248. आत्मविश्वास

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

एक दिव्यांग युवक से एक दिन उसके सहपाठी ने पूछा— तुम्हारी इस दिव्यांगता का कारण क्या है? लड़के ने उत्तर दिया— मुझे बचपन में ही पोलियो हो गया था।
सहपाठी ने पूछा— इतने बड़े संकट के बावजूद तुम इतनी मुस्कुराहट और आत्मविश्वास के साथ संसार का सामना कैसे करते हो?
लड़के ने मुस्कुराकर जवाब दिया— इस रोग ने तो सिर्फ मेरे शरीर को छुआ है, मेरे मन और आत्मा को नहीं।
अक्सर कितनी बार ऐसा होता है कि हम स्वयं को, परिवार के सदस्यों को या किसी भी अन्य मनुष्य को छोटी-छोटी तकलीफों की शिकायत करते देखते रहते हैं। हमें कई बार शारीरिक चुनौतियों से भी जूझना पड़ता है। मुश्किलों से परेशान होकर शिकायत करते रहते हैं‌। अगर आसपास नजर दौड़ाएं तो देखेंगे कि कितने ही मनुष्य गंभीर रोगों से ग्रस्त हैं। किसी- किसी का तो कोई अंग ही नहीं है तो किसी को कोई जानलेवा बीमारी है। इनमें से कुछ मनुष्य ऐसे भी होते हैं जो इन चुनौतियों के बावजूद भी अपनी जिंदगी को भरपूर जीते हैं क्योंकि उस दिव्यांग युवक की तरह उसका असर अपने मन और आत्मा पर नहीं पड़ने देते।

हमारी शारीरिक स्थिति कैसी भी हो लेकिन हम आत्मविश्वास से भर कर भरपूर जिंदगी जी सकते हैं। दूसरे लोगों के बीच प्रेम और प्रसन्नता बांट सकते हैं। यदि बीमारी के कारणवश हम घर से बाहर नहीं जा सकते तो परिवार के सदस्यों को प्रेम दे सकते हैं। क्योंकि बीमार तो सिर्फ हमारा शरीर ही रहता है। आत्मा तो सदैव पूर्ण रूप से स्वस्थ रहती है। आत्मविश्वास से भरा हुआ मनुष्य आशावादी और सकारात्मक रवैया अपनाकर हर विपरीत चुनौती पर विजय पा सकता है और दूसरों की जीवन बगिया को खुशियों से महका सकता है।

धर्मराज युधिष्ठिर में अनेक गुणों के होते हुए भी एक दुर्गुण था— धूत- क्रीडा का। जब दुर्योधन के साथ खेलते हुए धर्मराज हार रहे थे, तब उनके शरीर से एक ज्योति प्रकट हुई।
युधिष्ठिर ने पूछा— आप कौन हैं?
ज्योति ने कहा कि— मैं विवेक सक्ती हूं। आपने मेरा त्याग कर दिया। इसलिए मैं आप को त्याग कर जा रही हूं।
थोड़ी ही देर पश्चात् उनके भीतर से दूसरी ज्योति प्रकट हुई।
युधिष्ठिर ने पूछा—अब आप कौन हैं?
ज्योति ने कहा— मैं धर्म हूं। जहां विवेक नहीं, वहां मेरा रहना संभव नहीं।
धर्म के जाते ही एक और ज्योति प्रकट हुई।
युधिष्ठिर ने फिर उससे पूछा कि— आप कौन हैं?
तो ज्योति ने कहा कि— मैं समृद्धि हूं।
जहां धर्म और विवेक नहीं, वहां मेरा भी वास नहीं।
समृद्धि के जाने के पश्चात् प्रसिद्धि प्रकट हुई। प्रसिद्धि भी कहां रहती, जहां समृद्धि नहीं।

विवेक, धर्म, समृद्धि और प्रसिद्धि सभी ने युधिष्ठिर का साथ छोड़ दिया। तभी युधिष्ठिर का राजपाट धन वैभव और प्रतिष्ठा सब खो गए। काफी वर्षों तक उन्हें जंगलों में भटकना पड़ा।
एक बार वन में असहाय घूमते हुए उनके शरीर से एक और ज्योति निकली।
युधिष्ठिर के पूछने पर उसने बताया कि— मैं आत्मविश्वास हूं‌।
युधिष्ठिर ने कहा— मैं तुम्हें नहीं जाने दूंगा। आत्मविश्वास ने कहा— तुम मेरा पोषण करोगे तो मैं भी तुम्हारा साथ दूंगा। यह कहकर युधिष्ठिर के शरीर में प्रवेश कर गया।
इतने में एक और ज्योति प्रकट हुई और बोली मैं तुम्हारी विवेक शक्ति हूं। जहां आत्मविश्वास है, मैं वहां वास करती हूं। यह कहकर वह भी युधिष्ठिर के शरीर में प्रवेश कर गई।
धर्म ने भी प्रकट होकर कहा— जहां विवेक है, मैं भी वहां रहता हूं।
इस प्रकार विवेक शक्ति, धर्म, समृद्धि तथा प्रतिष्ठा सब पुन: लौट आए।
इसलिए जब भी जीवन में संकट आए तो धैर्य न खोएं। आत्मविश्वास से हर कठिनाई पर विजय प्राप्त की जा सकती है। जीवन की मुश्किलों को स्वीकार करें। उसे दूर करने के लिए विवेकपूर्ण ढंग से कर्म करें और उसे ईश्वर को समर्पित कर दें।

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