265. वास्तविक सुख

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

संसार में प्रत्येक मनुष्य सुख की कामना रखता हुआ ही अपना जीवनयापन करता है। वह किसी भी दुख या अभाव की स्थिति को पसंद नहीं करता। लेकिन क्या किसी कामना की अभिलाषा रखने मात्र से ही उसे सुख की प्राप्ति हो सकती है? वास्तव में जीवन एक कठिन साधना है। जीवन में संबंधों के प्रति भी संवेदनशील रहना आवश्यक है और आत्मिक उन्नयन की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती।
मनुष्य को अगर सुख चाहिए तो उसे सुख प्राप्ति के लिए उसके मूल स्रोत से स्वयं को जोड़ना होगा।

उदाहरण के लिए जब आपको प्यास लगती है तो आप जल की तलाश करते हैं। आप नलकूप, पोखर, तालाब, झरना, नदी आदि के निकट पहुंचकर अपनी प्यास बुझा लेते हैं। अगर कोई व्यक्ति रेगिस्तान में जाकर जल की तलाश करे तो क्या उसकी अभिलाषा पूर्ण हो सकती है? कदापि नहीं। वहां पर जल की तलाश में जाने पर प्राण भी संकट में पड़ सकते हैं। ठीक इसी प्रकार आज मनुष्य भौतिक सुखों को ही वास्तविक सुख मानने की बहुत बड़ी भूल कर रहा है। समस्त ऋद्धि-सिद्धि के स्वामी होते हुए भी, वह भिखारियों की तरह दर-दर की ठोकरें खाता हुआ गलत रास्ते पर चल रहा है। वह यह भूल गया है कि जब तक अपने आत्म तत्व से जुड़ा हुआ है, तभी तक वह जीवन में उपलब्धियां अर्जित करने योग्य है।

वह धन, कामना, वासना में सुख को खोज रहा है, जो नश्वर है। वास्तविक सुख का भंडार तो उसके अंदर ही विद्यमान है। वह अपने अंतर के प्रति निष्ठावान होगा तो उसके कर्म भी श्रेष्ठ होंगे।
वह अपने परिवार और समाज को श्रेष्ठ फल दे सकेगा। मनुष्य जितना श्रम जीवनयापन के लिए करता है उससे अधिक यत्न उसे अंतर शुद्धि के लिए करना चाहिए। अंतर निर्मल होगा तभी उसमें गुण समा सकेंगे। जब संयम, संतोष, सहज, दया, करुणा, प्रेम जैसे गुण मन में स्थान बनाते हैं तो काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार जैसे अवगुण स्वयं मैदान छोड़ जाते हैं। क्योंकि मनुष्य के अंतर में परमात्मा ने अपना अंश छुपा रखा है, जो वास्तविक सुख और शांति का स्रोत है।

जैसे— मृग की नाभि में ही अमूल्य कस्तूरी होती है, लेकिन उसके बारे में उसे पता नहीं होता। अगर उसे पता होता तो जंगल में उस सुगंध की प्राप्ति के लिए दर-दर भटकने की कोई आवश्यकता नहीं होती। मनुष्य ने भी आज भौतिक सुखों के पीछे छिपे आध्यात्मिक सुखों को नजरअंदाज कर दिया है। वह भ्रम वश वास्तविक सुख को ही भूल गया है। ईश्वर की प्रार्थना करना, ध्यान लगाना, उसी में लीन रहना वास्तव में यही वास्तविक सुख की श्रेणी में आते हैं। गरुड़ पुराण में कहा भी गया है— ध्यान ही परम धर्म है, ध्यान ही परम तप है, ध्यान ही परम शुद्धि है। अतः मनुष्य को ध्यानपरायण होना चाहिए।

परमात्मा के ध्यान से बढ़कर अन्य कोई ध्यान नहीं है। उपवास से बढ़कर अन्य कोई तपस्या नहीं है, इसलिए भगवान के चिंतन को ही अपना प्रधान कर्म मानना चाहिए। इस लोक और परलोक में प्राणी के लिए जो कुछ दुर्लभ है, जो अपने मन से भी सोचा नहीं जा सकता, वह सब बिना मांगे ही ध्यान मात्र करने से ईश्वर हमें प्रदान कर देते हैं। पापकर्म करने वालों की शुद्धि के लिए ध्यान के समान अन्य कोई साधन नहीं है। यह ध्यान पुनर्जन्म देने वाले कारणों को भी वश में करने वाली योगाग्नि है। ध्यानयोग से संपन्न योगी योगाग्नि से तत्काल अपने समस्त कर्मों को नष्ट करके इसी जन्म में मुक्ति प्राप्त कर लेता है। वायु के सहयोग से ऊंची उठने वाली ज्वाला से युक्त अग्नि जैसे अपने आश्रयकक्ष को जलाकर भस्म कर देती है, वैसे ही ध्यान योगी के चित्त में स्थित परमात्मा योगी के समस्त पापों को भस्म कर देते हैं। जैसे अग्नि के संयोग से सोना मलरहित हो जाता है,, वैसे ही मनुष्य के मन का मैल परमात्मा के सानिध्य से विनष्ट हो जाता है।

इस संसार में भगवान के ध्यान के समान कोई पवित्र कार्य नहीं है। ध्यान में सदा निरस्त रहने वाला मनुष्य चाण्डाल का भी अन्न खाते हुए इस संसार के पाप में संलिप्त नहीं होता क्योंकि ऐसा मनुष्य अपने स्वत्व को भगवान में लीन कर देने से भगवन्मय हो जाता है और जब मनुष्य ऐसा करने में सक्षम हो जाता है तभी उसे वास्तविक सुख की प्राप्ति होती है। मनुष्य के जितने कर्तव्य अपने परिवार, समाज के प्रति हैं उतने ही स्वयं के प्रति भी हैं। इनमें समन्वय से आगे बढ़ना ही जीवन को वास्तविक रूप से जीना है। जब मनुष्य ध्यान के माध्यम से स्व को जान लेता है तो उस पर भगवान की कृपा बरसती है, जिससे उसके जीवन के सारे कठिन कार्य सरल हो जाते हैं। लेकिन मनुष्य पशुवत् जीवन जीने को ही वास्तविक सुख समझ बैठा है। शारीरिक सुखों की प्राप्ति के लिए भौतिक साधनों पर निर्भर होना पशुवत जीवन के समान ही है। असली जीवन तो ध्यान में उतरकर स्व तत्व को जानना है।

शारीरिक सुखों की प्राप्ति के पीछे भूल बैठा है कि वह परमात्मा का अंश है। परमात्मा हर मामले में अमीर है और उसके पुत्र ने स्वयं को गरीब बना लिया है। इसका कारण स्पष्ट है कि मनुष्य आज परमात्मा से बिछड़ गया है। अगर वह अपने अंदर झांकने की कोशिश करे परमात्मा से नाता जोड़ ले तो उसे अनंत सुखों की प्राप्ति होने लगेगी। मनुष्य का चित्त सदा सांसारिक विषय वासनाओं के भोग में जिस प्रकार अनुरक्त रहता है, यदि उसी प्रकार भगवान में भी अनुरक्त हो तो इस संसार के बंधन से क्यों नहीं विमुक्त हो सकता। सोचते हुए, बोलते हुए, रुकते हुए अथवा इच्छा अनुसार अन्य कार्य करते हुए भी निरंतर हमारा ध्यान ईश्वर में लगा रहे तो वह ईश्वर हमें पाप के समुद्र से पार लगा देगा और यही हमारे जीवन का वास्तविक सुख होगा।

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