230. अपना मूल्य पहचानें

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

मनुष्य की एक आदत है कि— वह कुछ कार्यों को तुरंत कर लेता है और कुछ को अगले दिन के लिए छोड़ देता है। लेकिन ज्यादातर वही कार्य अगले दिन पर छोड़े जाते हैं जो अधिक महत्वपूर्ण नहीं होते। क्योंकि मनुष्य अपनी सफलता का मूल्यांकन भौतिक वस्तुओं की उपलब्धियों के आधार पर करता है। वह यही सोचता है कि उसके पास जितने ज्यादा ऐसो- आराम के साधन उपलब्ध होंगे, वह उतना ही सफल होगा। परंतु क्या उसने कभी यह भी सोचा है कि—वह जिस जीवन को भौतिक सुखों को पाने की लालसा में दिन-रात लगा रहा है, वह जीवन उसे क्यों मिला है? उसके जीवन का उद्देश्य क्या है? उसके इस जीवन का मूल्य क्या है?

अगर देखा जाए तो एक तरफ सारे ऐसो- आराम के साधन हैं और दूसरी तरफ है, हमारा जीवन!
जो खुद हमारे लिए है, जिसके बारे में हम कभी नहीं सोचते। यह सच्चाई है कि जो वस्तु हमें जीवन में आसानी से उपलब्ध हो जाती है, उसके मूल्य को हम जानने की कोशिश ही नहीं करते। ईश्वर ने जिस उद्देश्य से हमें जीवन दिया है, उसकी तरफ हम ध्यान देते ही नहीं बल्कि इस संसार में आने के बाद भौतिक संसाधनों को इकट्ठा करने में लग जाते हैं।

अक्सर देखा जाता है, जहां पानी की बहुतायत होती है यानी पानी की कमी नहीं होती, वहां लोग पानी को बर्बाद करते हैं, पर जहां पानी की कमी होती है, वहां नल के नीचे भी एक बर्तन रख दिया जाता है ताकि पानी बर्बाद न हो। इसी तरह हमारा जीवन भी है जिसका हर श्वास मूल्यवान है। एक दिन ऐसा था जब हमने पहला श्वास लिया था और एक दिन ऐसा भी होगा, जब हमारा अंतिम श्वास होगा। पहले श्वास और अंतिम श्वास के मध्य में है, आज का समय। इस आज के समय को हम दुनिया की सभी भौतिक वस्तुओं को संग्रह करने में लगा देते हैं लेकिन जो अनमोल जीवन मिला है, उस पर ध्यान ही नहीं देते।

एक व्यक्ति बहुत बीमार था। वह अपनी आखिरी सांसें गिन रहा था। इसलिए उसने अपने पुत्र को अपने पास बुलाया और अपनी आखरी इच्छा जाहिर करते हुए कहा— यह लो, वह घड़ी जो तुम्हारे दादा जी ने मुझे दी थी। यह लगभग 200 वर्ष पुरानी है। परंतु मैं यह चाहता हूं कि तुम इसे ज्वेलरी की दुकान पर ले जाओ और इसका मूल्य पूछो।

पिता की इच्छा को जानकर पुत्र ज्वेलरी की दुकान पर गया और उस घड़ी का मूल्य पूछा।

ज्वेलर की दुकान पर उसका मूल्य मात्र ₹400 बताया गया क्योंकि वह एक बहुत पुरानी घड़ी थी।

पिताजी ने कहा ठीक है, अब जरा इसे साहूकार के पास ले जाओ।

पुत्र ने साहूकार के पास जाकर उस घड़ी का मूल्य पूछा।

साहूकार ने उसका मूल्य ₹200 लगाया क्योंकि उसमें बहुत ज्यादा खरोंच लगी हुई थी।

इसके पश्चात् पिता ने कहा कि— अब तुम संग्रहालय में जाओ और इस घड़ी को दिखाओ।

पुत्र के मन में भी सवाल उठने लगे। आखिर पिताजी इस तरह एक जगह से, दूसरी जगह क्यों भेज रहे हैं? इस घड़ी में ऐसा क्या है जो पिताजी मुझे बार-बार दूसरी जगह भेज रहे हैं? वह परेशान हो गया परंतु यह पिताजी की आखिरी इच्छा थी, इसलिए वह संग्रहालय में गया और वहां जाकर वह घड़ी दिखाई।

संग्रहालय में उस घड़ी का मूल्य ₹375000 लगाया गया। वे इस कीमती और अनमोल वस्तु को अपने पास रखना चाहते थे।

इतना मूल्य सुनकर पुत्र को बड़ा आश्चर्य हुआ। इसलिए उसने वापस आकर पिता जी से पूछा—आप क्या कहना चाहते हो? आपको पहले से ही इस घड़ी का मूल्य पता था फिर भी आप मुझे इधर-उधर इसका मूल्य पूछने के लिए भेज रहे थे। इसका क्या कारण है?

अब पिताजी ने कहा— बस मैं यही चाहता था कि तुम जीवन में सही जगह कार्य करो। जहां तुम्हें अपने वास्तविक मूल्य का पता चले।

पिता ने अपने पुत्र को समझाते हुए कहा— उस जगह पर कभी कार्य मत करना, जहां पर लोग तुम्हारे मूल्य को न समझें, तुम्हें कमतर समझें या तुम्हारी प्रशंसा न करें।

दरअसल जो मनुष्य अपने मूल्य को नहीं जानता, वह बहुत कम में समझौता कर लेता है परंतु जो अपने मूल्य को जानता है, वह उनको अनदेखा करता हुआ जीवन में आगे बढ़ जाता है।

अपने जीवन को अनमोल बनाने के लिए हमें स्वयं पर नियमित ध्यान देना होगा। प्रत्येक दिन जो हम कार्य करते हैं, वह हमारे मूल्य को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाता है। दिन आता है, चला जाता है कोई बहाना नहीं, कोई शॉर्टकट नहीं। केवल समर्पण और संकल्प हमें वह बना देता है जो हम बनना चाहते हैं।

अक्सर हम उसी दिन को अच्छा समझते हैं, जिसमें हमारे कारोबार में वृद्धि होती है। अच्छी नौकरी मिलती है परंतु हमें यह जानना होगा कि अच्छा दिन तो वह होगा, जिस दिन हम कहेंगे मेरा श्वास चल रहा है, मैं जीवित हूं। मेरे पास यही अवसर है। मैं इसे खोना नहीं चाहता। जिस दिन स्वयं के मूल्य को समझ जाएंगे, उस दिन से हमारा जीवन व्यर्थ नहीं होगा। उस दिन हम भी अपना हृदय रूपी बर्तन उस नल के नीचे रख देंगे जो पानी व्यर्थ बह रहा था। हमारी जिंदगी संवर जाएगी। हम अपने जीवन को सुखपूर्वक जीने लगेंगे।

हम प्रत्येक दिन हृदय से और आनंद के साथ कहने लगेंगे कि—
हे सृष्टि रचयिता परमपिता परमात्मा! आपका लाख-लाख धन्यवाद!
और उस दिन हम कहेंगे कि आज का दिन ही हमारे जीवन का पहला दिन है। कल अगर फिर यह दिन आया तो हम इसे बेकार नहीं जाने देंगे। उस दिन हम यह समझ जाएंगे कि यदि हमें कोई कमत्तर समझता है तो उस पर ध्यान नहीं देना है। अपनी उर्जा और समय को उन बातों में, उन मनुष्यों से दूर हटा लेना है, जो हमारे मूल्य को नहीं जानते। उस दिन हमें अपने प्रत्येक श्वास का मूल्य समझ में आ जाएगा। हम यह जान जाएंगे कि हमारा जीवन कितना अनमोल है और अपने जीवन को ओर बेहतर बनाने के लिए प्रतिपल  प्रयास करेंगे।

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