107. खुशी के सूत्र

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

हम खुशी के लिए हमेशा भटकते रहते हैं। हम अपनी इच्छाओं में खुशी ढूंढते हैं। इस प्रतिस्पर्धी संसार में अत्यधिक सफलता पाने की होड़ में हमने अपनी सारी खुशी को तिलांजलि दे दी है। हम सदैव भागदौड़ की ऐसी दलदल में फंस जाते हैं, जिससे निकल पाना बहुत कष्टकारी हो जाता है। मनुष्य के पास अथाह धन होने के बावजूद भी वह और धन प्राप्त करने की लालसा में लगा रहता है। वह हमेशा यही सोचता है कि उसके पास धन होगा तो वह कुछ भी खरीद सकता है। हालांकि वह, यह भूल जाता है कि उसके पास चाहे कितना भी धन हो लेकिन उससे जीवन के लिए खुशी नहीं खरीदी जा सकती। मनुष्य जीवन पर्यंत जिस खुशी की तलाश में व्याकुल रहता है वह वास्तव में अनमोल है क्योंकि उसे हमेशा यही लगता है कि जब मेरे पास इतना धन हो जाएगा तो मैं खुश हो जाऊंगा। लेकिन जब उस धन की प्राप्ति हो जाती है तो वह और वस्तुओं को प्राप्त करने की लालसा में लग जाता है। इन सबके बीच में खुशी कहीं गायब हो जाती है।

अक्सर देखा गया है कि स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई के बाद नौकरी करने के लिए गांव- कस्बों और छोटे शहरों के युवक बड़े शहरों की तरफ रुख करते हैं। उन्हें यही लगता है कि हमारे शहर में नौकरी करके हमें खुशी प्राप्त नहीं होगी इसलिए बड़े शहर में अपनी पहचान बना कर ही हमें खुशी प्राप्त होगी लेकिन उस भीड़-भाड़ वाले शहर में जाकर अपनी पहचान खो देते हैं और खुद को बहुत अकेला महसूस करते हैं। धीरे-धीरे उनके पास जरूरत की हर वस्तु होती है। अच्छी नौकरी होती है। बड़ी गाड़ी और बांग्ला होता है लेकिन खुशी नहीं होती, बिल्कुल अकेले हो जाते हैं। ऐसे में वे बेचैन हो जाते हैं क्योंकि इन वस्तुओं को प्राप्त करने के लिए उन्होंने अपने जीवन की बहुत सारी छोटी-छोटी खुशियों को कुर्बान कर दिया होता है। उस मुकाम पर पहुंचकर वे अपने आप को अकेला पाते हैं और यही सोचते हैं कि अगर हमारे पास यह वस्तु और आ जाए तो हम खुश हो जाएंगे लेकिन ऐसा हो नहीं पाता।

आप विचार कीजिए जब हम बच्चे होते हैं तो खेलते कूदते हैं। फिर हमारा स्कूल जाना होता है। हमारे दोस्त बनते हैं। पढ़ाई करते हैं। जिम्मेदारियों को समझते हैं। धीरे-धीरे हमारी पढ़ाई आगे बढ़ती जाती है। हमारे उद्देश्य, धारणाएं और हमारे विचार बदलते रहते हैं। इनके साथ- साथ हमारी इच्छाएं भी बढ़ती जाती हैं। हम बचपन में ही यह तय करने लगते हैं कि भविष्य में हमें क्या करना है और उसी दिशा में प्रयास करने लगते हैं। कोई डॉक्टर बनना चाहता है तो कोई इंजीनियर या कुछ और। इस तरह हमारी स्कूल की पढ़ाई खत्म हो जातीे है। कॉलेज चले जाते हैं। नौकरी करते है। हम एक सुखद जीवन प्राप्त करने के लिए अपने वर्तमान जीवन के सुख का बलिदान कर रहे होते हैं। हमारा एक ही लक्ष्य होता है और उसी लक्ष्य को पूरा करने के लिए हम अपना सब कुछ बलिदान करने के लिए तैयार रहते हैं।धीरे-धीरे हम उस लक्ष्य को प्राप्त कर भी लेते हैं लेकिन उस लक्ष्य को प्राप्त करने में अक्सर यह भूल जाते हैं कि हमनें अपने जीवन के कितने खूबसूरत लम्हों का बलिदान कर दिया। हम समय का बलिदान कर देते हैं। हम अपने जीवन के उन खूबसूरत लम्हों का भी बलिदान कर देते हैं जो समय निकल जाने के बाद हमारे हाथ से छूट चुके हैं।

इन सब के पीछे हमारी एक ही सोच होती है कि जब हम उस लक्ष्य को पूरा कर लेंगे तो बहुत खुश हो जाएंगे। हमारे सारे दुख दर्द तकलीफ मिट जाएंगे। सब कुछ ठीक हो जाएगा। फिर कोई चिंता नहीं रहेगी परंतु लक्ष्य तक जितने लोग भी पहुंचे हैं उनका यही कहना है कि खुशी तो दूर है, चिंताएं और बढ़ गई हैं। प्रायः देखा जाता है कि कोई गरीब व्यक्ति किसी धनी व्यक्ति की तुलना में अधिक खुश रहता है। इसका मुख्य कारण यही है कि वह छोटी-छोटी वस्तुओं में अपने लिए खुशी ढूंढ लेता है। अच्छा स्वास्थ्य भी एक खुशनुमा जीवन का महत्वपूर्ण आधार होता है। एक मनुष्य तभी स्वस्थ रह सकता है जब उसको अच्छा भोजन और सुकून भरी नींद मिले। खुश रहने के लिए उसके मन में संतोष का होना अति महत्वपूर्ण है अन्यथा लालसा की अग्नि खुशी को भस्म कर सकती है। अपने जीवन को खुशहाल बनाने के लिए हमें क्षमता और संसाधनों के आधार पर किसी अन्य के साथ अपनी तुलना नहीं करनी चाहिए। हमें सदैव स्मरण रखना चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति स्वयं में विशिष्ट होता है। हम अपने प्रियजनों के संग बैठकर खुशी के भागी बन सकते हैं। हमें उस सन्यासी का भी मनन करना चाहिए जो तमाम सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर सिर्फ खुशी के साथ ही परमात्मा में लीन रहता है। उसको सिर्फ धार्मिक जीवन जीने से ही आत्मिक शांति मिलती है। यही शांति उसके खुश रहने की बुनियाद रखती है।

खुश रहने का कोई निश्चित पैमाना नहीं है। सभी अपने- अपने अनुसार खुश रहते हैं। छोटा बच्चा खिलौना पाकर भी खुश हो जाता है। लेकिन असली खुशी तो उस परमात्मा से मिलने के बाद प्राप्त होती है। उसको महसूस करने के बाद ही मनुष्य इस मोह माया से बाहर निकल पाता है वरना वह हर समय अकेला महसूस करता है। उसे यह समझना चाहिए कि अकेलापन महसूस करने की क्या जरूरत है? हम कहीं भी हैं, वह हमेशा हमारे साथ रहता है। उसका प्रकाश हमारे अंदर है। हमारी सफलता व असफलता भी हमारे अंदर है। इसलिए बहुत जरूरी है कि हम अपने आप को जानें, पहचानें और उस परमपिता परमात्मा से साक्षात्कार करें। समुद्र में एक लहर एक जगह आती है तो हम सोचते हैं कि दूसरी भी वही आएगी, यह गलत है। वह कहीं और भी आ सकती है। समुद्र की लहरों को गिनने से क्या फायदा? यह संसार रूपी भवसागर भी ऐसा ही है, इसमें लहरें आती जाती रहती हैं। यही तो इसकी प्रकृति है। इस भवसागर के लिए ऐसा प्रबंध करना है कि जिस नौका में हम बैठे हैं, वह लहरों के कारण कहीं डूब ना जाए। मन में भी दुख की लहर आती जाती रहती है। दुख तो सब को परेशान करता है। सुखी वही है जो अपने अंदर स्थित ईश्वर को जानता है, जो उसके अंदर विराजमान है और हर समय उसी के साथ रहता है, उसी से मिलने के बाद ही हमें असली खुशी का अनुभव होगा और हमारे लिए यही असली और स्थाई खुशी होगी वरना और खुशियां तो अल्पकालिक होती हैं। वे तो क्षण भर के लिए ही हमें प्राप्त होती हैं और क्षण भर में ही समाप्त हो जाती है।

One thought on “107. खुशी के सूत्र”

Leave a Reply