228. सदैव सत्य बोलें

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

मनीषी कहते हैं कि— “मनसा वाचा कर्मणा” यानी मन, वचन और कर्म से सत्य बोलना चाहिए।
जो विचार मन में हों, वही वाणी में भी होने चाहिएं और उसी के अनुरूप ही मनुष्य का व्यवहार होना चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं कि मन, वचन और कर्म से अलग रहने वाले मनुष्य पूर्णरूपेण सत्य का आचरण नहीं कर सकते। प्रायः सत्य कड़वा होता है। इसलिए सत्य बोलने वाले मनुष्यों को कोई भी पसंद नहीं करता। फिर भी उनकी उपस्थिति अत्यंत आवश्यक है क्योंकि असत्य बोलने वालों की भीड़ ज्यादा है इसलिए मनुष्य का आचरण पशुवत् हो गया है।

प्रत्येक क्षण हमें यह चुनाव करना होता है कि हम जीवन में सत्य बोलें या झुठ बोलें। हम में से बहुत से मनुष्य यही समझते हैं कि अगर वो झूठ बोलते हैं या दूसरों को धोखा देते हैं तो कभी भी, कोई भी उसके झूठ का पता नहीं लगा पाएगा इसलिए कुछ प्राप्त करने या किसी वस्तु से छुटकारा पाने के लिए मनुष्य अक्सर झूठ बोलते रहते हैं। वे भूल जाते हैं कि सत्य हमेशा किसी न किसी प्रकार से प्रकट हो ही जाता है। जब हम अपने जीवन में सत्य को धारण कर लेते हैं, हमेशा सच बोलते हैं तो फिर डरने की क्या आवश्यकता है?

दूसरे व्यक्ति हमारा आदर करते हैं, सम्मान करते हैं, हम पर विश्वास करते हैं और जब हम उनके बीच में जाते हैं, तब हमारा मन बिल्कुल साफ होता है, तब हम गर्दन उठा कर बात कर सकते हैं क्योंकि हमने कोई छल कपट नहीं किया होता। लेकिन जब हम झूठ बोलते हैं तो हमें एक झूठ को छुपाने के लिए कई और झूठ बोलने पड़ते हैं। इतने सारे झूठ को याद रखना बहुत कठिन होता है। जबकि सच तो केवल एक ही होता है और याद रखना भी आसान होता है। झूठ ऐसा उलझा हुआ जाल बुनता है, जिसके हर रेशे को याद रखना पड़ता है। जिसको हम चाहते हुए भी याद नहीं रख सकते और हमें अंदर से यह डर भी सताता है कि किसी को सच का पता लग जाएगा तो क्या होगा। उस समय हमारे मन का शांत होना बहुत मुश्किल हो जाता है। इसलिए डर कर जीने की बजाय हमें सत्य बोलना चाहिए ताकि शांति से अपने जीवन में आगे बढ़ सकें।

“सत्य बोलें और प्रिय बोलें” के सिद्धांत का अनुपालन करने वाला कभी भी कठोर वाणी का प्रयोग नहीं करता क्योंकि कड़वा बोलकर किसी का मन दुखाना उसका उद्देश्य नहीं होता। सत्य बोलने वाला यह कभी नहीं देखता कौन उसका अपना है और कौन पराया है। क्योंकि उसे पता होता है कि सत्य से बढ़कर कोई दूसरा धर्म नहीं है और धर्म धारण करना ही मनुष्य के जीवन का कल्याणकारी मार्ग है। इसलिए वह अपने- पराए का विचार किए बिना निर्भय होकर सत्य ही बोलता है।

सत्य को छोड़कर जो असत्य बोलता है। धर्म का उल्लंघन करता है। परलोक की जिसे चिंता नहीं, वह मनुष्य बड़े से बड़ा पाप कर सकता है। इसलिए असत्य का परित्याग करना ही श्रेयस्कर है। एक सत्य हमें तमाम असत्य बोलने से बचा लेता है। सत्य केवल शब्दों की सत्यता ही नहीं बल्कि विचारों की सत्यता भी है। हमारी समस्त गतिविधियां सत्य पर केंद्रित होनी चाहिए। सत्य ही हमारे जीवन का प्राण तत्व होना चाहिए क्योंकि सत्य के बिना व्यक्ति अपने जीवन के वास्तविक लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकता। असत्य के बल पर मनुष्य को एक बार सफलता अवश्य मिल सकती है परंतु आंतरिक शांति और संतुष्टि तो कभी प्राप्त नहीं हो सकती।

सत्य सदैव विजयी होता है और सत्य के पथ का अनुसरण करने वाला विजेता बनता है। सत्य की शक्ति अलौकिक होती है। उसमें असीम ऊर्जा समाहित रहती है। सत्य के आलोक में व्यक्ति का व्यक्तित्व अद्भुत हो जाता है। सत्य का आचरण करने वाला सदैव आत्मविश्वास से भरा रहता है, उसे भय स्पर्श भी नहीं कर सकता। उसका मस्तक सदैव ऊंचा रहता है। यह सच है कि सत्य के मार्ग में विपत्तियां अवश्य आती हैं। यह मार्ग पग-पग पर कांटो से भरा हुआ होता है परंतु इस पर चलने वाले मनुष्य को जो आनंद मिलता है, वह अनिर्वचनीय है।

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