96. दुर्लभ मानव तन

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो अपने उद्धार के लिए भगवान का परम पद पा सकता है और मोक्ष प्राप्त कर सकता है। मनुष्य अपने जीवन की गति को परम गति और अपनी आत्मा को परमात्मा में लीन कर सकता है। यह मानव तन बड़ा दुर्लभ है। इसे प्राप्त करने के लिए देवता भी लालायित रहते हैं। उन्हें मानव की तरह कर्म की महान शक्ति प्राप्त नहीं है।

जप, तप, ध्यान, योग और बुद्धि द्वारा मनुष्य परमात्मा की गोद में बैठने का अधिकार प्राप्त कर सकता है। इसमें जरा भी संदेह नहीं है, लेकिन वह ऐसे भ्रम जाल में जीवन भर फंसा रहता है, जहां से निकलने का अवसर ही नहीं मिलता। मनुष्य प्रतिक्षण अपने तन के सुख में ही डूबा रहना चाहता है। उसे अपनी आत्मा के साथ रहने में अच्छा नहीं लगता बल्कि उसे आत्मा से दूर रहने में सुख की अनुभूति होती है।

ऐसे कुचक्र में फंस कर मनुष्य अपने जीवन के स्वर्णिम समय को व्यर्थ गंवा देता है। वह केवल खाने-पीने, हंसने- गाने, घर-परिवार और वैभव के ही उपायों में दिन- रात डूबे रहने में ही आनंदित महसूस करता है। वह झूठे सुख को सच और सच्चे आनंद को झूठ समझने की भूल करता है। अगर ऐसा न होता तो यह मनुष्य शरीर व्यर्थ न होता। इस तन की महिमा ऋषियों और मुनियों ने हर युग में बताई है।

हमें इस दुर्लभ मानव तन की महत्ता को समझना होगा। यह तन ईश्वर द्वारा प्रदत्त एक बहुमूल्य खजाना है। जिसे संभालना और संरक्षित करना मनुष्य के हाथ में है। इसे श्रेष्ठ बनाने के लिए हमें राष्ट्र की रक्षा, समाज सेवा और प्रत्येक जीव के कल्याण के अनेक उपाय करने चाहिए। प्रेम, परोपकार, दान, त्याग, धर्म, पराक्रम, शील, क्षमा, ज्ञान को कर्म की धरा पर, गंगा की धारा बनाकर प्रवाहित करना चाहिए।

इस दुर्लभ मानव तन को प्राप्त करने के बाद हमें समय की महिमा को अच्छी तरह से समझना चाहिए। इसे व्यर्थ के कार्यों में नहीं लगाना चाहिए। बल्कि प्रत्येक क्षण का भरपूर फायदा उठाना चाहिए।
एक बार ग्रीस के दार्शनिक, सुकरात से कोई परिचित मिलने आया। वह सुकरात को, उसके मित्र के बारे में बताने आया था, पर सुकरात ने उसकी बात सुनने से पहले तीन शर्ते रखी—
1 वह बात सच हो, जिसके बारे में उसका परिचित आश्वस्त हो।
2 वह बात अच्छी हो।
3 वह बात उपयोगी भी हो।
पर परिचित उक्त तीनों शर्त पूरी नहीं कर पा रहा था। दरअसल उसने सुकरात के मित्र की आलोचना किसी अन्य व्यक्ति से सुनी थी। इसलिए उसे सच नहीं कहा जा सकता था। इसी प्रकार बाकी की दोनों शर्तों पर भी वह खरा नहीं उतर सका था। क्योंकि वह बात न अच्छी थी और न ही उपयोगी।
तीनों शर्तों पर असफल होने के बाद सुकरात ने उनसे पूछ लिया कि जो बात न सच है,न अच्छी है और न उपयोगी तो आप मुझे क्यों सुनाना चाहते हो?
अब उसके पास कोई जवाब नहीं था।
कहने से तात्पर्य यह है कि इस दुर्लभ तन को पाकर हमें अपने समय को बर्बाद नहीं करना चाहिए बल्कि ऐसे कार्य करने चाहिएं, जिससे समाज में प्रतिष्ठा मिले और साथ ही साथ हमें आवागमन के चक्कर से छुटकारा प्राप्त हो। जिस दिन मनुष्य इस दुर्लभ तन रूपी खजाने को समझ लेगा, उस दिन उसकी यात्रा प्रारंभ हो जाएगी।

28 thoughts on “96. दुर्लभ मानव तन”

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