239. ज्ञानी

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए मनुष्य अपना मार्ग स्वयं प्रशस्त करता है और सफलता प्राप्त करने के लिए ज्ञान की महती आवश्यकता होती है। ज्ञान प्राप्त कर मनुष्य अपनी हर मनोकामना की पूर्ति कर सकता है। आज के समय उसमें ज्ञान की कमी है। डिग्री प्राप्त कर लेने से ही ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती। हमारे पूर्वजों के पास ज्ञान का भंडार था, जिसके कारण उन्होंने स्वयं को और समाज को समृद्ध किया। वह ज्ञान उन्होंने प्रकृति के मध्य रहकर स्वाध्याय और चिंतन मनन से प्राप्त किया था। इसी के आधार पर उन्होंने महानतम ग्रंथों की रचना की। उन्होंने अपने समय की परिस्थितियों और प्रकृति से सानिध्य स्थापित किया। ध्यान-योग के द्वारा बहुत कुछ जाना। जिसे लिपिबद्ध कर के वर्तमान के लिए छोड़ गए हैं। यह ज्ञान वेदों, पुराणों और उपनिषदों में भरा पड़ा है।

इसका अभिप्राय यह बिल्कुल भी नहीं है की पुस्तकीय विद्या निरर्थक है लेकिन विद्या ग्रहण करना और सच्चा ज्ञान प्राप्त करना दो भिन्न-भिन्न बातें हैं। विद्या किसी मकसद को प्राप्त करने के लिए ग्रहण की जाती है, जिसके पूरा न होने पर मनुष्य दुख से ग्रस्त हो जाता है। वहीं दूसरी तरफ ज्ञान दूसरों के लिए अर्जित किया जाता है। उसे स्वयं अपने लिए कुछ नहीं चाहिए। यह एक अनोखी शक्ति है लेकिन इस को प्राप्त करने के लिए प्रयास अनिवार्य है। स्वयं को सागर मंथन की तरह मथ कर ही ज्ञान की प्राप्ति की जा सकती है।

एक मनुष्य तभी ज्ञानी बन सकता है, जब उसमें ज्ञान प्राप्त करने की प्यास होती है। मानवजीवन की मांगलिक यात्रा के लिए जिस प्यास की आवश्यकता होती है, वह होती है— ज्ञान की प्यास। ऐसे लोग भाग्यशाली होते हैं जिन्हें यह प्यास पीड़ित करती है। परंतु इस पीड़ा का आनंद भी विलक्षण होता है जो अकथनीय और अलौकिक है। जिसको ज्ञान प्राप्त करने की प्यास सताती है, वही इसका अनुभव कर सकता है और इस प्यास को शांत करने की क्षमता भी केवल गुरु के पास ही है। जिस प्रकार बादल वर्षा से धरती की प्यास बुझा देते हैं, वैसे ही गुरु अपनी ज्ञान वर्षा से शिक्षा के ज्ञान की प्यास को शांत कर उसके अंत स्थल को शीतल कर देता है।

भगवत् गीता में ज्ञान को पवित्रतम कहा गया है। इसी कारण मनुष्य के अंतः करण में उत्पन्न होने वाली ज्ञान अर्जन करने की लालसा का भाव पवित्र तथा लोकोपकारी है। इसी ज्ञान को प्राप्त कर ज्ञानी, ध्यान योग का निर्मात्ता बन जगत् का कल्याण करता है।

ज्ञान की प्यास अष्टावक्र में भी थी जिन्होंने मां के गर्भ में ही अपने ज्ञान को इतना तेजस्वी बना लिया था कि एक दिन वेद पाठ करते समय अपने पिता को ही रोक दिया। जिसके कारण उसके पिता क्रोधित हो उठे और उन्हें आठ जगह से टेढ़ा होने का श्राप दे दिया। अपने ज्ञान की शक्ति के द्वारा ही एक दिन उन्होंने राजा जनक की सभा में अपने ही पिताश्री के प्रतिद्वंदी को शास्त्रार्थ में पराजित किया और पिता के स्वाभिमान को लौटाया।

ज्ञानी मनुष्य उस सागर के समान होता है, जिसमें नदियां अपना अस्तित्व खो कर स्वयं सागर मैं विलीन हो जाती हैं, फिर भी अपने आप को धन्य मानती हैं। ज्ञानी मनुष्य में स्वार्थ और अपना- पराया का कोई स्थान नहीं होता। ज्ञानीजन अपने ज्ञान के द्वारा परिवार, समाज और राष्ट्र को शिखर पर पहुंचाने की क्षमता रखते हैं।

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