269.अंत:करण की यात्रा

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

प्रत्येक जीव के अंतःकरण में एक ज्योति है। अक्सर उसकी लौ शांत होती है। उस आत्मा रूपी ज्योति की लौ को प्रज्वलित करने के लिए जब हम तल्लीनता से उस परमात्मा का ध्यान अपने अंतःकरण में करते हैं, तभी वह ज्योति आलोकित हो पाती है। दरअसल जीव सदियों से आवागमन के चक्कर में फंसा रहा है। उसकी आत्मा पर पूर्व जन्म के प्रारब्ध एवं कुसंस्कार परत- दर- परत आच्छादित रहते हैं। इसी कारण यह ज्योति अक्सर शांत ही रहती है।

यह जीवन परमात्मा का दिया हुआ अमूल्य उपहार है। इसलिए इस जीवन को समझना आवश्यक है। इसको समझने के लिए हमें ध्यान की गहराई में उतरना पड़ेगा, तभी हम, हमारे अंतःकरण में स्थित आत्मा में विराजमान परमात्मा से एकीकार हो सकते हैं। जब आत्मा मन सहित सभी विषयों, व्यापारों को छोड़ ब्रह्म चिंतन करती है तो उसे ध्यान की स्थिति कहते हैं। जैसे बोतल में तेल या पानी डालते हैं, तो वह बूंद-बूंद करके या निरंतर धारा बनकर गिरता है, वैसी स्थिति का नाम ध्यान है। इसके लिए आपको अपने हृदय में विद्यमान तमोगुण, रजोगुण और सत्वगुण पर विजय प्राप्त करनी होगी।

आपके अंत:करण में जो चैतन्य आत्मस्वरूप है, जो प्रकृति के बंधन में अज्ञान से बाधित हो रहा है, इस अज्ञान की श्रृंखला को ज्ञान के धन से तोड़ डालिए और सर्वथा मुक्त हो अपने स्वरूप में स्थित हो जाइये। मोह- माया का आवरण हट जाएगा और ब्रह्म का स्वरूप आपके सामने प्रकट हो जाएगा, जहां पर सर्वत्र आनंद का ही साम्राज्य है और आप चारों ओर से इस आनंद का रसास्वादन करते हुए आनंदमय हो जाएंगे। आपकी आत्मा रूपी ज्योति की लौ ने सर्वत्र श्वेत वर्ण के प्रकाश से सारे शरीर को प्रकाशित कर दिया है। आपके शरीर का एक-एक अणु सौम्य प्रकाश से आलोकित हो उठा है। इस ज्योति का मन को एकाग्र कर निरीक्षण करते रहिए और अपने अंतःकरण की शक्ति को पहचानिए।
ऐसे बहुत से ऋषि-मुनि संत हुए हैं, जिन्होंने अपने अंतःकरण की यात्रा की है।
उनमें से एक हैं—
संत रविदास, जिन्होंने अपनी कठौती में से गंगा को प्रकट कर दिया था।
एक बार की बात है कि कोई महात्मा गंगा स्नान करने जा रहे थे। रास्ते में उनकी चरण- पादुका टूट गई। वह रविदास के पास आए और उन्हें उसे ठीक करने को कहा— क्योंकि संत रविदास एक मौची थे और रैदास के नाम से जाने जाते थे। पादुका की मरम्मत करते समय रैदास जी पूछ बैठे कि आप सुबह-सुबह कहां जा रहे हैं?
रैदास के इस प्रश्न पर महात्मा बोले—वह गंगा स्नान के लिए जा रहे हैं। इसके बाद महात्मा जी ने अहंकार में आकर बोला— रैदास, तुम गंगा स्नान की महत्ता क्या जानो?
इस पर रैदास बड़े धैर्य के साथ बोले— सच कह रहे हैं आप, लेकिन गंगा में एक पैसा मेरा भी चढ़ा दीजिएगा और वह एक पैसा लेकर महात्मा जी गंगा स्नान करने के लिए चले गए। वहां पहुंचकर स्नान करने के बाद महात्मा जी ने पहले अपना चढ़ावा गंगा मैया को भेंट किया, पूजा- अर्चना पूरी करने के बाद उसे रैदास जी का एक पैसा याद आया। जब वह उसे मां गंगा को समर्पित करने लगा तो मां गंगा खुद प्रकट हो गई। मां ने हाथ में एक पैसा लेकर बेशकिमती एक कंगन दिया और कहा कि इसे जाकर रैदास को दे देना। इस घटना से महात्मा जी बड़े आश्चर्य में पड़ गए और यह सोचते हुए वापिस आ गए कि रैदास के खोटे सिक्के में ऐसा क्या था कि गंगा मैया उसको लेने के लिए स्वयं प्रकट हो गई और उपहार स्वरूप कीमती कंगन भी प्रदान किया? उस महात्मा के मन में लालच आ गया कि मैं यह कंगन रैदास को न देकर राजा को भेंट कर दूं, तो मुझे बहुत सारा धन प्राप्त होगा और वैसे भी रैदास को यह कैसे पता लगेगा कि मां ने उसे उपहार स्वरूप कंगन भेंट किया था। क्योंकि रैदास तो अपने पूरे जीवन गंगा स्नान करने के लिए आ नहीं पाएंगे और मां उसे वहां जाकर कैसे बताएगी। यह सब कुछ सोच- विचार कर महात्मा ने कंगन राजा को भेंट दे दिया।
कंगन देखकर रानी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा, क्योंकि वह कंगन बहुत ही खूबसूरत था। उस कंगन की सुंदरता से प्रभावित होकर रानी ने इसी तरह के दूसरे कंगन की जिद की।
राजा ने जौहरी को बुलाया और वैसा ही कंगन बनाने का आदेश दिया, लेकिन कोई भी जौहरी ऐसा कंगन बनाने में सक्षम नहीं था।
तब उस महात्मा जी को बुलाया गया। अब महात्मा जी के पास सच बोलने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। उसने राजा को सब कुछ सच-सच बता दिया।

राजा ने महात्मा जी से कहा कि— यदि तुम्हारी बात झूठी हुई तो तुम्हें मृत्युदंड दिया जाएगा। राजा अपनी रानी और महात्मा के साथ संत रैदास के पास गए और उन्होंने सारी बात रैदास को बताई और ऐसा ही एक कंगन मां गंगा से मांगने के लिए कहा। संत रैदास ने पास रखी कठौती में जल भरकर गंगा का स्मरण किया, तो उस कठौती से गंगा प्रकट हो गई और गंगा ने दूसरा कंगन प्रदान किया।

ये संत रैदास की अंत:करण की यात्रा थी, जिन्होंने अपनी आत्मा रूपी लौ को इतना प्रज्वलित कर लिया था कि उसमें विराजमान उस निराकार परब्रह्म से संपर्क स्थापित हो गया था। उसका हृदय इतना निर्मल और पवित्र था कि गंगा मैया को भी एक छोटी- सी कठौती में प्रकट होना पड़ा।

इसलिए हमें अपने अंतःकरण की यात्रा पर निकलना चाहिए, क्योंकि आज के परिवेश में व्यक्ति संस्कार को तो जान गया है, परंतु वह प्रारब्धजन्य संस्कार से मुक्त होने का प्रयास नहीं करता। हालांकि प्रत्येक मनुष्य के जीवन में ऐसा मोड़ आता है कि हमारी आत्मा हमें मार्ग दर्शक बनकर रास्ता दिखाने की कोशिश करती है, लेकिन हम समझ ही नहीं पाते। क्योंकि हम अंतःकरण के बारे में अनजान होते हैं। आपकी कल की साधना, अतीत में संचित किए गए अच्छे कर्मो रूपी पूंजी और परमात्मा का सान्निध्य आज आपकी परेशानी या बुरे वक्त में आपका साथ अवश्य देते हैं। जो समय रहते इन्हें समझ लेता है, वह संसार से पार पा लेता है और जो इस माया रुपी संसार के मकड़जाल में उलझ जाता है, वह इस ताने-बाने को समझने में ही सारा जीवन व्यर्थ गंवा देता है।

जन्म- जन्मांतरों से मनुष्य ने संस्कारों की चादर ओढ़ रखी है। कोई तन के भोगों का संस्कार है, जो रोग बन कर आता है। कोई मन का संस्कार है जो हमारे चिंतन में बाधक बनता है। संस्कार भी अनेकानेक हैं, परंतु अपने संचित प्रारब्ध और परमात्मा की कृपा से यदि मन में ही भक्ति योग का विराट प्रादुर्भाव हो जाए तो फिर कहना ही क्या? इसलिए इस जीवन को समझना परम आवश्यक है, क्योंकि यहीं इस संसार में किसी से कुछ लेना है और किसी को पुनः कुछ देना है। कहीं पर लाभ है तो कहीं पर हानि है। सबमें संस्कार- प्रारब्ध कार्य करते हैं। लेकिन इन सबको पार ले जाते हैं आपके कर्म, जिसके सहारे बड़ी से बड़ी उपलब्धि हासिल करके जीवन को सफल बनाया जाना संभव है।

जिसने अपनी आत्मा रूपी लौ को प्रज्वलित कर लिया वह उसी प्रकार स्थितप्रज्ञ हो जाता है, जिस प्रकार बादल की बरसाई बूंदों के आघात से पर्वत चलायमान नहीं होता। जैसे कोई व्यक्ति तेल से भरा कटोरा हाथ में लेकर सीढ़ियों पर चढ़े और उसके दोनों ओर खड़े शस्त्रधारी योंद्धा भयभीत करें कि यदि तुमने एक बूंद भी तेल गिरा दिया तो तुम्हारी खैर नहीं। इस समय वह सभी ओर से चित्तवृतियों को हटाकर सावधान होकर आगे बढ़ता है, वैसे ही एकाग्रचित्त मनुष्य इंद्रियों की स्थिरता और मन की अविचल स्थिति के कारण अपनी अंत:करण से विचलित नहीं होता। जो भली-भांति आत्मा का साक्षात्कार कर लेता है। वह गहन अंधकार में प्रज्वलित अग्नि के समान अंत:करण में स्थित अविनाशी ब्रह्म के सान्निध्य को प्राप्त कर लेता है और सद्गति को प्राप्त करता है, जिससे अंतःकरण की यात्रा पूरी होती है।

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