131. अहंकार का त्याग

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

श्रीमद् भागवत गीता में श्री कृष्ण ने कहा है कि— जब कोई कामना की पूर्ति नहीं होती तो क्रोध उत्पन्न होता है, क्रोध से लोभ तथा लोभ से मोह और फिर अहंकार पैदा होता है।

अहंकार से मनुष्य जाति का जितना अहित होता है उतना किसी और काम से नहीं होता, ना भूख से, ना बीमारी से, ना सूखे से, ना अकाल से इत्यदि, इनमें से किसी भी कारण से विश्व में इतने लोग बर्बाद नहीं हुए, जितने अहम् के टकराव के कारण हुए हैं। अगर देखा जाए तो आपसी संघर्ष, टकराव या युद्ध के मूल में अहंकार ही होता है।

यदि मनुष्य में अहंकार आ जाता है तो वह उसके सारे सद्गुणों को ढक लेता है। जिस प्रकार आंखों में यदि तिनका पड़ जाए तो सारा संसार ओझल हो जाता है, वैसे ही अहंकार मनुष्य को दुनिया से अलग कर देता है।

एक बार राजा को यह अहंकार हो गया कि— अपने राज्य में सभी जीवों का मैं ही पालक हूं। सब मेरा दिया हुआ ही खाते हैं। मेरे बगैर तो मेरा राज्य चल ही नहीं सकता। राजा अभिमान में चूर होकर अपनी डींगे हांकता रहता था, कोई भी राजा को कुछ नहीं कहता था क्योंकि प्रजा अपने राजा का बहुत सम्मान करती थी लेकिन इससे राजा का अहंकार और बढ़ता जाता था और वह यही सोचता था कि सचमुच मैं ही सभी जीवों का पालक हूं।

अपने अहंकार में चूर हुए राजा ने एक बार यह बात उस समय के एक प्रसिद्ध संत के सामने कह दी।
संत ने पूछा— अच्छा! तो तू सभी जीवों का पालक है तो जरा यह तो बता कि तेरे राज्य में कितने कुत्ते और कीड़े- मकोड़े हैं यानी कितने जीव- जंतु हैं।
राजा इस अप्रत्याशित प्रश्न का उत्तर देने की स्थिति में नहीं था क्योंकि उसे उत्तर का पता ही नहीं था।
संत ने प्यार से राजा को समझाया— जब तुझे उनकी संख्या ही नहीं पता तो उन्हें भोजन कैसे भेजता है?
राजन् सबका पालक परमपिता परमात्मा है, उसी की दया पर तू और सभी जीव जिंदा हैं। वही हम सब का भरण- पोषण करता है।
एक संत के मुख से यह सब सुनकर राजा का अहंकार कम नहीं हुआ बल्कि वह क्रोध के वशीभूत हो गया लेकिन कुछ कह नहीं पाया क्योंकि उसे पता था कि —यह बहुत बड़ा संत है‌। अगर मैं कुछ कहूंगा तो कहीं मुझे श्राप ना दे दे, इसलिए उसने एक युक्ति सुझी। उसने तुरंत ही एक कीड़े को डिबिया में बंद कर दिया तथा कहने लगा— देख लूंगा, भगवान इसे यहां कैसे भोजन देता है। कल तक यह कीड़ा भूख से मर जाएगा।
यह सुनकर संत मुस्कुराने लगे लेकिन राजा को कुछ नहीं कहा।
अगले दिन राजा ने संत के पास आकर डिबिया खोली। यह देखकर हैरान हुआ कि कीड़ा चावल का एक टुकड़ा बड़े प्रेम से खा रहा है। दरअसल चावल का यह दाना डिबिया बंद करते समय राजा के मस्तक के तिलक से गिर गया था। जिसका राजा को पता भी नहीं था।
संत ने राजा को समझाया— राजन्! परमात्मा ने इस कीड़े को तुम्हारे ही माध्यम से भोजन देकर इसकी रक्षा की है। जिसका तुम्हें पता तक नहीं चला।
इस प्रकार राजा का भ्रम दूर हुआ। उसने माना कि सबका पालक और रक्षक भगवान ही है।

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