73. स्वयं के बनें, मित्र

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

अगर देखा जाए, तो आज के समय प्रत्येक व्यक्ति दुखी है, परेशान है, उदास है। अगर उसके दुख का, उदासी का, परेशानी का कारण पूछा जाए तो वह यही कहता है कि— पता नहीं कोई मुझे समझता ही नहीं। लेकिन अगर वह अपने अन्दर झांक कर देखे, तो क्या वह स्वयं को समझता है? कहते हैं कि अगर स्वयं से बेहतर रिश्ता हो तो हमारा प्रत्येक से रिश्ता बेहतर हो सकता है अर्थात् अगर हम स्वयं को जान जाते हैं, पहचान जाते हैं, तो दूसरे भी हमें अच्छी तरह समझने लगते हैं और यह तभी संभव है, जब हमारा स्वयं के साथ मित्रता का रिश्ता हो यानी हम स्वयं अपने ही मित्र बनें।

अक्सर हम स्वयं को कोसते रहते हैं कि— मैं उतना परफेक्ट नहीं हूं, जितना अमुक है। काश मैं भी उसी की तरह परफेक्ट होता। ऐसे कुछ विचार अक्सर हर किसी के मन में सामान्य रूप से आते रहते हैं। जब देखो, तब हम अपनी तुलना दूसरों से करते रहते हैं। जो हमारे लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं है। जब दूसरा कोई किसी कार्य में सफलता प्राप्त करता है, तब हम उसकी सराहना करते हैं। उसकी थोड़ी-सी सफलता को भी बहुत बड़ी अचीवमेंट कहते हैं और खुशी-खुशी सभी जानने वालों के साथ शेयर करते हैं। क्या आपने कभी स्वयं की भी सराहना की है? कभी अपने आप को भी धन्यवाद कहा है।

हम तो अपने आप को हर समय नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं और दूसरों से सम्मान प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं। हमें अगर दूसरों से सम्मान प्राप्त करना है, तो सबसे पहले अपना रिश्ता स्वयं के साथ मजबूत करना होगा। हमें स्वयं का मित्र बनना होगा। क्योंकि मित्रता एक ऐसा संबंध है, जिसके साथ हम अपना कोई भी सीक्रेट शेयर कर सकते हैं। जैसे हम ऐसे मित्र बनाते हैं जिनके साथ अपनी पर्सनल बातें शेयर कर सकें। वैसे ही हमें अपने आपको, अपना सच्चा मित्र बनाना चाहिए। जिससे हम अपनी हर प्रकार की बातें कर सकें‌। ऐसे में हमारा प्रथम कर्तव्य यही होना चाहिए कि हम किसी दोस्त की तरह ही खुद से भी अच्छा बर्ताव करें। स्वयं की आलोचना करना, कोसना हमें बंद कर देना चाहिए। अपने अच्छे गुणों, प्रतिभा और क्षमताओं को समय-समय पर सराहें और अपने अंदर छिपे हुए उस अद्वितीय व्यक्तित्व को बाहर निकालने की कोशिश हर समय करते रहना चाहिए।

दूसरों से अपनी तुलना करना बंद कीजिए। क्योंकि इस संसार में प्रत्येक मनुष्य की अपनी एक जीवन यात्रा है। सभी के अपने-अपने कर्म हैं, जिसके अनुसार उन्हें फल की प्राप्ति होती है। इसलिए अपने जीवन में अनुशासन लाइये। यदि आप अनुशासन को निरंतर बनाए रखते हैं, तो आप अवश्य ही समय के साथ परिणाम खुद महसूस करने लगेंगे। जैसे यदि आप लगातार अच्छा खाना खाते हैं, योगा करते हैं, एक्सरसाइज करते हैं, तो सेहत पर प्रभाव दिखेगा। यहां ज्यादातर मनुष्य शिक्षा खत्म होने के बाद किताबों को समेट कर रख देते हैं। जबकि सीखना कभी खत्म नहीं होता। खासतौर पर स्वयं को सिखाने का सिलसिला कभी खत्म नहीं होता। हर चीज आप स्कूल में नहीं सीख पाते। स्वयं को सिखाएं कि आपको किस वस्तु से सबसे अधिक प्यार है और आप उसके लिए क्या कर सकते हैं? आप अनुशासन का पालन कीजिए और फिर देखिए आप भी औरों की तरह सफलता प्राप्त करने लग जाएंगे। उस समय आपको अपनी तुलना दूसरों से करने की जरूरत महसूस नहीं होगी।

अगर आप किसी मुश्किल स्थिति में फंस जाते हैं और बाहर निकलने का कोई रास्ता दिखाई नहीं देता, तो उस समय कल्पना कीजिए कि—आप की जगह, आपका दोस्त, इस मुश्किल स्थिति में फंसा हुआ है और वह संघर्ष कर रहा है और समस्या इतनी भयावह है कि वह असहाय महसूस कर रहा है। ऐसे में उन्हें आप सबसे बेहतर सलाह क्या देंगे? उस समय जो सलाह, आप उस दोस्त को देंगे, वही शब्द आप स्वयं से कह कर देखिऐ। आप खुद में बदलाव महसूस करेंगे। आप महसूस करेंगे कि आपकी समस्या का समाधान निकल गया।स्वयं का सम्मान करें।

जब आप स्वयं का सम्मान करेंगे तो आप अपनी इच्छाओं का भी सम्मान करेंगे। अपनी इच्छा पूर्ति के लिए आप अपने काम से एक दिन का अवकाश लीजिए और उस दिन सिर्फ वही कार्य कीजिए जो आपको अच्छा लगता है। जो आपकी इच्छा है, उसे पूरा कीजिए। जैसे आप जल्दी सोना चाहते हैं या पूरी रात जागकर अपनी कोई मनपसंद पिक्चर देखना चाहते हैं या कोई किताब पढ़ना चाहते है या स्वयं को सजाना, संवारना चाहते हैं या आईने में निहारना चाहते हैं या स्वयं से बातें करना चाहते हैं। कहने से अभिप्राय यही है कि जो आप करना चाहते हैं वह कीजिए। आपका सकुन महसूस होगा। यदि आप नकारात्मक विचारों से संघर्ष कर रहे हैं, तो यह आपकी च्वाइस है कि आप उन पर ध्यान केंद्रित करते हैं या उनको छोड़ देते हैं। यदि आप उनको छोड़ देते हैं, तो कोई परेशानी नहीं होगी और अगर उनको सोच- सोच कर परेशान हो रहें हैं तो ऐसे में मेडिटेशन आपकी मदद अवश्य करेगा। फिर इन विचारों से धीरे-धीरे पीछा छुड़ा पाएंगे, पर यह आपकी प्रतिबद्धता और संकल्प शक्ति पर निर्भर करता है।

यदि आप उदास हैं और कोई कहे कि आपको उदासी छोड़ कर काम पर लग जाना चाहिए तो आप क्या करते हैं? इसके लिए खुद पर दबाव बनाते हैं? यदि हां! तो याद रखें कि उदासी की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती। यह समय के साथ अपने आप कम होती जाती है। हमें यह याद रखना चाहिए की प्रत्येक मनुष्य की सोच अलग होती है। वह उसी के अनुसार सलाह देते हैं। आप बस खुद को स्वीकारें और मन की बागडोर थामें रहें। केवल आप ही हैं, जो स्वयं को बेहतर जान सकते हैं और बन सकते हैं, स्वयं के सच्चे मित्र।

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