67. जीवन का उद्देश्य

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

प्रसिद्ध अमेरिकी लेखक मार्क ट्वैन ने कहा था—मानव जीवन में केवल दो ही दिन महत्त्वपूर्ण होते हैं। पहला दिन जब उसका जन्म होता है और दूसरा जब वह यह जान लेता है कि आखिर उसके जन्म का उद्देश्य क्या है? किंतु दुर्भाग्यवश जीवन धारण करने के बाद हम अपने जन्म के पवित्र उद्देश्यों को पूरी तरह से भूल जाते हैं और इस अनमोल मानव जीवन को व्यर्थ ही गंवा देते हैं। यहां पर एक अहम् प्रश्न यह उठता है कि- आखिर हम कौन हैं? हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है? आज के भौतिकवादी युग में हर व्यक्ति का उद्देश्य समय के अनुसार बदलता रहता है। किसी को ऐशो- आराम का जीवन चाहिए, तो किसी को गाड़ी, बंगला, नौकर, चाकर सब चाहिए।

लेकिन एक छोटा बच्चा तो एक छोटे-से खिलौने या छोटी- सी साइकिल से ही अपने उद्देश्य की प्राप्ति कर लेता है। हर व्यक्ति इन भौतिक वस्तुओं से प्यार करता है। जब उसकी एक इच्छा पूरी हो जाती है, तो वह दूसरी इच्छा को अपने उद्देश्य में शामिल कर लेता है। अब रोटी, कपड़ा और मकान जो जीवन की मूलभूत आवश्यकताएं हैं, आज के समय में ये उद्देश्य में शामिल नहीं होता। आज मनुष्य अपने सामाजिक दायरे से ऊपर उठ चुका है। अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए, संघर्ष करते हुए, वह अपने जीवन के मूल उद्देश्य से भटक गया है। उसने वर्तमान में जीना छोड़ दिया है। जिन्होंने अपने उद्देश्य को पा लिया वे तड़प रहे हैं, कि यह जो पा लिया, इसके लिए फिजूल मेहनत की। जिंदगी इसको पाने में गंवा दी। जो नहीं पा सके वे भी तड़प रहे हैं। शांति का एक क्षण नहीं है, प्रेम की एक बूंद नहीं है,संगीत का एक स्वर नहीं है उनके पास। उन्होंने अपने अनमोल मानवीय जीवन को बेबस और लाचार बना लिया है।

प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात से मिलने एक बार उनका एक अनुयायी उनके घर पर आया। दरवाजे पर दस्तक के बाद जब सुकरात अपने घर से निकले तो शिष्य ने बड़ी विनम्रतापूर्वक उनसे आग्रह किया, मैं सुकरात का बहुत बड़ा फैन हूं। मैं उनके विचारों और व्यक्तित्व से प्रभावित होकर बहुत दूर से उनसे मिलने आया हूं। मैं उस महान शख्सियत का दर्शन करना चाहता हूं, जिसने मेरी जिंदगी को पूरी तरह से बदल दिया। सुकरात थोड़ी देर के लिए शांत रहे और फिर बोले, सुकरात? आप किस सुकरात की बात कर रहे हैं? आज तक मैं खुद सुकरात को नहीं पहचान पाया हूं। माफ कीजिए मैं आपको उनके दर्शन नहीं करा सकता। सुकरात के दर्शन का मुरीद बेचारा याचक, बड़ी निराशा के साथ वापिस लौट गया।

सुकरात का उत्तर बड़ा आसान था। कभी अपने दिल पर हाथ रखकर गंभीरता से इस प्रश्न के उत्तर की तलाश करें कि क्या हम खुद को पहचान पाते हैं? आपके भीतर जो राज छिपा है, उससे परिचित होते ही वह महाक्रांति घटित हो जाती है, जो मिट्टी को सोना बना देती है। आप को जमीन से उठाकर आसमान के तारों की ऊंचाइयों पर ले जाती है। आपके अंतर्मन की गहराई में बीज रूप में सम्माहित परमात्मा की वह दैवीय शक्ति एक साधारण व्यक्ति को बुद्ध बना देती है। उस शाश्वत सत्य को जान लो, सारी प्रज्ञा, सारा पांडित्य आपके पैरों में है।

एक उदाहरण और देती हूं—सिकंदर के गुरु अरस्तु नें एक बार उससे एक प्रश्न पूछा, तुम विश्व विजेता बन गए हो। अब आगे तुम्हारी क्या योजना है? क्योंकि दुनिया तो केवल एक है और फिर दूसरी दुनिया तुम कैसे जीतोगे? सिकंदर अपने गुरु के इस प्रश्न को सुनकर स्तब्ध रह गया, क्योंकि उसके जीवन का उद्देश्य विश्व विजेता बनकर पूरी सृष्टि पर राज करना था? उसका यह उद्देश्य पूरा हो चुका था। अब उसको अपना जीवन निरर्थक लगने लगा था। विश्व का राजा बनकर भी उसको अपने जीवन में सुकून नहीं था। भौतिक सुख-सुविधाओं और बेशुमार धन-संपत्ति को बटोरने की अंधी चाहत में हम मानवता के दुख और उसके आंसू पोछ नहीं पाते हैं। लोभ, तृष्णा, अहिंसा, असत्य वचन सरीखे अमानवीय कृत्यों में जीवन के जो अनमोल क्षण व्यर्थ होते हैं, वे जीवन को सच्चे उद्देश्यों से भटकाते हैं। दुखी और असहाय मानव के दुख और दर्द के आंसू पौंछकर उनके चेहरे पर खुशियां लाने की कोशिश ही सच्ची मानवता है। जीवन का सच्चा उद्देश्य है। इसे समझने के लिए हमें सबसे पहले स्वयं और अपने जीवन के अर्थ पर विचार करना होगा।

हमें किसी और के पास नहीं जाना है, कहीं और नहीं जाना है। आपको अपने भीतर ही जाना है। आपको किसी से कुछ मांगना नहीं है। आपको निहित स्वार्थों को तोड़ना जरूरी है। अगर हम चाहते हैं एक स्वस्थ शांत, आनंद से भरी हुई दुनिया, अगर हम चाहते हैं इस दुनिया को एक खिले हुए फूलों की बगिया की तरह सुगंधित और सुंदर, तो हमें महत्वाकांक्षा की सीढ़ियों पर नहीं चढ़ना है। हमें चुपचाप अपने मौन में, उस की गहराइयों में उतर जाना है, जिसके हम मालिक हैं। जो हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। बिना किसी शोरगुल, बिना किसी बाह्य आडंबर के हमने अपने विचारों को शुन्य पर ले जाना है। जहां पर आत्मा का परमात्मा से साक्षात्कार हो जाए और जन्म- मृत्यु के बंधनों से मुक्त होकर मोक्ष पाने के अधिकारी बनें। जीवन तलवार की धार पर चलने के समान है। लेकिन अपने को आत्मसात् करके जीवन की डगर पर आगे बढ़ते हुए, अगर इस पृथ्वी पर हम हजारों लोगों को शांति का जरा-सा स्वाद भी चखा दें, अमृत की थोड़ी- सी झलक भी दिखा दें, या अपने ही भीतर की मधुशाला से थोड़ी -सी भी पहचान करा पाएं, तो हमारे जीवन का उद्देश्य पूरा हो सकता है।

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