56. उम्मीद—”वो” है ना

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

जीवन में प्रत्येक कार्य के लिए बढ़िया योजना, अनुकूल परिस्थिति, धैर्य, सकारात्मक दृष्टिकोण और अपार मेहनत की जरूरत पड़ती है। यदि आप किसी काम को हर हाल में शुरू कर सफल होना चाहते हैं, तो उससे जुड़ी सारी जानकारियां जुटाएं, सारे उपलब्ध साधनों को जुटाएं और उस समय की परिस्थिति के अनुसार कार्य शुरू करें। हमें विपरीत परिस्थितियों में कभी उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए। हमें इस सिद्धांत पर चलना चाहिए कि— प्रत्येक विपरीत परिस्थिति में बड़े लाभ का बीज दबा होता है। नेपोलियन बताते हैं कि— अपने लक्ष्य को हमेशा बड़ा रखो, तभी आप कठिन परिश्रम करेंगे। वे बताते हैं कि मैं आत्म अनुशासन का प्रयोग कई वर्षों तक करता रहा, ताकि मैं अपने आप को शोहरत और धन-दौलत से विनम्रता के साथ जोड़ सकूं।

आप कभी-कभार सोचते होंगे कि— आप इतना दबाव, इतनी परेशानियां, इतनी असफलताएं बर्दाश्त नहीं कर सकते। आपको लगता है कि आपने सब कुछ कर लिया लेकिन हालात काबू से बाहर हैं। इसके लिए ये बिल्कुल भी आवश्यक नहीं कि आप तुरंत कुछ कार्य करें। नहीं समझ आ रहा है, तो रुक जाने में भी कोई बुराई नहीं। नई आशा और उम्मीदों की धूप, देर-सवेर खुद भी पहुंच जाएगी। ताजी हवा और रोशनी भीतर आ सके, इसके लिए आवश्यक है कि आप अपने दिमाग की खिड़कियों को खुला रखें। उन पर भय, आशंका और अशुभता की कड़वी धूल को जमने न दें। अगर आप मजबूत हैं, कड़ी मेहनत करने का माद्दा रखते हैं, तो कोई कठिनाई आपको लक्ष्य से हिला नहीं सकती।

अनुशासन और नैतिकता का आपके लक्ष्य प्राप्ति में महत्वपूर्ण योगदान होता है। कल पर टालने या फिर थोड़ी देर में कर लेने का बहाना यहां नहीं चलता। अनुशासन में रहना आदत बन जाती है। किसी भी कठिन लगने वाले काम को यह कहकर नहीं छोड़ें, कि यह काम आपके दायरे में नहीं है। आपको उस कार्य में डर लग सकता है, लेकिन यह डर सिर्फ एक कल्पना है। जब आप उस कार्य को करना शुरू करते हैं और आगे बढ़ते जाते हैं, तब आप उस डर से बाहर निकल जाते हैं। ये जरूरी नहीं आप हर कार्य में सफल हों, फिर भी मन को छोटा करने की जरूरत नहीं।

संघर्ष एवं असफलता केवल निराश ही नहीं करते, बल्कि कुछ सिखाते भी हैं। ना उम्मीद में ही उम्मीद छिपी होती है। बीती बातों से भाग कर नहीं, उनसे सीख कर ही उबरा जा सकता है। जीवन में तो हर पल नया भी हो रहा है और पुराना भी। हम जिस पल नया महसूस करने लगते हैं, उसी पल से हमारी जिंदगी नई होने लगती है। नई राहों की तरफ कदम बढ़ाते समय, जो नहीं है, उस पर बेचैन होने की बजाय जो सामने है, उस पर केंद्रित होना चाहिए। चुनौतियां रास्ते की रुकावट नहीं हैं, रास्ता ही है। अपनी जिंदगी में जब भी कुछ करना चाहें, कर सकते हैं। लेकिन इसके लिए आपके भीतर दृढ़ इच्छाशक्ति होनी चाहिए और जज्बा होना चाहिए।

अगर आपने लक्ष्य तय कर लिया तो फाइटर की तरह उसे करते जाना है, बीच में छोड़ना नहीं है। उम्मीद की एक छोटी- सी किरण ही आप में जोश भर देती है। सफलता सिर पर जल्दी चढ़ती है और असफलता दिल पर। जीत के नशे में झूमते हुए को हार नहीं दिखती और हारे हुए को जीत की कोई उम्मीद नजर नहीं आती। लेकिन असली जीत उसकी होती है जो सफलता को सिर नहीं चढ़ने देते और हार को दिल से नहीं लगाते। बैडमिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधु कहती है—हार हो या जीत मैं अपना 100% देने पर ध्यान देती हूं। जो करती हूं, पूरे मन से करती हूं। आपकी सफलता का दरवाजा भी खुलेगा जरूर, कभी-कभी दरवाजा ज्यादा मजबूती से बंद होता है, तो उसे खोलने के प्रयत्न भी उतनी मजबूती से ही करने होते हैं।

जीवन की डगर पर आगे बढ़ते हुए हमारी नजर कई लोगों पर पड़ती है। उनमें से कुछ बातें या चीजें हमें विचलित भी करती हैं। हमारे मन में बुरे विचार आने लगते हैं और कभी दूसरों की संपत्ति पर, कभी उनके व्यक्तित्व पर नजर डालने लगते हैं, जिससे हमें उनसे ईर्ष्या होने लगती है और हमारे शरीर में उबाल-सा आने लगता है। जिसे समय रहते थोड़ा ठंडा कर दें, वरना वह हमारी उर्जा को गलत दिशा में ले जाएगा। आप उसी का चिंतन करते रहेंगे और अपने लक्ष्य से भटक जाएंगे। फिर आपको अपने कार्य में सफलता नहीं मिलेगी, और आप उम्मीद को छोड़कर ना उम्मीद का पिटारा अपने सिर पर रख लेंगे।

यदि समय रहते अपनी बुरी वृतियों पर लगाम नहीं लगाई, तो आप अपने भीतर या बाहर कुछ न कुछ गलत जरूर कर जाएंगे। मनोविज्ञानी कहते हैं कि हम उसी जाल में फंस कर रह जाते हैं, कि या तो सब कुछ चाहिए या कुछ भी नहीं और यह सोच हमारा संतुलन भी बिगाड़ देती है। कई बार कम रोशनी में ही चीजें गहराई से समझ आती हैं। धुंधलापन नई कहानियों को जन्म देता है। दिमाग साफ हो और हम धुंध का मजा लेने के लिए तैयार हों तो कहानियां अच्छी बनती हैं।

अध्यात्म में विश्वास करने वाले मानते हैं कि—हम अपनी आंतरिक शक्ति और इंद्रियों पर कंट्रोल करके ही लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। जीवन में जब कभी कोई संकट आए, तो उस परमात्मा को याद अवश्य करना। आपको उस परम सत्ता की ध्वनि सुनाई देगी। जिसमें वह कहता है—परेशान मत होना “मैं हूं ना”। ये कोई साधारण ध्वनि नहीं है, बल्कि यह उस परमेश्वर की ही है, जो कहीं हमारे अंतर्मन में बैठकर यह सब कुछ देख रहा है। ये उस उम्मीद की ध्वनि है, जो हमें कभी नाउम्मीद नहीं होने देती और हम अपने इस जीवन पथ की डगर पर उस छोटी- सी उम्मीद की किरण के साथ आगे बढ़ते चले जाते हैं।

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