157. दुख में निहित है, सुख

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

जीवन में सभी मनुष्य सुख की कामना ही करते हैं। दुख तो कोई नहीं चाहता परंतु मनुष्य के चाहने या न चाहने से दुख नहीं आता। सुख और दुख तो हमारे कर्मों के अनुसार हमें प्राप्त होते हैं। हम जो कर्म करते हैं, उनके अनुसार हमें सुख और दुख का भागी बनना ही पड़ता है। लेकिन कोई भी दुख हमें जिंदगी की बहुत बड़ी सीख देकर जाता है। दुख में ही हमें अपनी शक्ति का आभास होता है।

अमेरिका के लेखक मैट मारिस एक लाइफ कोच भी हैं। उनका जीवन बहुत सारे दुखों से भरा हुआ है। उन्होंने अपने जीवन के कड़वे अनुभवों से सबक लेते हुए, अपने जीवन की घटनाओं को असंख्य लोगों के सामने प्रस्तुत किया। जिससे बहुत सारे लोगों में एक प्रेरणा जगी। उन्होंने एक किताब लिखी है—
पॉजिटिविटी लिविंग इन प्रेजेंट मूमेंट, स्मार्ट गोल सेटिंग।
इस किताब के माध्यम से उसने जीवन में आने वाले दुखों से बाहर कैसे निकाला जाए, इस बारे में अपने अनुभव शेयर किए हैं। मारिस बताते हैं कि— वह जब 10 वर्ष के थे तो एक वायुयान दुर्घटना में उनकी मां का निधन हो गया। जिससे उन्हें गहरा सदमा लगा। इसके पश्चात् वे एक लंबे समय तक शारीरिक और मानसिक यातना सहते रहे। हालांकि जीवन की क्रूर त्रासदियों ने उन्हें भले ही कुछ समय तक विचलित कर दिया हो, पर अपनी सकारात्मक शक्ति और दृढ़ निश्चय को उन्होंने कमजोर नहीं पड़ने दिया। उनका कहना है यदि हम भूत और भविष्य की आशंकाओं से परे होकर वर्तमान में जीना सीख जाएं तो जिंदगी जरूर आसान हो जाएगी। वैसे हमने स्वयं भी महसूस किया होगा की वर्तमान पल में रहने की बात पर अमल करना आसान नहीं होता। हमारा मन अतीत और वर्तमान के बीच कहीं फंसा रहता है। कभी यादों में तो कभी भविष्य की चिन्ताओं में, जिसका द्वार अभी खुला भी नहीं है। भविष्य की उस दुनिया के बारे में सोचता रहता है, जिसके बारे में कुछ अता पता ही नहीं है। हमारा मन ऐसी-ऐसी कल्पनाएं बना लेता है जो भविष्य में कभी घटित हों ऐसा जरूरी तो नहीं। लेकिन उनको सोच- सोच कर वह अपना वर्तमान जरूर खराब कर लेता है। इस क्रम में हम अपनी उर्जा ही नहीं एकाग्रता भी खोते जाते हैं। जिसके कारण हम अपना काम सही तरह से पूरा नहीं कर पाते और हम कुंठित हो जाते हैं। तनाव और अवसाद हमारे ऊपर हावी हो जाता है और हमारे को कोई रास्ता नजर नहीं आता।

आपने अक्सर देखा होगा कि संत महात्माओं के चेहरों पर एक अलग तेज और संतोष दिखाई देता है। वे उलझन भरे विचारों से परे होते हैं। इसलिए जीवन में आई बड़ी त्रासदी भी उन्हें अपने लक्ष्य से नहीं भटका पाती और वे आसानी से बाहर निकल जाते हैं। अक्सर लोग पूछते रहते हैं कि यदि हम हर पल शांत रहने और उसका आनंद लेने के बारे में ही सोचते रहेंगे तो हमारा काम कौन करेगा? हमारी जो अभिलषाऐं हैं, आकांक्षाएं हैं, वे कैसे पूरी होंगी? यदि हम भविष्य के बारे में नहीं सोचेंगे, योजनाएं नहीं बनाएंगे तो कैसे काम चलेगा? यह सवाल हर किसी के मन में रहते हैं तो शायद आप वर्तमान में रहने की बात को अलग से कोई काम मान रहे हैं। ध्यान कीजिए यह अलग काम नहीं है। बस इसके साथ दो चीजें ध्यान में रखनी है।
पहली प्रकृति के नियम और दूसरी अपने लक्ष्य और आकांक्षाओं के प्रति स्पष्ट नजरिया।
स्वयं को और परिवार व रोजगार को किस रूप में और कहां देखना चाहते हैं? क्या इस बारे में आप का निर्णय स्पष्ट है? उसका जवाब तलाशना होगा। इसके बाद देखें कि आप प्रकृति के साथ तालमेल बिठाने में कितने सक्षम हैं। यकीनन इन सवालों के जवाब से समझ पाएंगे कि आप वर्तमान को लेकर कितने सजग हैं और कहां तक उसके साथ जीवंतता से चल रहे हैं।

हमारे जीवन में कुछ ऐसी घटनाएं होती हैं, जिनका हमारे मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। किसी की कोई बात या कोई कड़वा अनुभव हमारे मन को इस कदर भेद जाता है कि पीड़ा लंबे समय तक बनी रहती है। जिसके कारण दिमाग में ग्रंथियां बन जाती हैं। ऐसे में हम अपने जीवन में बदलाव चाहते हैं यानि स्वयं को लेकर सजग नहीं रहते। हमारे भीतर चल रहे संघर्षों के आगे घुटने टेक देते हैं। यह सच्चाई है कि हर इंसान सुखमय जीवन जीना चाहता है। इसलिए वह दुख को अपने पास फटकने भी नहीं देना चाहता। फिर भी जीवन में दुख आते ही रहते हैं। कुछ लोग अपने दृढ़ संकल्प से मन के संघर्ष पर जीत हासिल कर लेते हैं, वे निरंतर अभ्यास के बल पर ही विचारों की उलझन और उनके नकारात्मक प्रभाव से बाहर आ जाते हैं और कुछ उन पलों को याद करके हमेशा दुखी रहते हैं। जिससे वे भूत और भविष्य के साथ-साथ अपना वर्तमान भी खराब कर लेते हैं। इसलिए याद रखिए दुख हर मनुष्य के जीवन में आते हैं जो वर्तमान में रहता है, वह इनको पार करके सुख प्राप्त कर लेता है लेकिन जो भूत और भविष्य में रहता है वह हमेशा दुखी रहता है।

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