242. मन की शक्ति

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

समस्त ब्रह्मांड में मनुष्य ऐसा प्राणी है जो बुद्धि और विचार के साथ कार्य करने के लिए स्वतंत्र है। बुद्धि और विचार कार्य करते हैं— मन की शक्ति के द्वारा। मन, वायु और प्रकाश की गति से भी अधिक गतिमान रहता है। उसमें भिन्न-भिन्न प्रकार के विचार पनपते रहते हैं। कुछ विचार अच्छे होते हैं यानी सकारात्मक होते हैं तो कुछ विचार बुरे होते हैं यानी नकारात्मक होते हैं। लेकिन मनुष्य का जीवन मन के इन विचारों से संचालित होता है।

मनुष्य का मन बहुत अशांत और चंचल होता है। हमारे ग्रंथों में लिखा है कि— मन ही मनुष्य को सांसारिक बंधनों में बांधता है और मन ही उन बंधनों से मुक्ति दिलाता है। मनुष्य के विचार ही होते हैं जो उसे क्षण भर में श्रेष्ठता के शिखर पर पहुंचा देते हैं तो पल भर में पतन की गहराइयों में भी धकेल देते हैं। ऐसे में मनुष्य को अपने अशांत एवं चंचल मन को स्थिर और नियंत्रण में रखना बहुत आवश्यक है।

जो मनुष्य मन को नियंत्रित नहीं कर पाते उनके लिए वह शत्रु के समान कार्य करता है। ऐसे में मन की साधना से बड़ी कोई साधना नहीं। अंतर्मन से बड़ा कोई मार्गदर्शक नहीं क्योंकि मनुष्य के मन में यदि दुर्बलता व्याप्त है तो वह कभी सफल नहीं हो सकता। इस यात्रा में हमें अपने केंद्र की ओर चलना होता है। पवित्र दृष्टि से अपने अंतर्मन में झांकना होगा। यह आंतरिक यात्रा है।

ज्ञान की इस खोज के लिए हमें अपने अंदर उतरना होगा। अज्ञानता के अंधकार में छिपी हुई अपनी ही चेतन अवस्था से साक्षात्कार करना होगा। इस दौरान मन को काबू में रखते हुए जैसे-जैसे अज्ञानता की परत को हटाते जाएंगे वैसे-वैसे चेतना में छिपा ज्ञान रूपी हीरा मिल जाएगा। इस अवस्था को प्राप्त होने के पश्चात् ही हमें पता चलता है कि सभी जीवों में ईश्वर का वास है। ज्ञान के जिस प्रकाश यानी ईश्वर को हम खोज रहे हैं, वह कहीं बाहर नहीं वास्तव में वह हमारे अंतर्मन में ही निवास करता है। यह अनुभूति होने पर मन में अनंत ज्ञान का प्रकाश उमड़ता है और इस ज्ञान की प्राप्ति के पश्चात् एक विलक्षण क्रांति घटित होती है।

यह एक ऐसी क्रांति होती है जिससे समाज परिचित नहीं होता। इसमें हमें स्वयं अकेले उतरना पड़ता है।
हमें मानसिक शक्ति प्राप्त होती है। ऐसे में मनुष्य इस सकल जगत् के प्रति कृतज्ञता से भर जाता है। उसके अंतर्मन में पवित्रता, सहिष्णुता और विनम्रता का विस्तार होने लगता है। क्षमा, उदारता, दया, करुणा, प्रेम, सत्य और अहिंसा जैसे सद्गुणों का जीवन में समावेश हो जाता है। वह अंदर और बाहर से एक जैसा हो जाता है। उसके रोम- रोम में कृतज्ञता रूपी अमृत रस टपकता दिखाई पड़ता है। उसका प्रत्येक स्पंदन कृतज्ञता के भावों से भर जाता है।

मानसिक शक्ति प्राप्त करने वाले मनुष्य में सद्बुद्धि का संचार होता है और जो अपने मन को नहीं साध पाया वह दुर्बुद्धि रह जाता है। सद्बुद्धि वाला मनुष्य उपकार करता है और दुर्बुद्धि अपकार कराती है। उपकार के बदले जब हम उस व्यक्ति के प्रति नतमस्तक होते हैं, तब वह हमारी कृतज्ञता होती है। यदि उपकार के बदले हृदय में कृतज्ञता की भावना न उत्पन्न हो तो मानवीय संस्कारों के विरुद्ध मानी जाती है। यह कृतज्ञता व्यक्ति को भीतर और बाहर दोनों स्तरों पर बड़ा बनाती है।

मानसिक शक्ति, शारीरिक शक्ति से भी श्रेष्ठ होती है।
मन की शक्ति एक ऐसे जिन्न की भांति होती है, जिसमें शक्ती तो अपार होती है परंतु यदि उसे उचित मार्गदर्शन न दिखाया गया तो वही शक्ति उस व्यक्ति के पतन का कारण भी बन जाती है। वास्तव में देखा जाए तो जो मन की शक्ति के स्वामी होते हैं, उन्हीं के समक्ष संसार नतमस्तक होता है।

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