129. प्रार्थना

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः


प्रार्थना ब्रह्मांड की महानतम शक्ति— ईश्वर से संबंध जोड़ने की एक प्रक्रिया है।
प्रार्थना में एक भक्त अपने इष्ट देव के सामने नतमस्तक होकर विनती करता है की — हे ईश्वर! मेरे इस कार्य को सिद्ध कीजिए अर्थात् मेरे इस कार्य को पूरा कर दीजिए। इस तरह भक्त अपने इष्टदेव के सामने एक तरह से प्रार्थना करता है।
प्रार्थना व्यक्तिगत भी हो सकती है और सामूहिक भी। भक्त अपनी प्रार्थना करते हुए कई बार शब्दों का प्रयोग करता है तो कई बार वह अपने इष्टदेव के मंत्रों का उच्चारण करता है और कई भक्त तो गीत गाकर भी प्रार्थना करते हैं। यह मौन भी की जा सकती है।
आध्यात्मिक जगत् में प्रार्थना, उर्जा अथवा शक्ति प्राप्त करने की सर्वोत्तम विधि है। इसके अतिरिक्त इससे अपने इष्ट देव से सीधा संवाद करके लौकिक और अलौकिक समस्याओं का समाधान भी पाया जा सकता है।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि विकारों को की शुद्धि के लिए प्रार्थना एक रामबाण औषधि का काम करती है। जब हम सारी आशा छोड़ कर बैठ जाते हैं और निराशा हमारे चारों तरफ अंधकार का वातावरण तैयार कर देती है, उस समय कहीं ना कहीं से कोई सहायता अवश्य मिलती है और निश्चित रूप से यह सहायता प्रभु कृपा से ही प्राप्त होती है, जो प्रार्थना के माध्यम से मिलती है। स्तुति, प्रार्थना, उपासना सिर्फ हमारे मन का वहम नहीं है बल्कि हमारा खाना- पीना, चलना- फिरना, उठना- बैठना जितना सच है, उससे भी अधिक सच यह प्रार्थना है। यह कहने में अतिशयोक्ति नहीं है कि यही सच है और सब झूठ है।
प्रार्थना हमें अपने अनुभवों को बांटने का अवसर प्रदान करती है तथा हमारे आंतरिक परिवर्तनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह हमें मनुष्यता सिखाती है, संगठित करती है तथा दूसरों पर विश्वास करना सिखाती है। हमारे शरीर का डिटॉक्सिफिकेशन करती है, जिससे हमारा शरीर स्वस्थ, पवित्र, प्रफुल्लित और तरोताजा होता है।
इसलिए हमें प्रतिदिन कुछ समय निकालकर प्रार्थना अवश्य करनी चाहिए।

2 thoughts on “129. प्रार्थना”

Leave a Comment

Shopping Cart