123. खुशी

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

प्रत्येक वर्ष 20 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय खुशी दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र के सलाहकार जेमी इलियन ने पहली बार 2006 में इसका प्रस्ताव रखा था। उसके बाद संयुक्त राष्ट्र महासभा ने जुलाई 2012 में इसे मनाने की घोषणा की और पहला अंतरराष्ट्रीय खुशी दिवस 20 मार्च 2013 को मनाया गया। कोविड-19 को देखते हुए इस वर्ष अंतर्राष्ट्रीय खुशी दिवस का थीम था— शांत रहिए, बुद्धिमान एवं दयालु बनिए।
प्रत्येक मनुष्य खुश रहने की कामना अवश्य करता है लेकिन रहता नहीं। इसका प्रमुख कारण यही है कि वह अपने मन में बेवजह के अवसाद, चिंता उत्पन्न करके उनसे ग्रस्त रहता है। वह उन काल्पनिक चिंताओं की छवि को हृदय में आकार देकर रखता है, जिनका कोई अस्तित्व ही नहीं है। कई बार वह पुरानी पीड़ाओं के घाव को पीड़ा मुक्त होने के बाद भी स्मरण करता रहता है। हमारे हृदय में अवचेतन मन 24 घंटे उपस्थित रहता है। यह अवचेतन मन व्यक्ति के अंतर्मन में रहता है। जो मनुष्य अपनी परेशानियों को दिन- रात सोचते रहते हैं, अवचेतन मन में दिशा दी कल्पनाएं संग्रहित होती रहती हैं और उन परेशानियों का बोझ बढ़ता रहता है। मनुष्य के चेहरे पर उन कल्पनिक परेशानियों का बोझ बीमारी, चिंता, क्रोध, ईर्ष्या के रूप में उजागर होता रहता है।
खुशी आखिर है क्या? इसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है? इन सवालों के जवाब हर कोई जानना चाहता है। जब हम छोटे होते हैं तो खुशी को हम पार्टी करने, मस्ती, धमाल या शोर- शराबे से जोड़ते हैं। लेकिन जब हम व्यस्क हो जाते हैं तब भौतिक वस्तुएं जैसे नौकरी, विवाह, अच्छा भोजन, घर, गाड़ी आदि वस्तुओं में हम खुशी तलाशने लगते हैं लेकिन वास्तव में देखा जाए तो यह सभी वस्तुएं क्षणिक आनंद प्रदान करने वाली हैं, यह खुशी का प्रतीक भर है, लेकिन वास्तविक खुशी नहीं। असली खुशी एक अच्छे अहसास से कहीं ज्यादा बड़ी वस्तु है। यह केवल हंसता हुआ चेहरा नहीं है।
खुशी दरअसल मन की एक अवस्था है इसे मन के अंदर ही प्राप्त किया जा सकता है।
खुशी तो वह अवस्था है जिसे प्रकृति ने निःशुल्क प्रदान किया है लेकिन मनुष्य इसके निःशुल्क महत्त्व को नहीं समझता और अपनी समझ से इसकी कीमत निर्धारित कर लेता है, जो मनुष्य खुश होने का मंत्र जान जाता है, उसके लिए भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति का अधिक महत्व नहीं होता क्योंकि वह उनके न रहने पर या विपरीत परिस्थितियों में भी खुश रहना जानता है।
खुशी यानी जब मन प्रफुल्लित होने का एहसास हो। हम कोई ऐसा कार्य करें जिससे संतुष्टि मिलें। हमें लगे कि मैंने वह कार्य किया जो मायने रखता है। जिस कार्य को करने के बाद आत्मसम्मान बढे। खुद पर गर्व का एहसास हो। वह एहसास जो उमंग से भर देता है और हमें सदैव बेस्ट करने के लिए प्रेरित करता रहता है।
वास्तव में देखा जाए तो हम सब खुश रहना चाहते हैं पर कभी- कभी कुछ वस्तुएं हमारे नियंत्रण में नहीं होती। कभी-कभी हमें महसूस होता है कि मुश्किल समय खत्म हो जाएगा तो हम खुश हो जाएंगे पर ऐसा हो यह जरूरी नहीं तो फिर कहां मिलेगी खुशी? कैसे मिलेगी खुशी?
खुशी को प्राप्त करने के लिए सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि—हमें क्या चाहिए? हमारी प्राथमिकताएं क्या हैं? दूसरों की नजर में हम किस तरह से याद किए जाना पसंद करेंगे और उसके लिए हम क्या कर रहे हैं?
यह सब पता होना चाहिए। जब हमारी प्राथमिकताएं तय हो जाएंगी, उसके बाद हमें अपने अंतर्मन में झांकने की कोशिश करनी चाहिए कि वह कौन- सी वस्तु है जो हमें संतोष दे सकते है। हमें आत्मगौरव का एहसास करा सकती है। यदि यह जान गए तो हम उसी दिशा में प्रयास करने लगेंगे और खुशी को अपने पास पाएंगे। कभी-कभी हम बहुत अधिक चिड़चिड़े हो जाते हैं। छोटी-छोटी बातों पर झल्लाने लगते हैं। अपनी बात कहना चाहते हैं, पर उसे किसी के सामने कहना सही नहीं समझते।
खुशी को चुनने का विकल्प मनुष्य के पास सदैव मौजूद रहता है। अगर हम अपने जीवन में कुछ उपाय आजमा कर देखें तो खुशी सदैव हमारे आंगन की रौनक बन सकती है।

सदैव सकारात्मक मानसिक दृष्टिकोण रखें।

भय, क्रोध, ईर्ष्या को पंख न दें।

अपनी पसंद का काम करना खुशी देता है इसलिए प्रतिदिन
कुछ समय अपने पसंदीदा काम में लगाएं।

उन कार्यों पर फोकस करें जो सचमुच महत्व रखते हैं जो हमें सिखाते हैं कि— दूसरों की जिंदगी में हम कैसे बदलाव लाएं। ऐसा कोई भी कार्य हो सकता है जैसे दूसरों की मदद करना या पर्यावरण को बचाना इत्यादि। खुशी से इन चीजों का गहरा नाता होता है।

दया भाव, करुणा, सहानुभूति का भाव, हास्य बोध या नेतृत्व के गुण इनमें से कोई न कोई गुण या एक से अधिक गुण हर व्यक्ति में मौजूद होते हैं। उनका अभ्यास करें। कहने का अभिप्राय यह है कि अपने गुणों को बाहर निकालिए। इसे व्यक्तित्व की मजबूती बढ़ती जाएगी और खुशी भी देर तक बनी रहेगी।

खुशी के लिए रिश्तो की मजबूती भी जरूरी है।

कुछ अलग से भी सीख सकते हैं जैसे संगीत, पढ़ना- लिखना इत्यादि। इससे आपको अलग से ख़ुशी का एहसास होगा।

किसी भी कार्य को बोझ मत समझिए। यह मत सोचिए कि यह कार्य करना ही होगा बल्कि यह सोचिए कि यह काम किया जाएगा तो हमें कितना संतोष प्राप्त होगा।

ऐसी कौन सी वस्तु है जो आपको खुशी से दूर ले जा सकती है यानी अपनी कमियों पर फोकस कीजिए और उन कमियों को दूर करने का प्रयास शुरू कर दीजिए।

आज से ही खुशी को चुनें और अपने मन के सहज भावों से खुशी के पंख लगाएं जिससे कि वह हमारे इर्द- गिर्द उड़कर चारों ओर खुशी फैलाए और सबको सुखी बनाए।

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