70. मानव गुण

श्री गणेशाय नमः

श्री श्याम देवाय नमः

सनातन-धर्म के अनुसार वर्तमान काल को कलयुग कहा जाता है। इसमें मानव में तमो ज्यादा, रजो थोड़ा तथा सद्गुणों का मुख्य रूप से अभाव ही रहता है। अध्यात्म के अनुसार मनुष्य संसार में ऐसा प्राणी है जो विवेक के द्वारा तत्वज्ञान तथा योग के द्वारा तमो और रजो गुणों के प्रभावों से मुक्त होकर सद्गुण अपनाकर किसी भी परिस्थिति में खुश रह सकता है। अगर आपको असली खुशी चाहिए, तो वह आपके अंदर मिलेगी, बाहर नहीं। बाहर आप जो कुछ कर रहे हैं, वह अलग है और आपके अंदर जो हो रहा है, वह भी अलग है।

इस सृष्टि में हर वस्तु का अपना एक अलग महत्व है। हर वस्तु की अपनी महानता है। अगर आपको भूख लगी है, तो आप खाना खाने के बाद ही तृप्त हो सकते हैं, न कि कोई तरल पदार्थ का उपयोग करने से आपकी भूख मिट सकती है। तरल-पेय से आपकी भूख कुछ समय के लिए शांत तो हो सकती है, लेकिन खाना खाने के बाद जो तृप्ति मिलती है, वह आपको नहीं मिलेगी। ऐसे ही आप आम के पेड़ के पास जाएंगे तो आपको नारियल नहीं मिलेंगे। आलू के पास जाएंगे तो आपको टमाटर नहीं मिलेगा। इसका यह मतलब नहीं है कि आलू की कोई कीमत नहीं है। समाज में परिवार की सर्जना के लिए प्रेम, सेवा, भाईचारा, क्षमा, तालमेल और शांति मानव गुणों में अवश्य शामिल होने चाहिएं। अगर परिवार में माता-पिता अपने में ही खुश नहीं हैं, तो बच्चे भी खुश नहीं रह सकते। जब बच्चे खुश नहीं हैं, तो परिवार खुश नहीं होगा। फिर समाज कहां खुश रहेगा? समाज खुश नहीं है, तो फिर देश खुश नहीं रहेगा। इसलिए यह जरूरी है कि हर मानव अपने आप में खुश रहे, ताकि इस दुनिया में शांति स्थापित हो सके।

इस दौर में मानव का शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ रहना एक बड़ी चुनौती बन गया है। इसका कारण तमाम तरह की व्याधियों से घिरा होना है। अधिकांश व्याधियों का संबंध मानव मन एवं मस्तिष्क से जुड़ा है। वास्तव में मानव शरीर सद्गुण, रजोगुण एवं तमोगुण से मिलकर बना है। इनकी अलग-अलग विशेषताएं हैं। सद्गुणों द्वारा मनुष्यों में ईश्वर के स्वरूप की पहचान रहती है। इससे वह प्राय: प्रसन्न रहता है। रजोगुण की प्रधानता में हर्ष तथा भय साथ रहते हैं। वही तमोगुण में मनुष्य पशु के समान केवल स्वयं के स्वार्थ के बारे में ही सोचता है। इससे वह मानसिक रूप से एकाकी होकर चारों तरफ विषैला माहौल पाता है। प्रत्येक व्यक्ति में अच्छाई और बुराई दोनों होती हैं। आपकी अच्छाई, आपकी बुराई को नहीं जानती और आपकी बुराई, आपकी अच्छाई को नहीं जानती, पर रहते ये एक ही में हैं।

एक सुंदर उदाहरण द्वारा इसे समझा जा सकता है—एक बार एक संत प्रवचन दे रहे थे। वे मानवीय गुणों के बारे में विस्तार से बता रहे थे, वहां पर कुछ बच्चे भी थे। उनमें से एक बच्चे ने संत से एक सवाल पूछा—मैं देखता हूं, कि कुछ लोग जो अच्छे होते हैं, कई बार वे बुरा काम करते हैं। वे लोग जो बुरा काम करते हैं, कई बार वे अच्छा भी करते हैं। जो लोग खुश रहते हैं, वे कई बार दुखी हो जाते हैं। जो लोग दुखी रहते हैं, कई बार वे खुश भी हो जाते हैं। ऐसा क्यों है? संत ने जवाब दिया—हर एक मनुष्य के अंदर दो शेर हैं। एक अच्छा शेर है और एक बुरा शेर है। दोनों शेर आपस में लड़ते हैं। बच्चा पूछता है— दोनों शेर आपस में क्यों लड़ते हैं? संत कहता है—मानव पर काबू करने के लिए लड़ते हैं। बच्चा फिर पूछता है—इनमें से जीतता कौन है? अच्छा वाला या बुरे वाला। संत कहता है—जिस शेर को तुम खिलाओगे, वही जीतेगा। बुरे शेर को खिलाओगे, तो वह जीतेगा। वह तुमको काबू करेगा। अच्छे शेर को खिलाओगे, तो वह जीतेगा। वह तुम पर काबू करेगा। अच्छे वाला शेर अच्छा है, बुरे वाला शेर बुरा है। अगर हम अपने जीवन में अच्छा चाहते हैं तो अच्छे शेर को खिलाना जरूरी है।

हमें हमेशा यह कोशिश करनी चाहिए कि हमारे अंदर जो अच्छाई है, उस तक हम पहुंचे। जब इंसान अपनी अच्छाई को पहचानने लगेगा, उसको बढ़ावा मिलेगा। फिर इस दुनिया को बदलने में देर नहीं लगेगी। इन सद्गुणों को पतंजलि के अष्टांग योग एवं ईश्वर भक्ति द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। ईश्वर भक्ति सतयुग में योग, त्रेता में यज्ञ और द्वापर में पूजा द्वारा प्राप्त की जा सकती है। परंतु यही ईश्वर भक्ति कलयुग में केवल भगवान के नाम से ही प्राप्त हो जाती है। इसलिए कलयुग के स्वरूप को समझते हुए रामचरितमानस में कहा गया है कि इस युग में मानसिक पुण्य तो होते हैं,परंतु मानसिक पाप नहीं होते। ऐसा इसलिए, क्योंकि सभी जगह ऐसा ही माहौल है। इनके कारण कभी-कभी बुरे विचार मनुष्य को घेर लेते हैं। जिन्हें वह पाप समझ कर अपराध बोध में गिरा रहता है, ऐसी स्थिति में वह ईश्वर भक्ति तथा विवेक से इन मानसिक पापों से निवृत्त होकर सकारात्मक विचारों से स्वयं को ऊर्जावान बना सकता है।

संभवतः इसलिए कलयुग को सबसे अलग काल माना जाता है। चाहे आप कितने भी दुखी हो जाएं, खुशी आपके अंदर है। आपके अंदर से खुशी कभी कहीं नहीं जाएगी। प्रकाश अंधेरे से कितनी दूर है? जब प्रकाश आता है, तो अंधेरे को दूर करने में थोड़ा समय ही लगता है। आपकी खुशी भी आपके इतनी ही नजदीक है, सिर्फ उसे महसूस करना है। क्योंकि इससे वह थोड़े से प्रयास से ही अपनी उन्नति कर सकता है। इसलिए मनुष्य को यह राह अपनानी चाहिए। इससे वह न केवल प्रसन्न, बल्कि स्वस्थ रहकर जीवन को सार्थक बनाते हुए उसका आनंद भी ले सकता है।

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