224. सद्व्यवहार

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

आज के समय में प्रत्येक मनुष्य को कोई न कोई कारण हमेशा परेशान करने के लिए मौजूद रहता है। जिससे उसके सद्व्यवहार और शिष्टाचार में कमी दिखाई पड़ती है। लेकिन आज के दौर में आप किसी भी स्थान पर हों, चाहे सभागार, स्कूल, कॉलेज, कार्यक्षेत्र या घर में ही क्यों न हों, हर मनुष्य का व्यवहार अमर्यादित होता जा रहा है।

दरअसल अच्छा और कुशल व्यवहार हमारे जीवन का आईना होता है। तथ्य, तर्क और संयम इसके साथी होते हैं। वस्तुतः हमारे आचरण से हमारे संस्कार का दर्शन होता है। हमारे व्यवहार से ही घर- बाहर हमारी अच्छी या बुरी छवि बनती है।
चाणक्य तो कहते हैं— सद्व्यवहार और शिष्टाचार से दुश्मन तक को जीता जा सकता है। इतिहास के पन्नों में ऐसी हजारों घटनाएं मोटे अक्षरों में दर्ज हैं। अक्सर यह देखने को मिलता है कि- अंदर से कमजोर लोग, असुरक्षा की भावना या हीन भावना से ग्रसित लोग या फिर बहुत जल्दी सब कुछ पाने के लिए लालायित लोग, जाने-अनजाने में ऐसा अमानवीय व्यवहार ज्यादा करते हैं। आक्रामक, दबंग या लीडर की भूमिका निभाने वाले मनुष्य मानवीयता की मूल भावना को भूलकर पद के अहंकार से ग्रस्त होकर अपने अधीनस्थ कर्मियों को बात-बेबात, डांटते- फटकारते रहते हैं। अगर हमारे कार्य क्षेत्र में आपसी रिश्ते ठीक नहीं हैं, तो इसका प्रत्यक्ष व परोक्ष प्रभाव हमारे कार्य के साथ-साथ कर्मचारियों के घर पर भी पड़ता है, जिससे घरेलू माहौल भी तनावपूर्ण रहता है।

मेडिकल साइंस भी यह स्वीकार करता है कि— किसी के साथ गलत या अमर्यादित व्यवहार करने से सबसे पहले हम स्वयं नकारात्मकता से भर जाते हैं। जिसका बुरा असर हमारे मेटाबालिज्म पर पड़ता है। कहा भी गया है—”जैसा बोएंगे वैसा ही काटेंगे” यानी आज नहीं तो कल ब्याज समेत उसी तरह का व्यवहार हमें भी मिलता है, जिससे हमारा तनाव और ज्यादा बढ़ जाता है। कभी-कभी यह परिवार के किसी सदस्य, मित्र या फिर किसी पड़ोसी का व्यवहार हो सकता है, जिससे आप परेशान हो सकते हैं। यदि इस प्रकार की कोई समस्या नहीं हो रही तो किसी पशु जैसे कि कुत्ते के रात को भोकने पर भी आपको समस्या हो सकती है। पाया गया है कि इस श्रेणी के लोग भी कहीं न कहीं अंदर से दुर्बल और अनजाने भय के शिकार होते हैं। बुद्धि के मामले में भी वे कमतर पाए गए हैं। अपनी कमियों को छिपाने और अपने को निडर दिखाने के प्रयास में अमर्यादित व्यवहार का तरीका अपनाते हैं।

आगे बढ़ने का एकमात्र तरीका यह है कि हम सद्व्यवहार के साथ अच्छे कार्य करें। लोगों और स्थितियों को उसी तरह स्वीकार करें, जैसा कि वे हैं। जिस क्षण आप किसी स्थिति या व्यक्ति को स्वीकार करते हैं, मन शांत हो जाता है और आपको प्रतिक्रिया की बजाय सोचने और कार्य करने के लिए समय मिल जाता है। यह समझने की भूल कदापि नहीं करनी चाहिए कि स्वीकृति का यह सूत्र निष्क्रियता की वकालत करता है। आप शांत मन से और निश्चय पूर्वक होकर सक्रिय कार्य करते हैं। स्वीकृति का सूत्र सोच-समझकर कर्म करने के लिए कहता है न की हताश होकर कार्य करने के लिए। कर्मों में सबसे अच्छा संतुलन केवल तभी संभव है, जब शांत मन से और सद्व्यवहार से सटीक कर्म किया जाए। इसलिए न तो लोगों से निराश हों और न ही खुद से। अपना व्यवहार अच्छा रखें, अपना उत्साह बनाए रखें और जहां जरूरत हो वहां काम करें।

आपका शरीर एक कमजोर खोल की तरह है। आपका मन या भीतर का स्वयं, पानी जैसा है। आप अंदर पानी की तरह हैं— स्वच्छ और निर्मल। पानी की प्रकृति ठंडी और बहने वाली है, लेकिन जब आपका अंतरतम ईर्ष्या, क्रोध, हताशा और आपके द्वारा दिए गए सभी तरह के नकारात्मक तापों से जल रहा होता है, तो यह पानी की तरह उबलने लगता है और इसकी शीतल प्रकृति गायब हो जाती है। जब यह नकारात्मक विचार मन में आता है, तो यह आप को बांधता है। जब आप बंधा हुआ महसूस करते हैं, तो मन में स्वतंत्रता का भाव नहीं होता। जिस क्षण आपके अंदर विरोध खत्म हो जाता है और आप नरम हो जाते हैं, तो कठोरता पिंगल जाती है। बंधे रहने का एहसास खो जाता है और आपके अच्छे व्यवहार की बदौलत सुख, समृद्धि व धन सहित सभी कुछ प्राप्त होने लगता है।

यदि सब ज्वलनशील नकारात्मक विचारों को हटा दिया जाता है, तो जल शीतल हो जाता है। शीतलता पानी की प्रकृति है। ठीक इसी तरह जब अन्य सभी नकारात्मक तनाव को हटा दिया जाता है, तो अंतर्मन अपने सभी प्राकृतिक गुण, विनम्रता, विनयशीलता और स्वाभाविकता को प्राप्त कर लेता है। आपको यह कभी नहीं मानना चाहिए कि आपके अंदर गहराई में कोई नकारात्मकता, दुख, क्रोध या ईर्ष्या है। ईश्वर ने आपको सर्वगुण संपन्न करके इस धरा पर अवतरित किया है। आपके सद्व्यवहार से आपके व्यक्तित्व की एक पहचान बनती है। इसलिए अपने व्यवहार को और बेहतर बनाने में ध्यान लगाइये। हमें कोशिश करनी चाहिए कि इस ध्यान को हम खुद को विकसित करने में, स्वंय को बेहतर करने में लगाएं, न कि दूसरों को जज करने में उसे व्यर्थ करें। हमने अपने जजमेंट को पूरी एकाग्रता के साथ स्वयं को व्यवहार कुशल होने में लगाना चाहिए।

भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण सभी सद्गुणों के बारे में बात करते हैं और फिर कहते हैं कि— ये सभी गुण पहले से ही आप में हैं। एक अणु की तरह आपके केंद्र में सकारात्मकता है और परिधि पर नकारात्मकता। नकारात्मकता ज्यादा गहरी नहीं है, क्योंकि यह केंद्र में नहीं है। शांति और शीतलता आपके स्वभाव और व्यवहार में शामिल है। कठोरता और विनम्रता एक-दूसरे के विरोधाभासी हैं। अगर आम इंसानों से हमारा व्यवहार अमानवीय और नकारात्मक है, तो हमारी सारी अचीवमेंट निरर्थक साबित होती है। कहने का आशय यह है कि हम कितने भी कीमती और सुंदर कपड़े पहन लें, बहुत अमीर हों या बहुत सारा ज्ञान प्राप्त कर बड़ी-बड़ी डिग्रियों के मालिक हों, अगर हमारा व्यवहार अच्छा नहीं है, तो हम अच्छी पहचान नहीं बना पाएंगे।

दिलचस्प बात यह है कि— जिसे आपने भी नोटिस किया होगा कि कई लोग बस अपने आस-पास के लोगों में अपना अच्छा इंप्रेशन बनाने के लिए अच्छा होने या अपने आचरण को अच्छा दिखाने का प्रयास करते हैं, लेकिन देर-सवेर उनके इस कृत्रिम रूप का पर्दाफाश होना तय होता है। कहते हैं न कि झूठ का मुखोटा सत्य को बाहर आने से ज्यादा दिन तक नहीं रोक सकता। इसलिए समाज और देश के उत्थान के लिए हमें सद्व्यवहार को अपने जीवन में शामिल कर लेना चाहिए और उच्च पदों पर आसीन हुए मनुष्यों को सदैव अपने पद और गरिमा के अनुसार ही व्यवहार करना चाहिए, क्योंकि वे जिस प्रकार का व्यवहार करेंगे, आम मनुष्य भी उसी का अनुसरण करेंगे। वे अच्छा आचरण करेंगे, तो उनके सहकर्मी के साथ-साथ अधीनस्थ कर्मी भी अच्छे आचरण को प्रेरित होंगे, जिससे व्यक्ति, समाज, देश और अंततः विश्व का कल्याण होगा।

इसलिए अक्सर हमें देखने को मिल जाता है कि बड़े पदों पर बैठे जो भी अच्छे एवं सच्चे लोग हैं, उनका व्यवहार बहुत ही शालीन और हृदयस्पर्शी होता है। वे मूलत: “सर्वे भवंतु सुखिन:” तथा ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ के सिद्धांत पर चलते हैं। इसके परिणामस्वरुप वे दूसरों की तुलना में ज्यादा परफॉर्मिंग, सरल, सामाजिक, मिलनसार एवं लोकप्रिय होते हैं। इसलिए मेरा यह मानना है कि अपने सद्व्यवहार से सकारात्मकता का इतना बड़ा केंद्र बनाया जाए कि मनुष्य चुंबक की तरह खुद ही आपकी तरफ खींचे चले आएं।

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