144. स्वास्तिक का पौराणिक इतिहास/कलंक को हटाने की कोशिश

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

*जर्मन अत्याचार के कलंक को मिटाने की कोशिश—

वर्ष 2013 में 13 नवंबर को कोपेनहेगन में स्वास्तिक दिवस मनाया गया। जहां दुनियाभर से टैटू कलाकार स्वास्तिक को पूरी दुनिया तक पहुंचाने के लिए इकट्ठा हुए। आयोजकों का कहना था कि—
हिटलर की पार्टी ने इस चिन्ह पर धब्बा लगा दिया, उसे साफ करने की जरूरत है। स्वास्तिक पर लगे नाजी धब्बे को धोने के लिए दुनिया भर में प्रयास हो रहे हैं। भारत जो स्वास्तिक को अपना प्रतीक मानता है वह भी पीछे नहीं।विदेशों में रह रहे भारतीय स्कूलों और धार्मिक स्थलों पर इस प्रतीक की महत्ता समझाने की कोशिश कर रहे हैं।

*यूक्रेन—

यूक्रेन के नेशनल म्यूजियम में झांके तो इसकी झलक मिल जाती है। इस म्यूजियम की सबसे कीमती चीजों में से एक है—
एक चिड़िया की प्रतिकृति। वर्ष 1908 में रूस की सीमा के पास खुदाई में मिली। इस आकृति की धड़ पर स्वास्तिक का चिन्ह है जो लगभग 12000 साल पुराना बताया जा रहा है। यूक्रेन की राजधानी कीव में इस तरह के अनेक प्रतीक मिलते रहे हैं। यही वजह है कि—
जब नाजियों ने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान यहां कब्जा किया तो उन्हें यकीन हो गया कि ये उनके आर्य पूर्वजों की निशानियां हैं जो किसी तरह से यहां आ गई। युद्ध खत्म होने के बाद जर्मन सेना यूक्रेन से इन प्रतीकों को लेकर वापस लौटी।

*ग्रीक में घर सजाने के लिए भी इस्तेमाल—

इसके प्रमाण 12वीं सदी के अवशेषों से मिलते हैं। यहां इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि— द्वितीय विश्व युद्ध से पहले तक स्वास्तिक की लोकप्रियता, उसका महत्व, उसके प्रति आस्था कितनी रही होगी कि— एम्ब्रायंडरी में भी स्वास्तिक बनाया जाता था। ऐसी मान्यता थी कि—
स्वास्तिक बने हुए कपड़े पहनने से खुशकिस्मती आएगी।पश्चिम में स्वास्तिक को फासीवाद से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन हजारों वर्षों से इसे सौभाग्य के प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल किया जाता रहा है ।

*यूरोप—

नाजियों के आने से पहले के यूरोप के इतिहास की बातें अब सामने आ रही हैं और इसके साथ ही ये सवाल भी पूछा जाने लगा है कि—
क्या यह प्राचीन प्रतीक अपने साथ जुड़ी नकारात्मक बातों से कभी मुक्त होगा ?

*पश्चिम से एशिया की यात्रा करने वाले लोग इसकी सकारात्मकता से प्रभावित हुए और वापिस लौट कर उन्होंने इसका इस्तेमाल शुरू किया। 20 वीं सदी की शुरुआत तक इसकी लोकप्रियता सनक की हद तक बढ़ गई थी।

*अमेरिका के स्टीवन हेलर ग्राफिक डिजाइन पर”द स्वास्तिक :सिंबल बियांड रिडेम्पशन” नाम से एक किताब लिख चुके हैं ।
उन्होंने अपनी किताब में इस बात पर रोशनी डाली है कि— पश्चिम में वास्तु कला, विज्ञापन और उत्पा‌‌दों के डिजाइनों में स्वास्तिक को किस तरह से अपनाया गया है।
उन्होंने कहा —
कोका – कोला में इसका इस्तेमाल किया ।
*काल्र्जवैर्ग बियर की बोतलों पर इसे लगाया ।
*द ब्वाय स्काउट्स ने इसे अपनाया।
*गर्ल्स क्लब ऑफ अमेरिका ने अपनी मैगजीन का नाम स्वास्तिक रखा, यहां तक कि—
उन्होंने अपने नौजवान पाठकों को इनाम के तौर पर स्वास्तिक चिन्ह भेंट किए।

*फासीवाद का दंश— कोपनहेगन में ही टैटू पार्लर चलाने वाले पीटर मैेडसेन कहते हैं —
“स्वास्तिक प्रेम का प्रतीक था। लेकिन हिटलर ने इसका खराब इस्तेमाल किया। अगर हम लोगों को स्वास्तिक का वास्तविक अर्थ समझा पाएं तो हम फासीवादियों से इसे छीन सकते हैं। “
लेकिन इसके साथ ही फ्रेडी नॉलर जैसे लोग जिन्होंने फासीवाद का दंश झेला है, उनके लिए स्वास्तिक से प्यार करना सीखना आसान काम नहीं होगा।

*सौभाग्य सूचक स्वास्तिक पर कलंक—

हंकेन क्रूएज 2005 में इसे पूरे यूरोप में प्रतिबंधित किए जाने का नाकाम प्रयास किया गया। उस समय ब्रिटेन, भारत सहित कई देशों की सरकारों ने इस पर एतराज जताया था। जिससे इस पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सका।

*2015 में अमेरिका ने भी स्वास्तिक को प्रतिबंधित करने की कोशिश की पर अनेक देशों और भारतीय संस्कृति से जुड़े संगठन पुरजोर तरीके से विरोध के साथ-साथ सौभाग्य के प्रतीक स्वास्तिक के पक्ष में विश्व को आगाह करने का प्रयास कर रहे हैं।

*ब्रिटेन स्थित हिंदू फोरम के रमेश कालीदयी ने स्वास्तिक के बारे में जागरूकता लाने के लिए पूरे ब्रिटेन में सेमिनार आयोजित किए जाने की घोषणा की।
*उन्होंने बताया कि— जिस चिन्ह को हम पिछले 5000 साल से प्रयोग करते आ रहे हैं, वह नाजियों के साथ जुड़ने के कारण आज प्रतिबंधित होने की कगार पर है। हिंदू इसे अपने धर्म का एक हिस्सा होने के कारण आगे भी इसे प्रयोग करना चाहते हैं। लेकिन नाजियों द्वारा इसके प्रयोग से लगने वाले संभावित प्रतिबंध के बाद, हिंदुओं के लिए भी इसका प्रयोग करना मुश्किल हो जाएगा।

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