52. ईश्वर की व्यवस्था

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

हम सभी परमपिता परमात्मा के पुत्र हैं। वे सभी पुत्रों को समान रूप से चाहते हैं, पर वे जिन्हें योग्य विश्वसनीय और ईमानदार समझते हैं, उन्हें अपनी राजशक्ति का कुछ अंश इसलिए सौंप देते हैं कि वे उसके ईश्वरीय उद्देश्यों की पूर्ति में हाथ बटाएं। दूसरे शब्दों में कहें तो प्रत्येक समृद्ध मनुष्य को प्रभु ने यह कर्तव्य सौंपा है कि अपने से जो लोग कमजोर हैं, उनकी मदद करने में इन शक्तियों को व्यय किया जाए। अगर दुनिया में सभी मनुष्यों को सभी कुछ मिल जाता तो ईश्वर इस चराचर जगत् की व्यवस्था को कैसे सुचारू रूप से चला सकते थे। ईश्वर की व्यवस्था में झांके तो पाएंगे, उसने एक बहुत अच्छा सॉफ्टवेयर बना रखा है, अगर कोई अपने कार्य का पूरी निष्ठा और ईमानदारी से निर्वाह नहीं करता, तो उसे इसका फल अवश्य मिलता है।

भगवान गलत कार्य करने वालों का साथ नहीं देता, उसकी व्यवस्था में शामिल है— जैसा करोगे, वैसा फल मिलेगा। भगवान गलत काम करने के बाद कभी नहीं बचाएगा। हां उसके बचाने का तरीका अवश्य है कि— यदि आप उससे जुड़े हुए हैं, तो वह आपको गलत करने से रोक जरूर सकता है। पांडव जब राजा बन गए, तब जुआ खेले। क्योंकि भगवान से दूर हो गए थे। और इसका परिणाम भी उन्होंने 12 वर्ष का वनवास और 1 वर्ष का अज्ञातवास के रूप में भोगना पड़ा। पिछले दिनों एक बहुत ही ख्याति प्राप्त और धनवान व्यक्ति से जुड़े मुकदमे में सर्वोच्च न्यायालय ने टिप्पणी की—’यदि अब कानून तोड़ा तो फिर भगवान ही आपको बचा सकता है।’ जिस भी माननीय न्यायाधीश ने यह टिप्पणी की, उन्होंने भगवान को इस रूप में भी याद किया। हम इसे ऐसे कह सकते हैं कि—कहीं न कहीं न्याय भी यह स्वीकार करता है कि—एक परम शक्ति होती है, जिसे भगवान कहा गया है। इससे हम यह मानने को बाध्य हो जाते हैं कि, कोई न कोई शक्ति है, जो इस सृष्टि की व्यवस्था का भार उठाए हुए है। भोजन,वस्त्र, आवास तथा जीवनयापन की उचित आवश्यकता पूरी करने वाली वस्तुएं, प्रभु प्रदत प्रत्येक व्यक्ति के लिए वेतन के समान हैं, आलसी, अकर्मण्य, उल्टे-सीधे काम करने वाले लोगों का वेतन कट जाता है और इसी कारण उन्हें अभावग्रस्त रहने को विवश होना पड़ता है। जो परिश्रमी, पुरुषार्थी और सीधे मार्ग पर चलने वाले हैं, वे अपना उचित वेतन यथा- समय पाते रहते हैं।

इसके अतिरिक्त विभिन्न प्रकार की शक्तियां लोगों को जन्मजात मिली हुई हैं। ये शक्तियां केवल इस उद्देश्य के लिए होती हैं कि— इन से संपन्न कोई व्यक्ति अपने से कमजोर लोगों को ऊपर उठाने में लगाएं। धन, बुद्धि, स्वास्थ्य, शिल्प, चतुरता, मनोबल, नेतृत्व आदि की शक्तियां जिन्हें अधिक मात्रा में दी गई हैं, वे अधिकार नगराधिकारी को देकर राजा कोई पक्षपात नहीं करता, बल्कि अधिकार योग्य व्यक्ति से अधिक काम लेने की नीति रखता है। जीवन में जो कुछ भी मिले, थोड़ा मिले या अधिक मिले, दूसरों को बांटने का विचार अपने अंतर्मन में जरूर रखना। जैसे सूर्य देव सबको समान रूप से प्रकाश बांटता हैै और अमीर- गरीब, छोटा-बड़ा, योग्य-अयोग्य आदि की दौड़ में शामिल न होकर पूरी सृष्टि को समान रूप से प्रकाशित करता है, ऐसे ही हमें भी जो मिला है, उसे हम भी अवश्य बांटें। “मुझे मिला है तो मैं ही खाऊंगा” यह पाप है।

शास्त्रों में लिखा है कि जब कुछ मिले तो उसे सब में बांटिए। अपने साथ सब को आगे लेकर चलिए, आप उठे हैं, तो सबको उठाइए। उठाने के दो तरीके हैं। एक तो क्रेन यानी मशीन उठाती है और दूसरा आप अपना हाथ बढ़ाकर, सहयोग देकर किसी को ऊपर उठा सकते हैं। क्रेन का आविष्कार “डेरिक” नामक व्यक्ति ने किया था,जो पहले जल्लाद था। जल्लाद जब किसी को फंदा लगाकर ऊपर उठाता है, तो जीवन समाप्त हो जाता है। लेकिन भला इंसान फंदा हटाकर जब किसी को ऊपर उठाता है, तो जीवन शुरू होता है, तो हमें सूर्य देव की भांति अपने भीतर यह भाव जगाना है कि- ईश्वर ने मनुष्य बनाकर कुछ विशेष कार्य के लिए ही इस धरती पर भेजा है, तो सबको सही रास्ते पर चलाने के लिए भगवान द्वारा बनाई हुई व्यवस्था में सहयोग करें।

सामर्थ्यवान व्यक्तियों को अन्य के कष्ट निवारण में शामिल होना ही चाहिए। जैसे कि यदि कोई सुशिक्षित है तो उसका फर्ज है कि, अशिक्षितों में शिक्षा का प्रसार करें। कोई शक्तिशाली है तो उसका कर्तव्य है कि— निर्बलों को सताने वालों को रोकें। धनवान के पास धन इसलिए अमानत के रूप में रखा गया है कि वह उसके उपयोग से बुद्धि, व्यवसाय, संगठन, सद्ज्ञान आदि का इस प्रकार आयोजन करें कि उससे जरूरतमंद लोग अपनी चतुर्मुखी उन्नति कर सकें। प्राय: लोग यह कहते हैं कि जब इतना धनवान हो जाऊंगा, तब परमार्थ करूंगा, जबकि सोचना यह चाहिए कि आज मैं जितना संपन्न हूं, उतना परमार्थ तो कर सकता हूं। यह ईश्वर की व्यवस्था का ही परिणाम है, जिससे नवज्ञान का सृजन और विकास, उसका उपयोग करने का निर्देशन और उसे अगली पीढ़ी तक समर्पित करने का कार्य निरंतर बिना किसी भेदभाव के चलता रहता है। यह व्यवस्था मन-मानस में बसती गई, प्रेरणा देती गई और मानवीय सोच तथा क्षितिज को विस्तार देती गई। हम ईश्वर की व्यवस्था में भरोसा रखेंगे, तो उससे जुड़े रहेंगे, तो वह कोई भी बुरा विचार हमारे दिमाग में पनपने नहीं देंगे और हम उसकी बनाई हुई व्यवस्था में सहयोग देते रहेंगे। लेकिन जैसे ही हम उससे कट जाएंगे, कोई गलत कार्य कर बैठेंगे, क्योंकि ईश्वर की व्यवस्था ही ऐसी है कि गलत बोओगे, गलत उगेगा, सही बोओगे, सही काटोगे।

Leave a Reply