226. सत्य की शक्ति

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

सत्य अर्थात् जैसा देखा, जैसा सुना और जैसा अनुभव किया, उसे वैसा ही कहना और उसी के अनुरूप अपने जीवन को ढालना सत्य कहलाता है। सत्य जो पूरी तरह यथार्थ या संपूर्ण हो। जिसमें जरा- सी भी अपूर्णता ना हो, किसी तरह का दोष ना हो। सत्य के बगैर सृष्टि की सत्ता संभव ही नहीं है। सत्य को ईश्वर और ईश्वर को सत्य कहा गया है। जिसने अपने जीवन में सत्य को धारण कर लिया, उसे किसी प्रकार की चिंता नहीं होती। जैसा उसके मन में होता है, वह वैसा ही बोलता है और उसी के अनुरुप अपना जीवन निर्वाह भी करता है। उसके मन में कुछ और जुबान पर कुछ और तथा व्यवहार में कुछ और नहीं होता।

मुंडक उपनिषद् में वर्णित आदर्श वाक्य “सत्यमेव जयते” सबसे पवित्र माना जाता है। सत्य को वेदों में ब्रह्मांड का आधार बताया गया है। ब्रह्मांड में जितने भी ग्रह- उपग्रह हैं, सब का अस्तित्व और स्वभाव सत्य से ही निर्धारित होता है। यह बात अलग है कि अंधकार और प्रकाश में, दिन और रात में, शुभ और अशुभ में, हिंसा और अहिंसा में किसमें सत्य है और किसमें असत्य है। हालांकि देखा जाए तो दोनों में सत्य है। अंधकार भी सत्य है लेकिन शुभ नहीं है और प्रकाश भी सत्य है लेकिन यह शुभ है। सुख के साथ जो लाभ प्राप्त होता है, वही सच्चा सुख देने वाला है। इसलिए एक साथ शुभ- लाभ लिखा जाता है। हमारा विकास सत्य होने के साथ-साथ शुभ भी होना चाहिए क्योंकि शुभ से संसार में शुभता बढ़ती है।

सत्य केवल मनुष्य द्वारा सत्य वचन बोलने या जीवन में विभिन्न प्रश्नों के पूर्ण सत्यता से उत्तर देने तक ही सीमित नहीं है बल्कि सत्य की पहुंच तो मन के भीतर की गहराइयों में वहां तक होनी चाहिए जहां तक मनुष्य की स्वयं की सत्यता की शक्ति से मन के भीतर के द्वार खुल जाएं। इन द्वारों के अंदर जब सत्य की शक्ति की तेजस्वी किरणें पहुंचती हैं, तब वे भीतर की दुनिया को प्रकाश से जगमगाकर व्यक्ति को सत्य की पूर्णता का अहसास करा देती हैं। उस समय मस्तिष्क में उभर चुके तमाम प्रश्न एवं आने वाले विभिन्न स्वाभाविक विचार अपने आप ही विसर्जित हो जाते हैं। यह विसर्जन ही मनुष्य को अद्भुत शांति की ओर ले जाता है।

वास्तव में देखा जाए तो मस्तिष्क में उभरते हुए तमाम पश्न और कुछ नहीं बल्कि हमारे अशांत चित्त की स्वाभाविक उपज ही है। मनुष्य का अध्यात्मिक विकास इस बात पर निर्भर करता है कि— मन स्थिर हो, मानसिक उलझनों और मोह से मुक्त हो। यह सब सत्य की शक्ति द्वारा ही संभव होता है क्योंकि सत्य बोलने वाले मनुष्य का चित्त हमेशा शांत रहता है। मनुष्य का चित्त जैसे- जैसे शांत होता जाता है, वैसे- वैसे अनसुलझे प्रश्नों का उभरना अपने आप बंद हो जाता है और यही व्यक्ति की आत्मिक अवस्था होती है जो उसे ज्ञान प्राप्ति की ओर अग्रसर करती है।

आपने यह अवश्य सुना होगा कि किसी का ध्यान जल्दी लग जाता है और किसी-किसी मनुष्य का ध्यान तो कई वर्षों तक भी नहीं लग पाता। उसके पीछे यही कारण है कि जिसका चित्त शांत होता है, उसका ध्यान जल्दी लग जाता है और जिसका चित्त अशांत होता है, उसका ध्यान नहीं लगता। ऐसा सत्य की शक्ति के कारण ही होता है। जो मनुष्य अध्यात्मिक उपलब्धियों को प्राप्त करना चाहते हैं, वे सच्चाई के गुण का आदर करते हैं क्योंकि मनुष्य के जीवन में सत्य का बहुत महत्व है। यदि हमारी जीवन रूपी ईमारत सत्य की नींव पर खड़ी होगी तभी हमारा चित्त शांत होगा और शांत चित्त ही सफलता के शिखर स्थापित करने में सहायक होगा।

ध्यान की अवस्था भी एक ऐसी अवस्था होती है। जिसमें अनसुलझे प्रश्नों का विसर्जन हो जाता है। इसे समाधान कहा जाता है तथा इस प्रकार का समाधान ही समाधि की अवस्था होती है। ऋषि-मुनियों द्वारा वैदिक काल से समाधि की अवस्था को प्राप्त करना और फिर अपने अंतर्मन में झांकना एक चमत्कारी ढंग रहा है, जिससे हम यह जान सकने में समर्थ हो सकते हैं कि— जिस सता के अधीन हम जीवन यापन कर रहे हैं, उसे किस प्रकार से अनुभव कर सकें। दूसरे शब्दों में ईश्वरीय सत्ता से किस प्रकार से साक्षात्कार कर सकें। इसलिए हमने सत्य की शक्ति को समझना होगा क्योंकि आवश्यकता इस बात की है कि हमारा चित्त शांत रहे। शांत चित्त ही मस्तिष्क में उतरने वाले अनसुलझे विचारों का विसर्जन यथाशीघ्र करने में सक्षम होता है अर्थात् उसे अपने प्रश्नों के उत्तर मिल जाएंगे, उनका समाधान मिल जाएगा, तभी हमारा मन प्रसन्न रहेगा और चित्त शांत रहेगा क्योंकि बगैर शांत चित्त के हम ईश्वर से साक्षात्कार करने में सफल नहीं हो सकते इसलिए हमें अपने जीवन में सत्य को धारण करना चाहिए।

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने सदैव सत्य के मार्ग का अनुसरण किया। सत्य ही धर्म है इसलिए उनका मार्ग, धर्म का मार्ग कहलाया। उन्होंने सत्य की शक्ति से असत्य को धराशाई किया। रावण ने असत्य और छल का मार्ग अपनाकर स्वयं के विनाश को आमंत्रित किया। यह स्पष्ट है कि असत्य का मार्ग सदैव विनाश का मार्ग रहा है। असत्य चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, फिर भी इतना शक्तिशाली नहीं होता कि वह सत्य पर आधिपत्य स्थापित कर सके। असत्य ने चाहे अपनी जड़ें कितनी भी मजबूत कर ली हों फिर भी एक समय ऐसा अवश्य आता है, जब वह सत्य से हार जाता है। रावण बहुत शक्तिशाली, महाज्ञानी और ज्योतिष शास्त्र का बहुत बड़ा विद्वान होने के बावजूद भी श्री राम से युद्ध हार गया, उसके कुल का समूल नाश हो गया। उसके घर में दीपक जलाने वाला भी कोई नहीं रहा। यह सब सत्य की शक्ति के कारण ही हुआ क्योंकि श्री राम के पास सत्य की शक्ति थी लेकिन रावण समय रहते सत्य की शक्ति को जान ही न सका। उसकी नींव असत्य के धरातल पर टिकी हुई थी।

श्री राम सत्य के अनुगामी रहे। उन्होंने सत्य की जीत के लिए अपनी सभी क्षमताओं का प्रयोग किया। रावण के दिग्गज वीर योद्धा श्री राम की वानर सेना के सामने टिक न सके। विजयदशमी का पर्व हमें अपने जीवन में सत्य के मार्ग को आत्मसात् करने के लिए प्रेरित करता है। त्रेता युग से शुरू हुआ यह सिलसिला द्वापरयुग से होता हुआ कलयुग में भी सत्य के प्रभाव को कम नहीं होने देता बल्कि उसका उत्कर्ष बढ़ता ही चला जाता है। सत्य प्रेरणा बनकर हमारे जीवन को आलोकित करता है।

One thought on “226. सत्य की शक्ति”

Leave a Reply