197. प्रसन्नता

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

प्रसन्नता की शक्ति किसी बीमार और निर्बल व्यक्ति के लिए बहुत ही मूल्यवान है। यह कहावत शत- प्रतिशत सच है कि— एक प्रसन्नता से भरा हृदय, दवा का काम करता है। प्रसन्नता ईश्वर द्वारा दी गई औषधि है। यह एक ऐसी औषधि हैं, जिसमें प्रत्येक मनुष्य को स्नान अवश्य करना चाहिए। प्रसन्न रहने से बीमार जीवित बच जाता है और दुर्बल की आयु लंबी हो जाती है। इसलिए यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि— जहां तक हो सके अपने मन को प्रसन्न रखने की कोशिश करनी चाहिए।

प्रसन्नता से वह शक्ति प्राप्त होती है जो मानसिक क्रिया में परिणत हो जाती है और जो शरीर के प्रत्येक अंग की क्रिया के लिए आवश्यक है। मानसिक प्रवाह शरीर के अंदरूनी अंगों पर पूरा प्रभाव डालते हैं। यदि मन प्रसन्न है तो श्वासतन्त्र, पाचनतंत्र, रक्ततंत्र अति प्रसन्नता से कार्य करते हैं। प्रसन्नता के द्वारा शरीर में जीवनी स्फूर्ति का आविर्भाव होता है।
डॉक्टर यही सलाह देते हैं कि— स्वास्थ्य के लिए जी भर कर हंसना यानी खिलखिला कर हंसना अत्यधिक हितकर है।

दुख, चिंता, भय, ये मनुष्य के बहुत बड़े शत्रु हैं। एक चिड़चिड़ा, अहंकारी और गुस्से से भरे हुए चेहरे वाला मनुष्य अपने जीवन की पवित्रता का विश्वास खो देता है। उसे अपनी स्वयं की शक्तियों पर भी भरोसा नहीं रहता। वह अपने जीवन के आदर्श तक को भूलकर झगड़ालू, घमंडी, निरुद्देश्य और निरर्थक जीवन जीने लगता है। हमें ऐसे सभी दुष्प्रभावों के विरुद्ध संघर्ष करना चाहिए जो मन को हीन बनाने का प्रयत्न करते हैं। हमें उनका इतना ही विरोध करना चाहिए, जितना कि हम मन में आए हुए अपराध की भावना का करते हैं।

कई बार हम किसी व्यक्ति को देखकर कहते हैं कि— यह व्यक्ति शुभ दर्शन वाला है और यह व्यक्ति अशुभ दर्शन वाला है। ऐसा क्यों होता है? हम यह निर्णय कैसे करते हैं कि— इसको देखने से हमारा शुभ होगा और इसको देखने से हमारा अशुभ ही होगा। कभी इसके बारे में सोचा है, तो चलिए सोच कर देखिए जो मनुष्य शुभ दर्शन वाला होता है, इसका कारण स्पष्ट है कि— वह प्रसन्नचित्त है, उसके चेहरे पर हमेशा मुस्कान बिखरी रहती है। मन की प्रसन्नता से हृदय स्वस्थ रहता है जिसका नूर चेहरे पर साफ दिखाई देता है। एक मुस्कुराता हुआ चेहरा चारों ओर खुशनुमा वातावरण बनाए रखता है। इससे हम अपने जीवन में सबसे उज्जवल और उत्तम वस्तुओं को प्राप्त करने में सक्षम होते हैं।

शरीर- क्रिया- विज्ञान कहता है कि— सभी संवेदनात्मक नाड़ियां परस्पर संबंध रखती हैं। जब एक नाड़ी समूह मस्तिष्क तक कोई बुरा समाचार ले जा रहा होता है तो उसका प्रभाव सारी शिराओं, उपशिराओं एवं संवेदन-तन्तुओं पर पड़ता है। हम ऐसे समझ सकते हैं कि— जो नाड़ी-समूह अमाशय की ओर जाता है, उसके दुष्प्रभाव से अमाशय की गति अवरुद्ध हो जाती है, जिसके प्रभाव से चेहरे पर भी मुर्दनी-सी छा जाती है। ऐसे चेहरे को जो भी देखता है, उसे उसमें अशुभता ही नजर आती है क्योंकि उसको देख कर उसके स्वयं के भाव बदल जाते हैं और वह यही सोचता है कि— अब मेरा काम नहीं बनाने वाला और उसकी यही सोच उस चेहरे को अशुभ बना देती है।

दरअसल प्रसन्नता की शक्ति को, उसके महत्व को हम भलीभांति समझ ही नहीं पाए। हमें बच्चों को प्रारंभ से ही प्रसन्न रहने की आदत डालनी चाहिए और उनका स्वभाव प्रसन्नता से भरा हुआ बनाना चाहिए। इसलिए अपने बच्चों को प्रसन्नचित्त रहने के लिए प्रोत्साहन दीजिए और खूब खुलकर हंसिये। जी भर कर हंसिये। इससे छाती खुलती है और सारे शरीर में रक्त की लाली दौड़ती है।

अपने स्वभाव को ऐसा बनाइए कि— मुझे खुल कर हंसना पसंद है। दबी हुई हंसी हंसना पसंद नहीं है। ठहाके मार-मार कर हंसना पसंद है, जिससे सारा घर गुंज उठे। इससे आपके परिवार के सदस्यों का ही भला नहीं होगा बल्कि जो कोई हंसी को सुनेगा उनका भी भला होगा। घर की उदासी दूर हो जाएगी। प्रसन्नता बड़ी जल्दी फैलती है और दूसरे इसको बड़ी जल्दी ग्रहण कर लेते हैं। एक हार्दिक हंसी आन्नद से भरा संगीत है।

जो बच्चे विनोद पूर्ण स्वभाव के नहीं होते, वे कभी भी महान नहीं बन सकते। जिन पेड़ों पर फूल नहीं लगते, उन पर कभी फल भी नहीं लगेंगे। इसलिए प्रसन्नता की शक्ति को समझिए और हमेशा प्रसन्न रहने की भरपूर कोशिश कीजिए।

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