201. बड़ा आदमी

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

बड़ा आदमी एक ऐसा शब्द है, जिसे हम बचपन से ही सुनते आए हैं। हमारे बड़े-बुजुर्ग आशीर्वाद देते हुए यही कहते थे कि— बड़ा आदमी बनना। जीवन में सफलता प्राप्त करना, तरक्की करना। ये बड़ा आदमी क्या होता है? उस समय समझ नहीं आता था लेकिन कुछ बड़े होने पर माता-पिता का यह सपना बन जाता है। हर माता-पिता अपने बच्चे से यही उम्मीद करता है कि उसका बच्चा बड़ा आदमी बने और उस आशीर्वाद और सपने को मनुष्य जीवन भर भारी बोझ की तरह अपने कंधों पर ढोता रहता है।

बड़े होने पर यही समझ आता है कि— जिसके पास धन दौलत है जो बेशुमार संपत्ति का मालिक है, वही बड़ा आदमी है। जिसके पास बल और अधिकार है, वह बड़ा आदमी है। उस ऊंचाई तक पहुंचने के लिए मनुष्य अनेक कर्म करता है। जीवन में सफलता प्राप्त करने की आकांक्षा तो प्रत्येक मनुष्य करता है, परंतु विरले ही मनवांछित सफलता प्राप्त कर पाते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण परिश्रम और प्रयास के स्तर में अंतर है। अपेक्षित सफलता प्राप्त करने के लिए सतत् और सचेष्ट प्रयास करने होते हैं। उसे अपने जीवन में छोटी- बड़ी न जाने कितने परीक्षाएं देनी होती हैं।

सफलता और असफलता की परीक्षा में कभी मनुष्य सफल होता है तो कभी असफल होता है। ऐसे में असफलता मिलने पर निराश नहीं होना चाहिए, बल्कि अपनी कमियों पर विचार कर स्वयं को कर्म की अग्नि में डालना चाहिए। इसके पश्चात् ही सफलता स्वर्ण की भांति प्रखर होकर हमारा स्वागत करती है। हमें संसार में प्रतिष्ठा दिलवाती है। तभी हम बड़े आदमी बनते हैं।

आपने देखा होगा जब कोई प्रतिस्पर्धी किसी प्रतिस्पर्धा में उतरकर नया कीर्तिमान स्थापित करता है तो समस्त संसार उससे चमत्कृत होकर उसकी उपलब्धि को नमन करता है। परंतु यह याद रखना चाहिए कि यह कीर्तिमान क्षण मात्र में किए गए प्रयास का परिणाम नहीं है। इस सफलता में उसके वर्षों के संकल्प की सिद्धि का समावेश है। जो कीर्तिमान उसने बनाया है, वह मैदान पर अभ्यास के दौरान न जाने कितनी बार स्थापित किया होगा। तब कहीं जाकर वह दुनिया के सामने प्रतिस्पर्धा में उतरकर स्थापित करता है।

सफलता प्राप्त करने के लिए हमें कर्म की अग्नि में खुद को झौंकना पड़ता है। ठीक वैसे ही जैसे एक मक्के का दाना जब सिर्फ मक्का दाना ही होता है, तब उसका मूल्य बहुत कम होता है लेकिन यही मक्के का दाना जब आग में तपने के बाद भूनकर बाहर निकलता है तो उसके मूल्य में कई गुना वृद्धि हो जाती है। इसी तरह हमें अपने मूल्य में वृद्धि करने के लिए, अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए स्वयं को अग्नि के हवाले करना ही होता है। इसके पश्चात् हमें जो सफलता प्राप्त होगी, वह हमारे व्यक्तित्व के साथ- साथ हमारे भविष्य को भी प्रकाशित करेगी।

यह अच्छी बात है की प्रत्येक मनुष्य सफलता प्राप्त करे। उसके जीवन में खुशियां ही खुशियां हो। विश्व में वह अपना परचम लहराए लेकिन सिर्फ़ धन और बल हो, इसके आधार पर वह बड़ा आदमी बने। क्या इसमें ही जीवन की सार्थकता है? क्या बड़ा आदमी बनने का यही एक पैमाना है कि— वह जीवन में सफलता प्राप्त करे, अगर वह असफल हो गया तो क्या वह छोटा हो गया? क्या छोटा होना अयोग्यता है?

दरअसल मेरा तो यही मानना है कि मनुष्य का बड़ा होना नहीं, खरा होना मनुष्य जीवन की सार्थकता होनी चाहिए और वही उसका उद्देश्य होना चाहिए। क्योंकि बड़ा बनने के लिए बाहृय आधार की जरूरत है लेकिन खरा बनने के लिए अंतर की शुद्धता चाहिए। हमें अपने भीतर की अशुद्धियों को निकालना है। अपनी अंतरात्मा से अंधियारे को हटाकर सर्वव्यापी परमात्मा की ज्योति को प्रकाशित करना है।

सोना उतना ही खरा होता जाता है, जितना वह अग्नि में तपता है। शुद्धता ही सोने का असली मूल्य है। यदि मनुष्य के अवगुण छूट जाएं और गुण उसमें समा जाएं, उनसे ही उसकी श्रेष्ठता तय होती है, न की धन- दौलत से। मोंगरे के फूल छोटे होते हैं किन्तु सिंगार उन्हीं से किया जाता है। कोई महल बहुत बड़ा और आलीशान होने से वह पूज्यनीय नहीं होता। एक छोटे-से मंदिर में भी यदि आराध्य की मूर्ति स्थापित हो तो सिर झुकाने वालों की कतार लग जाती है और वह मंदिर उस विशाल और आलीशान महल से कहीं अधिक विशालता प्राप्त कर लेता है। इसलिए अपने अंतर्मन को शुद्ध कीजिए और ईश्वर के साथ संबंध स्थापित कीजिए। तभी आप सच में ही एक बड़े आदमी बन जाओगे।

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