया, वही सच्चे सुख का आनंद ले सकता है। सर्दी- गर्मी की तरह सुख- दुख में भी सहज रहने वाला व्यक्ति ही जीवन के सच्चे मर्म को समझता है।

दरअसल सच्चाई यह है कि संसार में सब कुछ पा लेने की दौड़ के कारण ही इतनी अशांति और दुख व्याप्त है। भोतिक उत्थान कोई बुरी बात नहीं है लेकिन मानवीय इच्छाओं का कोई अंत नहीं। प्रगति और विकास आवश्यक तो है, पर उनकी भूख और अतिवादी संग्रह घातक है। इसलिए दान एवं त्याग की प्रवृत्ति से आत्मिक सुख प्राप्त किया जा सकता है। त्याग एक कठिन तपस्या है जो कोई विरला ही कर सकता है लेकिन इसका अभ्यास करके इसे जीवन में उतारा जा सकता है। छोड़ने की प्राथमिकता पर कोई विचार नहीं करता। सभी प्राप्ति की प्राथमिकता पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं। जिसने भी त्याग के रहस्य को जान लिया, वह कहीं पर रहते हुए, जीवन के सच्चे सुख को पाने का अधिकारी बन जाता है। जो भी अवगुण प्रगति में बाधक बने, उसी का त्याग कर देना चाहिए। तभी सुख का मार्ग प्रशस्त होता है।

महात्मा बुद्ध एक बार किसी नगर में पहुंचे तो उनके पास नगर का सबसे अमीर आदमी आया। वह उपहार स्वरूप उनके लिए कीमती सामान अपने साथ लेकर आया था। उस अमीर आदमी ने बुद्ध को कहा कि— अब तक उसने अपने जीवन में कई अनाथालय, चिकित्सालय और विद्यालय बनवाए हैं। बुद्ध जिस सिंहासन पर बैठे हुए हैं, उसे भी उसने ही बनवाया है।
इतना कुछ बताने के बाद जब वह चलने लगा तो बुद्ध ने कहा —जो कुछ भी अपने साथ लाए हो, उन्हें यहीं छोड़कर जाओ।
अमीर आदमी ने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा —मैं तो सभी सामग्री आपको अर्पित कर चुका हूं।
बुद्ध ने कहा—नही, तुम जिस अंहकार के साथ आए थे, उसी के साथ वापिस जा रहे हो। ये सारी सांसारिक वस्तुएं मेरे किसी काम की नहीं हैं। अपना अहंकार यहीं पर त्याग कर जाओ। यही मेरे लिए सबसे बड़ा उपहार होगा।
महात्मा बुद्ध की यह बात सुनकर वह व्यक्ति उनके चरणों में नतमस्तक हो गया। उसके अंदर समाया हुआ सारा अहंकार अश्रु बनकर बह गया।

2 thoughts on “111. सुख का मार्ग— त्याग”

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